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रोजगार सृजन से होगी शांति कायम

नौशाद फोब्र्स /  February 27, 2019

कश्मीर घाटी में शांति बहाली में रोजगार सृजन की अहम भूमिका है, हालांकि पुलवामा आतंकी घटना के बाद से इस विषय पर शायद ही कोई बात कर रहा है। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं नौशाद फोब्र्स 

 
इस बात से तो सभी सहमत होंगे कि हमारी प्रमुख राष्ट्रीय प्राथमिकता रोजगार सृजन है। इस समाचार पत्र के विभिन्न पन्नों पर भी पिछले कुछ दिनों के दौरान राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के भूतपूर्व और वर्तमान सदस्य रोजगार संबंधी अपनी ही रिपोर्ट की सत्यता को लेकर बहस मुबाहिसा करते नजर आए हैं। ऐसी खबरें सुर्खियों में रही हैं जहां सरकार में शामिल लोग रोजगार सृजन की बात करते नजर आए जबकि विपक्षी दल रोजगार समाप्त होने या कम होने की दुहाई देते दिखे। यह सिलसिला उस समय थम गया जब पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवानों पर आतंकी हमला हुआ। तब से लेकर अब तक अखबार और टेलीविजन दोनों जगह इस आतंकी हमले से जुड़ी घटनाओं का ही बोलबाला है। पुलवामा में हुए आतंकी हमले के ऐन पहले तक यह आलेख पूरी तरह रोजगार के बारे में होना था लेकिन अब यह कश्मीर से संबंधित है। ऐसा लग रहा है मानो रोजगार तो फिर भी प्रतीक्षा कर सकते हैं और वह मुद्दा बाद में उठाया जा सकता है। 
 
यह आलेख पुलवामा में हुए आतंकी हमले में मारे गए सीआरपीएफ के 40 जवानों के बारे में नहीं है। इन नौजवानों को असमय काल के गाल में समाना पड़ा, उनके परिवारों पर विपदा टूट पड़ी। यह आलेख संभावित बदले के बारे में भी नहीं है, जिसके परिणाम और अधिक त्रासद हो सकते हैं। एक और बात, यह आलेख प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद का जाप करने वाली राजनीति से भी कतई संबंधित नहीं है। यह आलेख उस त्रासदी के बारे में है जिसका नाम ही कश्मीर है। कश्मीर घाटी किसी भी मानक पर दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। श्रीनगर, गुलमर्ग या पहलगाम का भौगोलिक सौंदर्य तथा लकड़ी का काम, कारपेट एवं कढ़ाई का काम आदि जम्मू कश्मीर को पर्यटन की दृष्टि से स्वर्ग बनाते हैं। 
 
जब हम बच्चे थे तो छुट्टियां मनाने की दृष्टि से कश्मीर हमारे परिवार की पसंदीदा जगह हुआ करती थी। सन 1989 तक हम निरंतर कश्मीर जाया करते थे। उसके बाद सन 2011 तक यह सिलसिला बाधित रहा। सन 2011 के बाद हमने कश्मीर की तीन यात्राएं कीं। कुछ वर्ष पहले तक ऐसा लग रहा था कि कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे हैं। हजारों की संख्या में पर्यटक कश्मीर घाटी का रुख कर रहे थे। इस बात का फायदा कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भी मिल रहा था। दो दशक में पहली बार कश्मीर घाटी में रोजगार के अवसर तैयार हो रहे थे और युवाओं में भविष्य को लेकर उम्मीद जाग रही थी।
 
 सन 2011 और 2011 में 12 में कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने उड़ान नामक एक शानदार पहल की। इसके तहत कश्मीर के हजारों एमबीए और इंजीनियरिंग छात्रों को मुंबई और पुणे के उद्योगों की यात्रा कराई गई। हमारे जैसे जिन लोगों ने अपनी कंपनियों में इन बच्चों की मेजबानी की उन्हें यही लगा होगा कि छात्र हमारी प्रौद्योगिकी देखकर प्रसन्न हुए और हमने अपने प्रबंधन की योग्यता से उन सभी को प्रभावित किया। परंतु उन्होंने हमें बताया कि उन्हें अपने जीवन में पहली बार शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स आदि देखकर सबसे अधिक आनंद आया।
 
यही सबसे बड़ा मुद्दा है। अधिकांश इंसानी आबादी सबसे पहले अच्छी जिंदगी जीना चाहती है। वे अच्छी आजीविका, संतोषजनक रोजगार और ऐसा भविष्य चाहते हैं जो उनके बच्चों को उनसे बेहतर जीवन दे सके। सन 2012 में सीआईआई के छात्र संबंधी कार्यक्रम के बाद हमारी पहली श्रीनगर यात्रा में मेरे भाई ने और मैंने पुणे में हमारे साथ काम करने के लिए करीब छह कश्मीरी एमबीए छात्रों का साक्षात्कार लिया। हमारी बातचीत ऐसे मोड़ पर आ गई जहां हमने उनसे पूछा कि वे भारत, पाकिस्तान और कश्मीर को कैसे देखते हैं। उनका जवाब एकदम स्पष्ट था: सभी बच्चों को अपना भविष्य भारत के साथ नजर आ रहा था। इसके लिए कोई नैतिक वजह या सन 1947 के पहले की कोई वैधानिक स्थिति जिम्मेदार नहीं थी। इसकी एकमात्र वजह भारतीय अर्थव्यवस्था थी। उस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था फलफूल रही थी। उन्हें हमारे साथ ऐसा भविष्य नजर आ रहा था जिसका वे हिस्सा बनना चाहते थे। पाकिस्तान पर वे विचार ही नहीं कर रहे थे। अब हमारे भीतर का राष्ट्रवाद इस बात को लेकर क्रुद्घ हो सकता है कि वे आर्थिक अवसरों की वजह से हमारी ओर आकृष्ट थे। परंतु ध्यान रहे कि उनका आकर्षण कहीं अधिक वास्तविक और मजबूत था। 
 
यह वही भावना है जिसके चलते भारत में जन्मे लेकिन अब अमेरिका में रहने वाले लोगों की संख्या सन 1980 के 10 लाख से बढ़कर आज 30 लाख तक पहुंच गई है। इनमें से अधिकांश तो अब अमेरिका की नागरिकता भी ग्रहण कर चुके हैं। उनकी आर्थिक सफलता की बदौलत ही आज देश के कुछ बड़े राष्ट्रवादी संगठनों की फंडिंग होती है। राष्ट्रवाद को आर्थिक संभावनाओं और अवसरों से जोडऩे वाली यह भावना अत्यंत ताकतवर है।  हमने एमबीए के जिन छात्रों का साक्षात्कार किया वे कोई सामान्य रूढि़वादी बच्चे नहीं थे। उनकी शिक्षा और सीआईआई की पहल की बदौलत वे घाटी के 5 फीसदी भाग्यशाली बच्चों में शामिल थे जबकि उनके 95 फीसदी अन्य भाई- बंधुओं की तकदीर उनके जैसी नहीं थी। 
 
परंतु कश्मीर समस्या का दीर्घकालिक हल इसी में निहित है। कश्मीर में अच्छे स्कूल और कॉलेज खोले जाने की आवश्यकता है ताकि बेहतर मानव संसाधन तैयार हो और उनको बेहतर मूल्यों की शिक्षा दी जा सके। राजनीतिक तौर तरीकों में बदलाव के जरिये कश्मीर घाटी में शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि हजारों की संख्या में पर्यटक आएं और वहां के लोगों को रोजगार मिल सके। कश्मीरी छात्रों के लिए देश भर के स्कूल और कॉलेज खोल दिए जाने चाहिए। उद्योग जगत को बड़ी तादाद में कश्मीरी स्नातकों को अपने यहां जगह देनी चाहिए। एक ऐसे चुनाव प्रचार अभियान की आवश्यकता है जो कश्मीरियों समेत देश के 95 फीसदी लोगों के लिए अवसर तैयार करने की बात कहता हो। रोजगार के अवसर लंबे समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। 
 
(लेखक फोब्र्स मार्शल के को-चेयरमैन, सीआईआई के पूर्व प्रेसिडेंट और सीटीआईईआर के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
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