बिजनेस स्टैंडर्ड - नाकाम कंपनियों से निजात अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर
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नाकाम कंपनियों से निजात अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

अजय शाह /  February 28, 2019

देश में मंदी का सिलसिला लंबा चलने की एक वजह यह भी है कि हमारे यहां नाकाम कंपनियों का बंद होना उतना आसान नहीं है। इस विषय में विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह 

 
पिछले दिनों इसी समाचार पत्र में प्रकाशित टी एन नाइनन के आलेख में हमने देखा कि कैसे निजी कारोबारियों को खराब कारोबारी माहौल में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। हमारे देश में राज्य और बाजार के बीच के रिश्तों की व्यवस्था भी कठिनाइयों से भरी हुई है। इस बीच आशा की किरण भी है: कमजोरों के बाजार से बाहर जाने से बचे हुए कारोबारियों का मुनाफा बढ़ता है क्योंकि कच्चे माल की कीमत कम होती है और उत्पादन मूल्य बढ़ता है। दिवालिया सुधार के साथ कारोबार से बाहर निकलने की प्रक्रिया तेज हुई है। बहिर्गमन की प्रक्रिया सहज होने से कारोबारी चक्र में धीमापन भी कम अवधि के लिए आता है।
 
कारोबारी मंदी का संबंध निजी क्षेत्र के आशावाद और निवेश से भी है। देश में आशावाद कम क्यों हो रहा है? बुनियादी क्षेत्र की हर कंपनी के पास बताने के लिए यह किस्सा है कि सरकार समय पर भुगतान नहीं करती और सरकारी तंत्र अनुबंध उल्लंघन से हिचकिचाता नहीं है। इसी प्रकार, नियमन की अस्थिरता, कराधान और एजेंसियों ने कई कारोबारों को प्रभावित किया है। सरकारी सुसंगतता की कमी और विधि के शासन के अभाव ने कारोबारी भावना और निवेश को कमजोर किया है। निवेश में तेजी तभी आती है जब सुधार से जुड़ी टीम इन दिक्कतों को दूर करती हैं।
 
यह एक प्रतिस्पर्धी लड़ाई है जो हर प्रासंगिक बाजार में नजर आती है। विभिन्न कंपनियों का अंत बची कंपनियों के मुनाफे में इजाफा करता है। हम यहां इसी प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करेंगे। कारोबारी चक्र की परिस्थितियों में सन 2011-12 में बदलाव आया। उस वक्त करीब 40 फीसदी भारतीय कंपनियों पर भारी कर्ज था और उनका राजस्व और मुनाफा अत्यंत कमजोर थे। अधिकांश मामलों में एक जगह से उधार लेकर दूसरे का कर्ज चुकाया जा रहा था। इसमें वे बैंक भी मददगार थे जो बुरी खबर छिपाना चाहते थे।
 
बुरी खबरें लगातार सामने आती रहीं। आईबीसी ने इसमें सहायता की। बैंकिंग नियमन में भी थोड़ा सुधार हुआ। सबसे पहले ऋण बैंकों से म्युचुअल फंड और फिर एनबीएफसी की ओर स्थानांतरित हुआ। अगस्त 2018 में आईएलऐंडएफएस के डिफॉल्ट के बाद अब अधिक सतर्कता बरती जा रही है और ऋण का स्थानांतरण मुश्किल हो रहा है। हम अर्थशास्त्रियों के पास चिंतित निजी कारोबारियों के लिए भी अच्छी खबर है। कुछ निजी कारोबारों की विफलता बची हुई कंपनियों के लिए मददगार साबित होगी। हमने कंपनियों के अंत के लिए एक आशावादी जुमला गढ़ा-रचनात्मक विनाश। 
 
जापानी अर्थव्यवस्था में लंबे ठहराव ने एक नये शब्द को जन्म दिया था- जॉम्बी फर्म। यानी ऐसी कंपनी जो मृत प्राय हो लेकिन कृत्रिम तरीके से बाजार में अपना अस्तित्व बनाए हो। इन कंपनियों की मौजूदगी प्रतिस्पर्धी कंपनियों की सेहत और उनके निवेश को प्रभावित करती है। एयर इंडिया की मौजूदगी और हर वर्ष उसमें करदाताओं का पैसा लगाने से समूचे विमानन उद्योग की सेहत पर असर पड़ता है। जब हम जॉम्बी कंपनियों का पोषण करते हैं तो इन पर होने वाले व्यय का असर समूचे औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ता है। 
 
मिसाल के तौर पर रिलायंस कम्युनिकेशंस के बाजार से बाहर जाने से दूरसंचार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कम हुई और बची हुई कंपनियों का मुनाफा बेहतर हुआ है। यह प्रक्रिया हर उद्योग में चल रही है और किसी कंपनी के पतन पर बची हुई कंपनियां राहत की सांस लेती हैं। इसके अनुकूल प्रभाव कहीं अधिक गहन होते हैं। अगर एक एयर इंडिया कारोबार से बाहर होती है तो बची हुई कंपनियों को संसाधन मिलते हैं। जब उसके विमान चालक अन्य निजी कंपनियों में रोजगार तलाशते हैं तो उनकी लागत में कमी आती है। जब एयर इंडिया कारोबार से बाहर होती है तो ऋण के नए माध्यम तैयार होते हैं और अन्य कंपनियां इसका प्रयोग कर सकती हैं।
 
जब देश भर में मौजूद एयर इंडिया की अचल संपत्ति की बिक्री होगी तो इससे सबके लिए उनका मूल्य कम होगा। चूंकि इनमें से कई जगहें अन्य विमानन कंपनियों के लिए भी अनुकूल होंगी तो जाहिर है उन्हें इसका अधिक फायदा मिलेगा। रिलायंस कम्युनिकेशंस द्वारा स्पेक्ट्रम की बिक्री से शेष सभी कंपनियों के लिए वह सस्ता होगा। यानी बची हुई कंपनियों को उत्पाद बाजार में उत्पाद मूल्य और कारक बाजार में उत्पाद कारक, दोनों जगह राहत मिलेगी। जमीन, श्रम और पूंजी की कम कीमतों के कारण मंदी के बाद के दौर में मुनाफा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। इस दलील के आधार पर देखें तो खस्ताहाल कंपनियों का जितनी जल्दी बहिर्गमन हो, अर्थव्यवस्था के लिए उतना ही बेहतर होता है। नाकाम कंपनियों का परिचालन जारी रखना अर्थव्यवस्था के लिए बेहद नुकसानदेह होता है। उनको निपटाकर आगे बढऩा ही उचित विकल्प है। दिवालिया संहिता के पीछे यही दलील है और इसी वजह से दिवालिया प्रक्रिया में नकदीकरण और निस्तारण को लेकर कोई पूर्वग्रह नहीं होना चाहिए।
 
हाल के दशकों की बात करें तो सन 1990 के दशक में निवेश में तेजी आई। उसके बाद सन 1998 से 2002 तक मंदी रही। 2003 से 2011 तक फिर अच्छे दिन आए और 2011 से मंदी का चक्र फिर चला। सन 1998 से 2002 और 2011 से अब तक का समय काफी कठिनाई भरा रहा है। सवाल यह भी है कि हमारे यहां मंदी का चक्र इतना लंबा क्यों चलता है। एक वजह तो यह है कि कमजोर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों का बहिर्गमन धीमा होता है। बैंकिंग नियमन और सरकारी तंत्र अब तक ऐसे रहे हैं कि मृतप्राय कंपनियों को ढोया जाता रहा है। आईबीसी के आगमन के बाद हालात बदल रहे हैं। आधुनिक बैंकिंग नियमन और दिवालिया प्रक्रिया के साथ कम उत्पादकता वाली कंपनियों का निपटान तेज हुआ है। इससे मंदी का चक्र धीमा होगा। टी एन नाइनन का आलेख पढ़ते हुए मुझे लगा कि कुछ कंपनियों का नाकाम होना प्रतिद्वंद्वियों के लिए कितना अच्छा रहा होगा। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से भी ऐसी कंपनियों का नकदीकरण अच्छी पहल है।
 
कम उत्पादकता वाली किसी निरंतर परिचालित फर्म के साथ यह जोखिम हो सकता है कि उसके अंशधारक भावुक हों या अवैध तरीके से नकदी का परिचालन हो रहा हो और इसलिए अंशधारक कम पूंजी प्रतिफल वाली कंपनी से जुड़े हुए हों। ऋण, चुकता करने का दबाव और दिवालिया प्रक्रिया ऐसी भावनाओं पर अंकुश लगाते हैं। नकदीकरण का दबाव कंपनी को मजबूर करता है कि वह प्रदर्शन सुधारे या बाजार से बाहर हो जाए। यह अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा है।
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: india, economy, election,,
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