बिजनेस स्टैंडर्ड - कागजों पर पवन बिजली परियोजनाएं
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कागजों पर पवन बिजली परियोजनाएं

अमृता पिल्लई / मुंबई March 03, 2019

देश के पवन ऊर्जा क्षेत्र में काम की रफ्तार बेहद सुस्त है। साल 2017 में 2,943 मेगावॉट क्षमता के लिए बोली पूरी की गई थी जिसमें से अब तक 30 फीसदी ही शुरू हो पाईं। उद्योग से जुड़े अधिकारियों ने धीमे क्रियान्वयन के लिए अव्यावहारिक बोली और गुजरात में भूमि नीति तैयार करने में हुई देरी को जिम्मेदार ठहराया है।

भारतीय सौर ऊर्जा निगम (एसईसीआई) ने  गुजरात और तमिलनाडु में  2,943 मेगावॉट क्षमता के संयंत्रों  की बोली लगाई गई थी। अब उद्योग के सूत्रों से प्राप्त आंकड़ों सेपता चलता है कि अब तक केवल 825 मेगावॉट का ही क्रियान्वयन हो पाया है। क्रियान्वयन में इस धीमी रफ्तार की वजह से मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) उद्योग क्षमता का महज 10 फीसदी का उपयोग करने को मजूबर है जिससे उनके राजस्व को धक्का लग रहा है। इंडियन विंड टर्बाइन मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडब्ल्यूटीएमए) के महासचिव डीवी गिरि ने कहा, 'अव्यावहारिक बोली और गुजरात की जमीन नीति के तैयार होने में देरी के चलते ओईएम की क्षमता निष्क्रिय पड़ी रही। पवन ऊर्जा परियोजनाओं को पूरा करने की अनुमानित समयसीमा 18 महीने थी लेकिन ज्यादातर भागीदार इससे चूक गए हैं।'

करीब 1,049 मेगावॉट क्षमता की बोली एसईसीआई-1 दौर में फरवरी 2017 में लगाई गई थी और दूसरी बोली 1,000 मेगावॉट के लिए अक्टूबर 2017 में दूसरे दौर में लगाई गई थी। एक ईमेल के जवाब में सुजलॉन के समूह मुख्य कार्याधिकारी जे पी चालासानी ने कहा, 'सुजलॉन एकमात्र इंजीनियरिंग खरीद और निर्माण (ईपीसी) कंपनी है जिसने मूल समय सीमा से पहले और एसईसीआई की संशोधित समयसीमा से छह महीने पहले एसईसीआई-1 बोली में मिली 250 मेगावॉट की पूर्ण परियोजना को पूरा कर लिया है।' हालांकि सुजलॉन को अपने राजस्व पर कुछ असर पडऩे की उम्मीद है। चालासानी ने कहा, 'हमारे लिए भी क्षमता उपयोगिता में तेज गिरावट आई है। चूंकि हम वर्टिकली इंटिग्रेटेड (आपूर्ति शृंखला की स्वामित्व वाली कंपनी) है और कम उत्पादन की वजह से निर्धारित कीमत उच्च बनी हुई है। इससे हमारे राजस्व को चोट पहुंचेगी।'

उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि पवन ऊर्जा में प्रतिस्पर्धी बोली में शामिल होना ओईएम की समस्या के लिए बड़ा कारण है। डेलॉयट टच तोहमात्सु इंडिया एलएलपी के पार्टनर देवाशिष मिश्रा ने कहा, 'फीड इन टैरिफ (एफआईटी) व्यवस्था से शुल्क आधारित प्रतिस्पर्धी बोली की ओर जाने से आईईएम के मार्जिन को भारी नुकसान पहुंचा है। इसी तरह अधिक्षमता और नई कंपनियों के आने से उनका मार्जिन कुछ समय के लिए दबावग्रस्त बना रहेगा।'

उद्योग के सूत्रों के मुताबिक 5,000 मेगावॉट से अधिक की परियोजनाएं गुजरात में आने जा रही है। अब राज्य में जमीन की नई नीति बन जाने के बाद सुजलॉन को उम्मीद है कि जमीन अगले दो महीने के भीतर आवंटित हो जाएगी। कंपनी को अगले वित्त वर्ष से उत्पादन बढऩे की उम्मीद है। 

डेलॉयट के मिश्रा ने बताया कि पवन ऊर्जा के लिए आई हालिया बोलियों से पता चलता है कि डेवलपर इसमें शामिल जोखिम की थाह ले रहे हैं। दिसंबर 2017 में जहां बोली शुल्क 2.43 रुपये प्रति इकाई था, 2018 में यह सुधरकर 2.87 रुपये प्रति इकाई हो गया। उन्होंने कहा, 'डेवलपरों को लग रह है कि भूमि अधिग्रहण में जोखिम शामिल है और पारेषण निकासी की कीमत उचित तरीके से तय करने की जरूरत है। यह ताजे एसईसीआई-6 बोलियों में उच्च इक्विटी रिटर्न उम्मीद के रूप में प्रभावी होता दिख रहा है।' 

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