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राजकोषीय मोर्चे पर बेहतर योगी सरकार का प्रदर्शन

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 27, 2019

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने हिंदुत्ववादी राजनीति के चलते प्राय: खबरों में रहते हैं। लेकिन उनकी सरकार के राजकोषीय प्रदर्शन पर बहुत कम ध्यान ही दिया गया है। यहां तक कि उनकी सरकार के नवीनतम बजट के बारे में भी अखबारों में सुर्खियां यही बनी कि योगी सरकार ने गायों के आश्रयस्थल बनाने के लिए 400 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। योगी सरकार के इस तीसरे बजट में राज्य की वित्तीय स्थिति के बारे में कम ही चर्चा हुई है। इसकी वजह यह नहीं है कि राज्य के बजट के बारे में ब्योरा आसान फॉर्मेट में तत्काल मुहैया नहीं हो पाता है। राज्यों में बजट पेश होने के कई महीने बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) राज्यों के बजट के बारे में अपना वार्षिक प्रकाशन लाता है। उसके बाद ही राज्य के बजट के बारे में कोई समुचित विश्लेषण किया जा सकता है जिसमें राजस्व और व्यय के मोर्चे पर पिछले साल की तुलना में अध्ययन किया जा सके। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की एक रिपोर्ट इस खाई को भरने की कोशिश करती है। इसमें वित्त वर्ष 2019-20 के लिए अब तक आठ राज्यों में पेश बजटों का ब्योरा दिया गया है।

 
यह रिपोर्ट योगी सरकार के बारे में लोकप्रिय धारणा के उलट नजरिया पैदा करती है। इस सरकार के तीनों बजट बताते हैं कि राज्य ने राजकोषीय मजबूती की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार के अंतिम वित्त वर्ष 2016-17 में उत्तर प्रदेश का राजकोषीय घाटा सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 4.5 फीसदी रहा था। लेकिन योगी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले ही वित्त वर्ष 2017-18 में इसे 2.02 फीसदी पर ला दिया। ये दोनों ही आंकड़े वास्तविक हैं और ऑडिट जांच से गुजर चुके हैं। योगी सरकार के दूसरे बजट 2018-19 में संशोधित अनुमानों के मुताबिक राजकोषीय घाटा थोड़ा बढ़कर 2.97 फीसदी हो गया था। वर्ष 2019-20 के बजट में वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल ने राजकोषीय घाटे के जीएसडीपी का 2.97 फीसदी ही रहने का अनुमान जताया है। वित्त आयोग ने राज्यों में राजकोषीय घाटे को जीएसडीपी के तीन फीसदी के दायरे में तय किया हुआ है और उत्तर प्रदेश भी अब गुजरात, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक के बाद इस सीमा के भीतर रहने वाला राज्य बन चुका है। राज्य के राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों के बीच के फासले यानी राजस्व संतुलन के बारे में क्या स्थिति है? इस मामले में भी उत्तर प्रदेश अधिशेष स्थिति हासिल कर चुके गिने-चुने राज्यों में शामिल हो चुका है। राजस्व अधिशेष 2017-18 में जीएसडीपी के 0.91 फीसदी पर खिसक आया था लेकिन 2018-19 में यह बढ़कर 3.2 फीसदी पर जा पहुंचा था। हालांकि अगले वित्त वर्ष में अधिशेष के 1.76 फीसदी ही रहने का अनुमान जताया गया है।
 
ऐसा हो पाने की संभवत: बड़ी वजह यह है कि राज्य के अपने कर राजस्व में तीव्र वृद्धि हुई है। योगी सरकार के पहले साल में उत्तर प्रदेश का अपना कर राजस्व वर्ष 2017-18 में 8 फीसदी बढ़कर 97,393 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। लेकिन 2018-19 में 38 फीसदी की नाटकीय उछाल होने से राज्य सरकार का कर राजस्व 1.34 लाख करोड़ रुपये पर जा पहुंचा। जिस तरह 2018-19 में हुई जबरदस्त उछाल चौंकाने वाली है, कुछ उसी तरह 2019-20 में कर राजस्व में महज 4 फीसदी वृद्धि होने का अनुमान भी अचंभित करता है।
 
क्या यह उछाल उत्तर प्रदेश के अपने कर राजस्वों पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के  पहले पूर्ण वर्ष का नतीजा थी? और अब जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाए जाने और उनमें कटौती के बाद कई क्षेत्रों को नई रियायतें दी जा चुकी हैं जिससे कर राजस्व में वृद्धि धीमी ही रहने के आसार हैं। वर्ष 2018-18 में उत्तर प्रदेश के लिए जीएसटी राजस्व 1.06 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान था और 2019-20 में इसमें तीन फीसदी बढ़ोतरी का ही अनुमान है। अगर आने वाले वर्षों में जीएसटी संग्रह में सुस्ती आने से उसके कर राजस्व में वृद्धि स्थिर होती है तो राज्य सरकार के लिए यह निश्चित रूप से एक चुनौती होगी।
 
योगी सरकार के कार्यकाल में ध्यान देने लायक एक और बात उसके पूंजीगत व्यय से जुड़ी हुई है। यह 2018-19 में 110 फीसदी की जबरदस्त उछाल के साथ 1.17 लाख करोड़ रुपये जा पहुंचा जबकि 2017-18 में यह 55,599 करोड़ रुपये था। वर्ष 2019-20 में पूंजीगत व्यय के मामली गिरावट के साथ 1.16 लाख करोड़ रुपये रहने के अनुमान जताए गए हैं। सरकार के कुल व्यय में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी 2017-18 के 17 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 26 फीसदी पर जा पहुंची और अगले वित्त वर्ष में इसके 24 फीसदी पर रहने का अनुमान है। राज्य के कुल व्यय में पूंजीगत व्यय की हिस्सेदारी को चौथाई स्तर तक पहुंचाना एक ऐसी उपलब्धि है जो बहुत कम राज्य ही हासिल कर पाए हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने उत्तर प्रदेश के लिए पूंजी परिव्यय का भी गणना की है और इसे पूंजीगत व्यय के एक ऐसे अवयव के तौर पर परिभाषित किया है जिसका प्रत्यक्ष इस्तेमाल परिसंपत्ति निर्माण में होता है। इस तरह का पूंजी परिव्यय भी 2018-19 में दोगुना होकर 88,528 करोड़ रुपये रहा है और 2019-20 में इसके आंशिक गिरावट के साथ 77,641 करोड़ रुपये रहने की संभावना है। दूसरे शब्दों में, योगी सरकार ने अपने बजटों में पूंजी व्यय से होने वाले परिसंपत्ति निर्माण को नजरअंदाज नहीं किया है। देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश का जीएसडीपी आकार 14.76 लाख करोड़ रुपये है और इस वजह से वह पांच शीर्ष राज्यों में शामिल है। इसी के साथ उत्तर प्रदेश देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से भी एक है। लेकिन अगर राज्य राजकोषीय समझदारी दिखाता है और परिसंपत्ति निर्माण पर अधिक खर्च करता है तो वह राजकोषीय मोर्चे पर कुछ सही कदम तो उठा ही रहा है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि आर्थिक विश्लेषक उत्तर प्रदेश के राजकोषीय प्रदर्शन पर गौर करें? इससे राज्य में आर्थिक वृद्धि की संभावना के बारे में बेहतर समझ पैदा करने में मदद मिलेगी। 
Keyword: yogi adityanath, hindu, GDP,,
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