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खराब नजीर

संपादकीय /  March 03, 2019

राष्ट्रीय कंपनी ला अपील पंचाट (एनसीएलएटी) ने एक निर्णय में कहा है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस)और उसके समूह की अन्य कंपनियों को कर्जदाताओं द्वारा तब तक गैर निष्पादित परिसंपत्ति घोषित नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि अपील पंचाट इसकी पूर्व मंजूरी नहीं दे देता। प्राथमिक तौर पर देखें तो एनसीएलएटी का गत सप्ताह दिया गया यह निर्णय आईएलऐंडएफएस तथा फंसे हुए कर्ज से जूझ रहे बैंकों, दोनों को राहत देता है। एनसीएलएटी के निर्णय में यथास्थिति निहित है जो कर्जदाताओं को यह मदद देगी कि उनका 53,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज फंसा हुआ कर्ज घोषित न हो। इससे उन्हें कम से कम फिलहाल तो प्रोविजनिंग से बचने का अवसर मिलेगा। परंतु, एनसीएलएटी को ऐसा निर्णय देने से पहले समुचित तरीके से विचार-विमर्श कर लेना था। 

इस आदेश पर सवाल उठाने के कई आधार हैं और ये बैंकिंग तंत्र में फंसे हुए कर्ज की पहचान को लेकर एनसीएलएटी और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच संभावित विवाद की जमीन तैयार करते हैं। पहली बात तो यह कि एनसीएलएटी ने एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश किया है जो स्पष्ट रूप से देश के केंद्रीय बैंक के क्षेत्राधिकार में आता है। किसी ऋण को फंसा हुआ कर्ज माना जाए या नहीं यह निर्धारित करने का काम पूरी तरह उसके अधिकार क्षेत्र की बात है। आरबीआई बीते तीन वर्ष से लगातार देश के बैंकिंग क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज की पहचान और उसकी प्रोविजनिंग के लिए प्रयासरत है और एनसीएलएटी का यह निर्णय स्पष्ट तौर पर इन प्रयासों को सीमित करता है। ऐसे न्यायिक हस्तक्षेप से बचने की आवश्यकता है। इसमें दो राय नहीं है कि अगर देश का बैंकिंग क्षेत्र एनसीएलएटी का अनुसरण करता तो वह आरबीआई के परिसंपत्ति वर्गीकरण के नियमों का उल्लंघन होता। यह निर्णय आरबीआई के उस कदम के खिलाफ है जो वह नियामकीय सहनशीलता के खिलाफ उठा रहा है। ऐसे समय में जबकि आरबीआई की स्वायत्तता में निरंतर हस्तक्षेप हो रहा है, उसकी स्वायत्तता और प्राधिकार की दृष्टि से यह कदम कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता है। यह आरबीआई के उन प्रयासों के खिलाफ है जो यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि ऋण की वरीयता को नुकसान न पहुंचे। आरबीआई ने अतीत में जब यह कहा कि नियामकीय प्रयास का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि देनदारी में चूक की पहचान और प्रोविजिनिंग को डिफॉल्ट की वजह से अलग रखा जाए। 

एक और वजह है जो आरबीआई के हस्तक्षेप की जरूरत बताती है। एनसीएलएटी का निर्णय सीधे तौर पर बैंक के आम जमाकर्ता के हित को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए क्योंकि फंसे हुए कर्ज की पहचान हो या नहीं लेकिन बैंकों को आईएलऐंडएफएस जैसे ऋण पर ब्याज नहीं मिलता है। इसका असर जमाकर्ताओं को मिलने वाले ब्याज पर पड़ता है। आरबीआई ऐसा नहीं होने दे सकता। दूसरी बात, यह आदेश आईएलऐंडएफएस के वित्तीय कर्जदाताओं के बीच भेद करता है। यह बैंकों को फंसे कर्ज की प्रोविजनिंग टालने का अवसर देकर राहत देता है जिससे उनकी बैलेंस शीट प्रभावित नहीं होती जबकि बॉन्ड धारकों और म्युचुअल फंड धारकों को यह सुविधा नहीं है। तीसरी बात, बैंक के भीतर भी यह आदेश बुरा संदेश देता है। यह उन बैंकों को दंडित करता है जो पहले ही आईएलऐंडएफएस को दिए फंसे कर्ज की प्रोविजनिंग कर चुके हैं। आदेश बैंकों को यह कहने के लिए प्रोत्साहित करता है कि कुछ नहीं हुआ है। अहम बात यह है कि यह कुछ बैंकों को तात्कालिक राहत ही देगा। यह मानना गलत होगा कि आईएलऐंडएफएस का मुद्दा अपनी तरह का इकलौता मामला है क्योंकि एनसीएलएटी का आदेश नजीर बन सकता है। आरबीआई अब तक खामोश है लेकिन वह अपनी स्थिति स्पष्ट करे तो बेहतर होगा। 
Keyword: IL&FS, fund, share, RBI, NCLT, Bond Holder, Provisioning, Balance Sheet, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस सर्विसेज,
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