बिजनेस स्टैंडर्ड - अनुमान से कमतर
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अनुमान से कमतर

संपादकीय /  February 28, 2019

केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2018-19 के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के दूसरे अग्रिम अनुमान गुरुवार को जारी किए।  इन अनुमानों में वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर 2018 की अवधि के तिमाही अनुमान शामिल हैं। ये आंकड़े नकारात्मक हैं और इसलिए थोड़ा चौंकाते हैं। इतना ही नहीं, इनके चलते वर्ष 2018-19 में पूरे वर्ष के जीडीपी वृद्घि अनुमान को पिछले 7.2 फीसदी के स्तर से कम करके 7 फीसदी करना होगा। दरअसल जीडीपी वृद्घि में गिरावट स्पष्टï नजर आ रही है। तीसरी तिमाही में केवल 6.6 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई। 
 
यह सच है कि तीसरी तिमाही में भारत की वृद्घि दर अभी भी चीन से तेज है जिसने दिसंबर तिमाही में केवल 6.4 फीसदी की दर दर्ज की। लेकिन यह हमारे लिए कोई बड़ी सांत्वना नहीं है।  दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर 2018 के बीच 7 फीसदी की वृद्घि दर देखने को मिली और अप्रैल से जून में वर्ष की पहली तिमाही के दौरान 8 फीसदी की जीडीपी वृद्घि देखने को मिली थी। यह मामूली गिरावट नहीं है। चिंतित करने वाली एक बात यह भी है कि वर्ष 2017-18 में 5 फीसदी की मजबूत वृद्घि के बाद कृषि क्षेत्र के चालू वित्त वर्ष में केवल 2.7 फीसदी की दर से विकसित होने की आशंका उत्पन्न हो गई है। यह अनुमान मूलभूत कीमतों पर सकल मूल्यवर्धन के रूप में लगाया गया है। खाद्य पदार्थों की थोक कीमतों में 0.8 फीसदी की ऋणात्मक अपस्फीति के साथ यह संभावित कृषि संकट की ओर भी संकेत करता है जिस पर सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। 
 
ऐसा प्रतीत होता है कि धीमी वृद्घि दर की एक वजह सरकारी व्यय की दर में कटौती भी हो सकती है। केंद्र सरकार का राजस्व व्यय जिसे इस व्यय का अहम संकेतक माना जाता है (शुद्घ ब्याज भुगतान और सब्सिडी) उसमें अप्रैल से दिसंबर 2018 के दौरान केवल 9.2 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई जबकि एक वर्ष पहले की समान अवधि में यह दर 16.7 फीसदी थी। सरकारी क्षेत्र के लिए मूलभूत कीमतों पर सकल मूल्यवर्धन के चालू वित्त वर्ष के दौरान 8.5 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह वृद्धि दर 12 फीसदी थी। इससे यह संकेत मिलता है कि अतीत की वृद्घि को सरकारी व्यय ने काफी हद तक सहारा दिया था और अब राजकोषीय गणित कुछ ऐसा है जो इस वृद्घि मॉडल का स्थायित्व छीन रहा है। 
 
बहरहाल, कुछ अच्छी खबर भी है जो यह बताती है कि देश में निजी निवेश आधारित वृद्घि की राह स्थायी और सामान्य हो सकती है। सकल स्थायी पूंजी निर्माण या जीएफसीएफ के चालू वित्त वर्ष के दौरान मौजूदा और स्थिर कीमतों पर जीडीपी के क्रमश: 28.9 फीसदी और 32.3 फीसदी रहने का अनुमान है।  यह गत वित्त वर्ष की क्रमश: 28.6 फीसदी और 31.4 फीसदी की दर से बेहतर है। जीएफसीएफ की दर वित्त वर्ष 2018-19 की तीसरी तिमाही में भी पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही की तुलना में बेहतर है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि विनिर्माण क्षेत्र में चालू वित्त वर्ष के दौरान 8 फीसदी से अधिक की दर से वृद्घि होनी है जबकि पिछले वर्ष यह बमुश्किल 6 फीसदी की दर से बढ़ा था।  इसका आकलन मूलभूत कीमतों पर सकल मूल्यवर्धन के आधार पर किया जाता है। अगर सब सटीक रहा तो हमें इसका फायदा निजी कारोबारी जगत की आय में सुधार के रूप में देखने को मिलेगा क्योंकि विनिर्माण उत्पादन में उसका योगदान तीन चौथाई से अधिक है।
Keyword: GDP, fiscal deficit, dollar, bond, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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