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आईडीबीआई बैंक का कैसे हो कायाकल्प?

तमाल बंद्योपाध्याय /  March 01, 2019

आईडीबीआई बैंक को आईसीयू से हटाकर एचडीयू में स्थानांतरित किया जा रहा है। इस बैंक के भावी परिदृश्य पर विस्तार से नजर डाल रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के लिए रखी गई भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की खुली पेशकश में कहा गया था कि निजी बैंकों के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तमाम निर्देश और बैंकिंग अधिनियम के सभी प्रावधान इस पर लागू होंगे। इसका मतलब है कि आईडीबीआई बैंक को एक निजी बैंक मानते हुए उस पर ये नियम एवं दिशानिर्देश लागू होंगे। हालांकि आरबीआई इस बैंक को 'सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंक' की श्रेणी में रखे हुए है। यह घटनाक्रम संकट में फंसे आईडीबीआई बैंक के समक्ष अस्तित्व की दुविधा पैदा कर देता है। 
 
बैंक ने लगातार नौवीं तिमाही में अक्टूबर-दिसंबर 2018 के दौरान 4,185.5 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा उठाया था। इसके चलते सितंबर 2015 के बाद से उसका कुल घाटा बढ़कर 28,000 करोड़ रुपये हो गया। आरबीआई ने सितंबर 2015 में ही परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा करने के बाद बैंकों को मार्च 2017 तक तस्वीर साफ करने का निर्देश दिया था। आईडीबीआई बैंक का दिसंबर तिमाही में घाटा और अधिक होता लेकिन उसे कर के मद में चुकाई गई 1,620 करोड़ रुपये वापस मिल गई थी। इसने आखिरी बार सितंबर 2017 में 55.52 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया था। 
 
एलआईसी ने जनवरी में खुली पेशकश के बाद अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 51 फीसदी कर दी थी। उसने बैंक में सितंबर 2018 के बाद से छह किस्तों में 21,624 करोड़ रुपये डाले हैं। इसमें नई जान डालने के लिए उसे कितनी और रकम लगाने की जरूरत होगी? क्या यह फंसी हुई रकम पाने के लिए अपने पास रखे पैसे भी फेंकने का क्लासिक उदाहरण है? साफ-साफ कहें तो आईडीबीआई बैंक के साथ सब कुछ बुरा ही नहीं है। कुछ मोर्चों पर हालात सुधरे भी हैं। पूंजी पर्याप्तता अनुपात का 12.51 फीसदी पर पहुंचना सबसे अहम सुधार है। भले ही बैंक का घाटा उठाने का सिलसिला जारी है लेकिन प्रावधान कवरेज अनुपात बढ़कर 75.21 फीसदी पर पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि बैंक ने अपनी फंसी परिसंपत्तियों का तीन-चौथाई हिस्सा कवर करने के लिए रकम का प्रावधान कर रखा है और भविष्य में ऐसी परिसंपत्तियों की वसूली होने पर उसका मुनाफा ही बढ़ेगा। 
 
असल में, दिसंबर तिमाही में बैंक को हुए भारी घाटे की बड़ी वजह भारी-भरकम रकम का प्रावधान थी। बैंक का सकल फंसा कर्ज मामूली गिरावट के साथ आवंटित कर्ज का 29.67 फीसदी हो गया और इसका शुद्ध फंसा कर्ज भी 14.01 फीसदी रहा है। जब किसी बैंक का कर्ज बढ़ता है तो खराब परिसंपत्तियों का अनुपात कम होने का आभास होता है लेकिन आईडीबीआई बैंक का ऋण पोर्टफोलियो कम हो रहा है। एक और सुखद संकेत यह है कि इसके कुल ऋण खाते में भले ही ढांचागत क्षेत्र की हिस्सेदारी 18 फीसदी है लेकिन कुल ऋण में खुदरा कर्जों का अनुपात 48 फीसदी हो चुका है जबकि दो साल पहले यह 41 फीसदी था। इस दौरान कम लागत वाले चालू एवं बचत खातों की हिस्सेदारी भी जमा का 38.36 फीसदी पर पहुंच चुकी है जबकि दो साल पहले यह 36.14 फीसदी था। अगर यही दर कायम रहती है तो आईडीबीआई बैंक को अगली दो तिमाहियों में आरबीआई के त्वरित उपचारात्मक कदम (पीसीए) दायरे से बाहर आ जाना चाहिए। पीसीए में शामिल बैंकों पर कई तरह की रोक होती है।
 
सवाल है कि क्या यह समय जश्न मनाने का है? चिकित्सकीय शब्दावली में कहें तो आईडीबीआई बैंक को शायद गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) से हटाकर उच्च निर्भरता कक्ष (एचडीयू) में भेजा जा रहा है। एचडीयू में भी लगातार गहन चिकित्सा की जरूरत होती  है लेकिन वहां पर नर्स और रोगियों का अनुपात कम होता है। सिद्धांत रूप में एलआईसी के हाथों आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण दोनों के लिए आश्चर्यजनक हो सकता है। दोनों के कारोबार में सामंजस्य बिठाने के लिए एक कार्यबल बनाया गया है। एलआईसी ने देश भर में फैली आईडीबीआई शाखाओं में बीमा पॉलिसी बेचने का प्रशिक्षण सत्र चलाना शुरू भी कर दिया है। तकनीकी रूप से इसे बैंकश्योरेंस कहते हैं जिसका मतलब एक बैंक एवं एक बीमा कंपनी के बीच हुए करार से होता है। इस समझौते के तहत बैंक अपने ग्राहकों को बीमा कंपनी की पॉलिसी बेचने में मदद करता है। यह साझेदारी दोनों पक्षों के लिए लाभदायक होती है क्योंकि बैंकों को बीमा उत्पादों की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व मिलता है और बीमा कंपनी को भी सेल्स टीम बढ़ाए बगैर ग्राहक आधार बढ़ाने का मौका मिल जाता है।
 
आईडीबीआई बैंक की 1800 से अधिक शाखाओं की मौजूदगी और इसके 14 करोड़ ग्राहक एलआईसी के लिए बीमा बेचने में मददगार साबित होंगे। दूसरी तरफ बैंक भी एलआईसी के विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल अपने खुदरा कर्जों के लिए कर सकता है। एलआईसी के पास बड़ी मात्रा में दीर्घावधि रकम है जिसकी मदद बैंक अपने प्रोजेक्ट कर्जों के लिए कर सकता है। भविष्य में एलआईसी अपनी मॉर्टगेज इकाई का बैंक में विलय भी कर सकती है। आईडीबीआई बैंक के कुल कर्जों में से आवासीय ऋण की हिस्सेदारी 11.50 फीसदी है।
 
ये तमाम संभावनाएं सिद्धांत रूप में मुमकिन हैं। लेकिन एलआईसी के पास बैंक चलाने का कोई अनुभव नहीं है और आईडीबीआई बैंक को भी बैंकिंग संचालन ठीक तरह से आता तो ऐसे हालात पैदा नहीं हुए रहते। इसका मतलब है कि बैंक का संचालन पेशेवर प्रबंधन के पास होना चाहिए जो एक काबिल बोर्ड के अधीन काम करे। एलआईसी से आने वाले इकलौते निदेशक को छोड़ दें तो अभी तक बैंक के बोर्ड का पुनर्गठन नहीं हुआ है। अब इस बैंक में सरकारी की हिस्सेदारी घटकर भले ही 46.46 फीसदी पर आ गई है लेकिन बैंक के मुखिया अक्सर वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग में ही नजर आते हैं। उन्हें वहां पर क्यों दिखना चाहिए? आईडीबीआई बैंक को बचाने के लिए किए गए इस प्रयोग की सफलता के लिए कंपनी संचालन अहम है। अगर इसका संचालन पहले की ही तरह होता रहा और एलआईसी सरकार का प्रतिनिधि ही बनी रही तो फिर इसका कोई भविष्य नहीं है। 
 
अक्टूबर 2018 में बैंक के एमडी एवं सीईओ नियुक्त हुए राकेश शर्मा पखवाड़े भर में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उनके पूववर्ती बी श्रीराम का कार्यकाल तो महज तीन महीने ही रहा था। इतने अहम मोड़ पर बैंक के सीईओ का इतना कम कार्यकाल होना गंभीरता नहीं दर्शाता है।  एलआईसी को दिसंबर 2031 तक अपनी हिस्सेदारी घटाकर 40 फीसदी पर लानी होगी। 12 साल का वक्त काफी लंबा है लेकिन एलआईसी के लिए इस निवेश का लाभपरक होना इस पर निर्भर करेगा कि वह बैंक का संचालन कैसे करता है?
 
अप्रैल 2001 में जर्मनी की बीमा कंपनी आलियांज एसई ने ड्रेस्डनर बैंक को खरीदकर बैंकिंग, बीमा और निवेश बैंकिंग तीनों कारोबार का समावेश किया था। इसके जरिये दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की सोच थी लेकिन ड्रेस्डनर पर 35.5 अरब यूरो के कर्ज ने ऐसा होने नहीं दिया। नतीजतन अगस्त 2008 में आलियांज ने इस बैंक को 9.8 अरब यूरो में बेच दिया। यह अलग बात है कि अब आईडीबीआई बैंक के पास खोने के लिए कुछ अधिक नहीं है। फरवरी 2016 के बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आईडीबीआई बैंक के कायाकल्प की जिक्र किया था। देखते हैं कि यह कायाकल्प किस तरह आकार लेता है?
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA, IDBI,,
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