बिजनेस स्टैंडर्ड - इमरान के समक्ष विकल्प नेतृत्व करें या अनुसरण
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Monday, May 20, 2019 04:35 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

इमरान के समक्ष विकल्प नेतृत्व करें या अनुसरण

शेखर गुप्ता /  March 03, 2019

आज अगर पाकिस्तान की बात आती है तो दो तरह की चुनौतियां सामने हैं। पहली बात, किस पर ध्यान दें इतिहास पर, भूगोल पर या फिर राजनीति पर? दूसरा आप इनमें से जो भी चुनें, शुरुआत कहां से करेंगे? मिसाल के तौर पर विंग कमांडर अभिनंदन की वापसी के बाद मैं इस आलेख की शुरुआत 2019 से भी कर सकता था। या फिर 2009, 1999, 1989 या 1979 से भी। परंतु मैं  आपको 1969 में लिए चलता हूं। हालांकि बहुत जल्दी ही मैं 2019 पर लौट आऊंगा।

सन 1967 में इजरायल ने मुस्लिम देशों को छह दिन के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया था। इन मुस्लिम देशों ने सन 1969 में इस्लामी सम्मेलन संगठन (ओआईसी) बनाने का निर्णय किया। इंदिरा गांधी ने तत्कालीन मंत्री (जो बाद में राष्ट्रपति बने) फखरुद्दीन अली अहमद को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजना तय किया। नाराज पाकिस्तान ने इसे रोकने का प्रयास किया और उसे इस्लामी दुनिया की सहानुभूति मिली। इस्लाम जगत ने यह दलील स्वीकार कर ली कि उस वक्त सबसे बड़ी आबादी वाले मुस्लिम देश के बिना कैसा ओआईसी? उस वक्त तक पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था। भारत को नकार दिया गया और शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

अब वापसी करते हैं 50 वर्ष बाद के समय यानी 2019 पर। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ओआईसी की बैठक में माननीय अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। वहां उन्होंने एक बेहतरीन भाषण दिया जिसमें कहा गया कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला मुल्क है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम भारत की विविधता का हिस्सा हैं और उनमें से 100 से भी कम ने आईएसआईएस में शिरकत की।

इसमें दो राय नहीं कि उनकी पार्टी द्वारा देश के मुस्लिमों को हाशिये पर धकेलने और अलग थलग करने तथा कश्मीरियों की दुष्ट छवि बनाने को लेकर कई वाजिब सवाल किए जाएंगे लेकिन कृपया इस बात की अनदेखी न करें कि एक हिंदू राष्ट्रवादी सरकार की शीर्ष महिला नेता दुनिया भर के मुस्लिमों के समक्ष उपरोक्त बातें कह रही है। विडंबना यह है कि भारत को दिए आमंत्रण के विरोध में पाकिस्तान ने आईओसी के आयोजन में शिरकत तक नहीं की। पांच दशक पहले पाकिस्तान के पास यह ताकत थी कि वह प्रमुख इस्लामी संगठन में भारत की उपस्थिति को वीटो करे। आज वह केवल क्षुब्ध होकर बहिष्कार कर सकता है। पाकिस्तान जो 20 करोड़ की आबादी और नाभिकीय हथियारों और मिसाइलों के साथ खुद को इस्लाम का किला कहता है, उसकी इतनी दुखद स्थिति कैसे बनी? 

अब 40 वर्ष पीछे चलते हैं, सन 1979 में। पाकिस्तान को सन 1971 की जंग में हार का सामना करना पड़ा था और उसके दो टुकड़े हो गए। वह अभी अपने आपको संभालने में लगा था। उसी वक्त सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया। अमेरिका और सऊदी अरब जैसे उसके साझेदार तथा चीन भी उस क्षेत्र में आ गए। जिसे अब अफ-पाक क्षेत्र कहा जाता है वह उस दौर का चर्चित युद्ध क्षेत्र था। पाकिस्तान उनका स्वैच्छिक और अनिवार्य सहयोगी बना। इसके बाद इस क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना को नि:शुल्क और आसानी से हथियारबंद बनाने की शुरुआत हुई। इससे नए तानाशाह जिया उल हक मजबूत हुए और खुद को इस जिहाद का सच्चा कमांडर मानने लगे।

यह नई ताकत उनके सर चढ़कर बोलने लगी। उन्हें लगा कि अगर वे एक महाशक्ति के खिलाफ युद्ध का नेतृत्व कर सकते हैं तो भारत के खिलाफ क्यों नहीं? भारतीय पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत सन 1981 में हुई। उसके अगले वर्ष वहां एके-47 और आरपीजी-7 ग्रेनेड लॉन्चर का आगमन हुआ। ये अफगान जिहादियों के इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार थे।

मेरी पहली पाकिस्तान यात्रा सन 1985 की गर्मियों में हुई जब यह सिलसिला जोर पकड़  रहा था। मैं इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करने वाले सिख अपहरणकर्ताओं के मामले की सुनवाई कवर करने गया था। मैं दोनों देशों के आम लोगों की समृद्धि, जीवन स्तर, बुनियादी ढांचे और यहां तक कि दूरसंचार सेवाओं के स्तर में अंतर को देखकर अचंभित था। इंटरनेट के आगमन के पहले ये सेवाएं पत्रकारों के लिए ऑक्सीजन की तरह थीं। संक्षेप में सन 1985 में आम पाकिस्तानी, औसत भारतीय से बेहतर जीवन जीता था। आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान की प्रतिव्यक्ति  आय भारत से 60 फीसदी अधिक थी।

एक बार फिर रुख करते हैं 2019 का। आज औसत भारतीय व्यक्ति किसी आम पाकिस्तानी की तुलना में 25 फीसदी अधिक कमाता है। आखिर कैसे पाकिस्तानी अपने इस नए भू राजनैतिक मूल्य के बावजूद न केवल 60 फीसदी की पुरानी बढ़त गंवा बैठे बल्कि 25 फीसदी और पिछड़ गए। यह अंतर सालाना 5 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान से तीन फीसदी तेज गति से बढ़ रही है जबकि पाकिस्तान की आबादी भारत से दोगुनी तेजी से बढ़ रही है। यह कैसे हुआ? जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के खिलाफ 1,000 वर्ष तक जंग लडऩे की धमकी दी थी। परंतु सन 1969 के बाद के 50 वर्ष में ही पाकिस्तान का कद इस कदर घट चुका है कि इस्लामी जगत भी भारत को तरजीह दे रहा है। जिहाद को अपनाने के बाद के 40 वर्ष में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नष्ट हो चुकी है। पाकिस्तान ने भारत के साथ रक्त संघर्ष की केवल इतनी कीमत नहीं चुकाई है। यह सिलसिला जारी है। सन 1989 तक पराजित सोवियत संघ अफगानिस्तान से बाहर निकलने की शर्तों पर चर्चा कर रहा था। जीत के खुमार में पाकिस्तान ने अपना ध्यान पूर्व की ओर लगाना शुरू कर दिया। यह लगभग वही समय था जब जम्मू कश्मीर में मौजूदा संकट की शुरुआत हुई। खाकी वर्दी वाले स्वयंभू गाजी अब वह जिहाद जीतने जा रहे थे जो उनके लिए वाकई मायने रखते थे। अगले तीन वर्ष जमकर खून खराबा हुआ। कश्मीर और पंजाब में हजारों लोगों की जान गई।

परंतु इस बीच पाकिस्तान में कुछ आंतरिक बदलाव आए। लोकतांत्रिक ताकतों ने वापसी की और जिया उल हक के वारिस राजनेताओं के साथ आंतरिक लड़ाई में उलझे रहे। नवाज शरीफ जो सेना के प्रिय थे, वह भी शांति की वकालत करने लगे। उन्होंने कश्मीर में अशांति फैलने के एक दशक बाद जनवरी 1999 में वाजपेयी के साथ शांति स्थापना की प्रक्रिया शुरू की। उनकी सेना ने उन्हीं दिनों करगिल में घुसपैठ की। 

पाकिस्तान हार गया और दो बड़े बदलाव हुए। पहला, इस व्यापक वैश्विक दृष्टि का अंत हो गया कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है। अब इस बात पर सहमति बनी थी कि नियंत्रण रेखा स्वत: सीमा है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। दूसरी बात, उसी वर्ष पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार का अंत हो गया। परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्ता पलट दिया। उन 10 वर्षों में पाकिस्तान कश्मीर पर नैतिक रूप से भी कमजोर पड़ गया और सैन्य शासन की वापसी हो गई। इन सबके पीछे वही आत्मघाती रुख जिम्मेदार था। तब से अब तक काफी कुछ हो चुका है। 26/11 के आतंकी हमले ने उसे वैश्विक स्तर पर जिहाद के गढ़ का दर्जा दिलाया। करगिल के दौरान और संसद पर हमले के बाद दुनिया भारत के साथ हो गई क्योंकि उसने जिम्मेदारी का परिचय दिया। 

आज भारत के प्रतिकार के बाद भी सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उसके साथ हैं। बीते 50 वर्ष में पाकिस्तान ने इस्लामी दुनिया में अपना कद गंवाया। अब न सऊदी अरब उसके साथ है, न ईरान। बीते 40 साल में उसकी प्रतिव्यक्ति आय भारत की तुलना में 90 फीसदी तक गिरी। बीते 30 साल में भारतीय पंजाब और कश्मीर में उसे नाकामी हासिल हुई। उसके यहां जिहादियों का बोलबाला हुआ। बीते दो दशक में नियंत्रण रेखा स्वत: कश्मीर की सीमा बन गई। किसी के पास अब यह धैर्य नहीं था कि आतंक को नीतिगत उपाय के रूप में मान्यता दे। भारत ने पाकिस्तान में जो बमबारी की उसका किसी ने सांकेतिक विरोध भी नहीं किया। भारत और विश्व पाकिस्तान को ऐसा देश मानते हैं जो परमाणु हथियारों की शेखी बघारता है। इमरान खान अतीत का सिलसिला जारी रख सकते हैं या नई शुरुआत भी कर सकते हैं। यह जोखिम भरा होगा लेकिन इसमें सफलता की संभावना है। अगर वह ऐसा नहीं करते तो दो बातों की गारंटी है: उनकी नाकामी और प्रतिभाशाली लोगों, मजबूत राष्ट्रवाद, उसकी ईश्वर प्रदत्त भौगोलिक स्थिति और मजबूत सेना के बावजूद देश का पराभव। 
Keyword: India, Pakistan, Imran Khan, Prime Minister, War, OIC, President, Nationalism, Kashmir,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या रेटिंग घटने से और बढ़ेगी आर-कैपिटल की मुश्किल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.