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अधिग्रहण संहिता के नियम हुए सख्त

जश कृपलानी और श्रीमी चौधरी / मुंबई/नई दिल्ली March 01, 2019

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपने निदेशक मंडल की बैठक में लिक्विड योजनाओं के मूल्यांकन के तरीके को सख्त करने का निर्णय किया गया। इसके साथ ही कर्ज समाधान में गई कंपनियों के अधिग्रहण के लिए खुली पेशकश से छूट मांगने वाले कॉरपोरेट को इसकी अनुमति नहीं दी जाएगी। लिक्विड योजनाओं के पोर्टफोलियो से जुड़े जोखिमों को दर्शाने के लिए बाजार नियामक ने कहा कि 30 दिन या उससे अधिक की परिपक्वता वाली सभी डेट  प्रतिभूतियां मार्क-टु-मार्केट होंगी। अभी तब फंड हाउस के 60 दिन से कम परिपक्वता वाली प्रतिभूतियों को मार्क-टु-मार्केट नहीं होते थे। पिछले साल सितंबर में आईएलऐंडएफएस संकट के बाद लिक्विड योजनाओं से निवेश की निकासी और तरलता संकट को देखते हुए सेबी ने यह कदम उठाया है।

 
इस बीच सेबी ने कहा कि ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) में जाने वाली कंपनियों के मामले में खुली पेशकश की छूट केवल ऋणदाताओं के लिए ही लागू होगी। इस कदम से एतिहाद और जेट एयरवेज के बीच प्रस्तावित सौदा पटरी से उतर सकता है। एतिहाद ने जेट में अपनी मौजूदा हिस्सेदारी 24 फीसदी से ज्यादा बढ़ाने के लिए खुली पेशकश में छूट की मांग की थी। पीडब्ल्यूसी इंडिया में वित्तीय सेवा - टैक्स लीडर भवीन शाह ने कहा, 'एआरसी और अन्य ऋणदाता (अधिसूचित बैंकों को छोड़कर) जिनका कर्ज कंपनियों में फंसा हो और वह कॉरपोरेट कर्ज पुनर्गठन प्रक्रिया में गई हो, वे अधिग्रहण संहिता तथा मूल्य निर्धारण में छूट का लाभ नहीं ले सकेंगे। अधिग्रहण संहिता से छूट आईबीसी प्रक्रिया में जाने वाली कंपनियों पर ही लागू होगी।' सेबी ने कहा कि केवल अदालत या पंचाट ही इस तरह की छूट की अनुमति दे सकती है। इससे पहले अदालत के अलावा सक्षम प्राधिकरण को भी खुली पेशकश से छूट देने का अधिकार था। विशेषज्ञों का कहना है कि सेबी के इस कदम से आईबीसी के तहत सूचीबद्घ फर्मों को खरीदने की लागत बढ़ जाएगी।
 
सेबी ने मूल्यांकन और संदर्भ मूल्य के बीच के अंतर को कम करने तथा निवेश ग्रेड से निम्नतर प्रतिभूतियों का मूल्यांकन पूरे उद्योग में एकसमान करने की जरूरत बताई। विशेषज्ञों ने कहा कि इन उपायों से डेट प्रतिभूतियों के मूल्यांकन में फंडों के विवेकाधिकार कम होंगे।  सुंदरम एमएफ के मुख्य निवेश अधिकारी द्विजेंद्र श्रीवास्तव ने कहा, 'सेबी के मुताबिक अब डेट प्रतिभूतियों के मूल्य में 0.25 फीसदी अंतर हो सकता है। इसका मतलब यह है कि कीमतों में उतार-चढ़ाव 0.25 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता है। पहले यही 0.1 फीसदी तक था।' 
 
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार फंडों द्वारा हाल के समय में कम रेटिंग वाली प्रतिभूतियों के अलग मूल्यांकन को देखते हुए नियामक ने इस नियम को सख्त बनाने पर विचार किया। कोष प्रबंधक मार्क-टु-मार्केट जोखिम से बचने के लिए अपने पोर्टफोलियो को अल्पावधि की प्रतिभूतियों में बदल देते थे। ऐक्सिस एमएफ में स्थिर आय के प्रमुख आर शिवकुमार ने कहा, 'लिक्विड योजनाओं पर प्रतिफल कम हो सकता है क्योंकि अल्पावधि की प्रतिभूतियों पर आमतौर पर प्रतिफल कम मिलता है।' हालांकि सेबी के नए नियम से म्युचुअल फंडों के लिए लिक्विड योजनाओं का प्रबंधन करने की लागत बढ़ सकती है। शिवकुमार ने कहा, 'इससे लेनदेन लागत बढ़ जाएगी। अल्पावधि के परिपक्वता वाली प्रतिभूतियों को रखने से लेनदेन ज्यादा होगा। इससे स्टांप शुल्क की लागत बढ़ जाएगी।'इसके साथ ही सेबी ने ब्रोकरों के द्वारा दिए जाने वाले शुल्क को 33.33 फीसदी कम कर दिया है। अब प्रति एक करोड़ लेन-देन पर 15 रुपये के बजाय 10 रुपये देने होंगे। कृषि जिंसों के डेरिवेटिव के लेन-देन के मामले में शुल्क को 15 रुपये से 93.33 फीसदी घटाकर महज एक रुपये कर दिया है।
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