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सोशल मीडिया-चैनलों पर नफरत फैलाने के लिए हम जिम्मेदार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  March 01, 2019

आप किसी भीड़भाड़ वाले कॉफी शॉप में घुसिए। वहां पर दर्जनों लोग समूह में या अकेले बैठे हुए मिल जाएंगे। उनमें से कुछ लोगों के बीच हो रही बातचीत आप सुन भी सकते हैं। कोई अपनी निजी समस्याओं पर चर्चा कर रहा होता है तो कोई राजनीतिक मुद्दों पर बहस में मशगूल होता है। इस दौरान आपको कुछ ऐसा सुनाई देता है जिससे आप इत्तफाक नहीं रखते हैं या नापसंद करते हैं। फिर आप उस व्यक्ति से बहस में उलझ जाते हैं। थोड़ी ही देर में आप उस व्यक्ति के साथ गाली-गलौज करने लग जाते हैं। और फिर वह पूरा कॉफी शॉप जंग का एक मैदान बन जाता है। चारों तरफ अफरातफरी मच जाती है, कप टूट-फूट जाते हैं और मेजें पलट जाती हैं। उसके बाद उस दुकान के मालिक के पास जगह की सफाई कराने के सिवाय कोई चारा नहीं रह जाता है। जब वह नए सिरे से अपनी दुकान खोलने ही वाला होता है कि उसे कह दिया जाता है कि उसकी वजह से आस-पड़ोस प्रभावित हो रहा है। अगर वह अपने ग्राहकों को काबू में नहीं रख सकता है तो उसे कॉफी शॉप चलाने की इजाजत नहीं मिलेगी।

 
सोशल मीडिया कंपनियों को भी कुछ इसी तरह की गड़बड़ी का सामना करना पड़ रहा है। ये कंपनियां एक प्लेटफॉर्म मुहैया कराती हैं और कॉफी शॉप के उलट यह मंच नि:शुल्क होता है। उस प्लेटफॉर्म पर जाकर लोग बात करते हैं, बहस करते हैं, झगड़ा करते हैं और अपने जैसी सोच वालों के साथ वक्त बिताते हैं। लेकिन इस मंच के एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म होने के चलते वहां पर सभी तरह के लोग भी मौजूद होते हैं। उन्हें आपकी कही बातें पसंद नहीं आती हैं या आपको उनकी बातें नागवार गुजरती हैं। ऐसे में किसी रात्रिभोज की तरह मामला शिष्ट असहमति पर जाकर नहीं खत्म होता है। एक-दूसरे से असहमत हुए लोग गाली-गलौज करने लग जाते हैं और कई बार उनका यह विषवमन मारपीट, हत्या और दंगे की भी शक्ल ले लेता है।
 
इसके लिए क्या आप इस मंच को दोषी ठहरा सकते हैं? निश्चित रूप से तकनीकी कंपनियां संवाद के इस मंच को बेहतर संचालित कर सकती हैं। फेसबुक के पास हमारे बारे में तमाम आंकड़े मौजूद हैं। वहीं अपशब्दों के इस्तेमाल, धमकी देने और फर्जी वीडियो के प्रसार पर ट्विटर का कोई काबू ही नहीं दिखता है। लेकिन क्या ट्विटर के सीईओ एवं संस्थापक जैक डोर्सी को संसदीय समिति के समक्ष पेश होने से हालात सुधर जाएंगे? समस्या हम लोग हैं। शायद अब वक्त आ गया है कि एक नागरिक, दर्शक और एक सामान्य इंसान होने के नाते हम अपने व्यवहार की जिम्मेदारी लेना शुरू करें। शायद अब वक्त आ गया है कि हम 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' से हासिल ज्ञान के आधार पर इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति और अन्य मुद्दों पर चर्चा के बुनियादी नियम तय कर लें। अधिकांश दिनों में सोशल मीडिया पर होने वाली बहसों में शामिल लोगों के पास या तो संबंधित जानकारी ही नहीं होती है या फिर अधकचरा ज्ञान होता है। किसी भी फर्जी संदेश या वीडियो पोस्ट के बारे में तथ्यों की पुष्टि के लिए 3-5 मिनट ही लगते हैं लेकिन आप ऐसा तभी करते हैं जब आप अपनी पुरानी धारणाओं से मेल खाने वाली पोस्ट के जाल में उलझना नहीं चाहते हैं।
 
सच्चाई यह है कि मास मीडिया, खासकर समाचार मीडिया ने भारत और भारतीयों दोनों को नाकाम किया है। भारत में कोई समाचार चैनल या समाचारपत्र लाना जितना आसान हुआ है, उनकी गुणवत्ता उतनी ही खराब हुई है। भारत के पास दुनिया भर में सबसे ज्यादा 400 समाचार चैनल हैं जिनमें से अधिकांश चैनल अब पत्रकारिता के बुनियादी नियमों का भी पालन नहीं करते हैं। कई चैनल सरकार के प्रवक्ता बन चुके हैं, दूसरे चैनल नफरत फैलाने और भीड़ को उकसाने में लगे रहते हैं। उनमें से एक भी चैनल को किसी संसदीय पैनल ने नहीं बुलाया और न ही उनका लाइसेंस निरस्त किया गया। इन चैनलों को समाचार चैनलों की प्रतिनिधि संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) से भी कोई नोटिस नहीं भेजा गया है। एनबीए इन चैनलों की अपने स्तर पर गठित नियामक संस्था है लेकिन अपने मकसद में काफी हद तक नाकाम रही है। 
 
खबरों के प्रसारण व्यवसाय में सबसे बड़ी समस्या स्वामित्व से जुड़ी हुई है। भारत के आधे से अधिक समाचार चैनलों का स्वामित्व ऐसे लोगों या कंपनियों के पास है जिनकी अच्छी गुणवत्ता वाली पत्रकारिता में कोई रुचि ही नहीं है। चैनल लाने के पीछे सोच यही होती है कि प्रभाव पैदा किया जा सके, अपने लिए कुछ फायदे उठाए जा सकें या दुष्प्रचार फैलाने का माध्यम बन सके। भारत में तेजी से फैलते टेलीविजन उद्योग में खबरों का हिस्सा तो बहुत ही छोटा और गैर-लाभदायक समूह में है। जांच-पड़ताल, विश्लेषण और संबंधित जगह पर जाकर खबर देने में यकीन करने वाला कोई भी ईमानदार समाचार संस्थान बढिय़ा फंडिंग वाले उकसाऊ चैनलों से प्रतिस्पद्र्धा भला कैसे कर सकता है? 
 
तमाम बहसों में इस पर खूब चर्चा होती है कि समाचार चैनल किस तरह टीवी रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) के पीछे भागते रहते हैं। टीआरपी असल में टीवी दर्शकों की संख्या मापने का जरिया है। ऐसे में चैनल अगर टीआरपी की फिक्र नहीं करेंगे तो कौन करेगा? ऐसे में समय आ गया है कि हम दर्शक एवं भारतीय नागरिक के तौर पर सोशल मीडिया या समाचार चैनल पर फैलाई जा रही नफरत और बुरे बरताव को खारिज कर दें। एक पत्रकार, संपादक, विशेषज्ञ, अजनबी शख्स या आपके मित्र की किसी मुद्दे पर आपसे अलग राय हो सकती है लेकिन किसी भी व्यक्ति को हिंसा या अपशब्दों के जरिये अपनी असहमति जाहिर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। नफरत फैलाने में क्यों शामिल हों? अगर हम ऐसा करते हैं तो फिर ट्विटर या फेसबुक से यह उम्मीद क्यों करें कि वे हमारे समाज की गंदगी साफ करेंगे। वह भी तब जब हम असहमत होने पर भी सहमत न हो सकें। 
Keyword: social media, twitter, facebook, tv channel,,
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