बिजनेस स्टैंडर्ड - गठबंधन सरकार और देश की अर्थव्यवस्था
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गठबंधन सरकार और देश की अर्थव्यवस्था

नितिन देसाई /  February 26, 2019

केंद्र में मजबूत सरकार हो या कथित कमजोर गठबंधन सरकार, देश की अर्थव्यवस्था को इससे शायद ही कोई फर्क पड़ता है। इस विषय पर विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं नितिन देसाई 

 
गठबंधन सरकारें क्या अर्थव्यवस्था के लिए बुरी होती हैं? यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि आगामी आम चुनाव के बाद त्रिशंकु संसद बनने की संभावना बलवती हो रही है। चिंता मौजूदा सत्ताधारी गठजोड़ जैसे सांकेतिक गठबंधन की नहीं बल्कि एक कमजोर गठबंधन से है जहां सत्ता और अधिकार कई साझेदारों के बीच बंटे हुए हों। अतीत में हमारा पाला कई कमजोर गठबंधनों से पड़ चुका है। ऐसा पहला गठबंधन आपातकाल के बाद सन 1977 में जनता सरकार के रूप में सत्ता में आया और तकरीबन ढाई वर्ष तक चला। दूसरा गठबंधन विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बना और उनकी सरकार दिसंबर 1989 से करीब एक वर्ष तक चली। तीसरा गठबंधन सन 1996 में देवेगौड़ा की सरकार के रूप में सामने आया, उसके बाद सन 1998-99 में वाजपेयी के नेतृत्व वाली पहली गठबंधन सरकार बनी।
 
गठबंधन के इन तीन दौर में आर्थिक प्रदर्शन के संकेतकों पर गौर करने की आवश्यकता है। सन 1977-79 के पहले दौर पर गौर करें तो आर्थिक मोर्चे पर देश के प्रदर्शन में किसी प्रकार की गिरावट देखने को नहीं मिलती है। इस अवधि में वृद्घि दर में इजाफा देखने को मिला और निवेश की दर बढ़ी। इसी प्रकार सार्वजनिक बचत की दर में भी इजाफा हुआ। थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति की बात करें तो उसकी दर सरकार की कार्यावधि के पहले और बाद में काफी कम रही। चालू खाता भी बेहतर स्थिति में था और अधिशेष की स्थिति दर्शा रहा था। 
 
वर्ष 1990-91 का दूसरा दौर और सन 1996-99 में गठबंधन का तीसरा दौर दर्शाता है कि इस अवधि में वृद्घि और सार्वजनिक बचत में कुछ धीमापन दर्ज किया गया। परंतु वर्ष 1990-91 में चालू खाते का घाटा प्रमुख तौर पर उभरकर आया। यही वह वर्ष था जब विनिमय का भीषण संकट उत्पन्न हुआ। सन 1980 के दशक के आर्थिक इतिहास को अगर तार्किक ढंग से परखा जाए तो इससे यही नतीजा निकलता दिखता है कि इस संकट का मूल पहले की एक दल वाली मजबूत सरकारों के कार्यकाल में निहित है। 
 
इन अपेक्षाकृत कमजोर सरकारों द्वारा शुरू की गई कई पहल आज तक जारी हैं। मिसाल के तौर पर मधु दंडवते के बजट में शुरू की गई रोजगार गारंटी योजना या फिर पी चिदंबरम द्वारा सन 1997-98 के आम बजट में पेश किया गया 10-20 या 30 फीसदी का आय कर का दायरा।  इससे यह पता चलता है कि अर्थव्यवस्था प्राय: इस बात से बेपरवाह ही रहती है कि दिल्ली में मजबूत सरकार है या कमजोर। शायद इसका स्पष्टीकरण इस बात में निहित है कि उदारीकरण की प्रक्रिया ने आर्थिक नियंत्रण की प्रक्रिया में बदलाव उत्पन्न किया है और अब नियंत्रण सरकार के बजाय वाणिज्यिक उपक्रमों के हाथ में है। ये वाणिज्यिक उपक्रम मूल रूप से अर्थव्यवस्था को नियंत्रणमुक्त रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि चीजें अधिक से अधिक मांग एवं आपूर्ति से तय होनी चाहिए। 
 
केंद्र सरकार की हस्तक्षेप करने की क्षमता कई मायनों में कम हुई है। सकल जमा निवेश में सरकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी सन 1980 के दशक के मध्य में जहां 60 फीसदी के उच्चतम स्तर पर थी, वहीं अब वह घटकर 25 फीसदी रह गई है। इसका काफी हिस्सा सार्वजनिक उपक्रमों से संबंधित है जिसे न के बराबर या बहुत कम बजट समर्थन मिलता है और ये काफी हद तक बाजार आधारित निजी उपक्रमों के तर्ज पर काम करते हैं। केंद्रीय बजट में वित्तीय हस्तांतरण को छोड़ दिया जाए तो प्रत्यक्ष पूंजीगत व्यय जीडीपी के करीब एक फीसदी के बराबर है और इसका बड़ा हिस्सा रक्षा क्षेत्र में जाता है। राज्य कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि उनका बजट में उल्लिखित विकासात्मक पूंजीगत व्यय जीडीपी के 3 फीसदी के बराबर है। केंद्र सरकार के खुद के बैंक और बीमा कंपनियां हैं लेकिन उसने जिस प्रकार उनका प्रबंधन किया है, उससे मजबूत आर्थिक प्रबंधन की झलक तो कतई नहीं मिलती। जीएसटी के लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था का नियंत्रण अब जीएसटी परिषद के पास है। प्रत्यक्ष कर का ढांचा अब सुव्यवस्थित है और केवल सालाना बजट में केवल मामूली बदलाव ही देखने को मिल रहे हैं। मौद्रिक नीति की जिम्मेदारी अब आरबीआई को सौंप दी गई है। सीमा शुल्क और व्यापारिक नीतियां अब अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अधीन हैं। इसके अलावा उदारीकरण का प्रतिस्पर्धी तर्क भी इस पर लागू होता है। इन तमाम वजहों से केंद्र सरकार का अल्पावधि या मध्यम अवधि के दायरे में अर्थव्यवस्था में किसी भी किस्म का बदलाव लाना केंद्र सरकार के हाथ में नहीं रह गया है। सरकार नोटबंदी जैसे गैरबुद्घिमतापूर्ण तौर तरीके अपनाकर जरूर हस्तक्षेप करती है जो सही साबित नहीं होते। 
 
ऐसे में अगर आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जो दिल्ली में गठबंधन सरकार की संभावनाओं को लेकर चिंतित है तो उनसे कहा जा सकता है: 
 
अगर आपके समाचार पत्र या टेलीविजन में कई बार आपको ऐसी दिल्ली के गलियारों में भ्रम फैला होने से जुड़ी खबर दिखाई देती है तो आप सहज रहिए, भले ही केंद्र के लोग कुछ भी कहें, लेकिन हकीकत यह है कि अर्थव्यवस्था को अब केंद्र सरकार के कदमों से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता है। 
 
अल्पावधि के आर्थिक प्रदर्शन के हमारी राजनीति से अलग होने का यह अर्थ नहीं है कि सरकार लंबी अवधि के विकास के कार्यों की दृष्टि से भी मायने नहीं रखती है। 
 
कृषि से लेकर बुनियादी ढांचे तक कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां निजी क्षेत्र को प्रभावी परिचालन की इजाजत नहीं है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी खंड-खंड बाजार उपयुक्त नहीं साबित होगा। यहां असली समस्या यह है कि कमजोर और मजबूत दोनों सरकारों से चूक हुई हैं।
 
कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचा आदि क्षेत्रों में नीतियों और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन नौकरशाही और सरकारी संस्थानों को करना होता है। इसलिए राज्य स्तर पर स्थिर सरकार की आवश्यकता है। 
 
गहन विकेंद्रीकरण और वित्तीय अंतरण लंबी अवधि के विकास के लिए जरूरी है। देश के कई राज्य खासे बड़े हैं और राज्यों और नगर निकायों तथा पंचायती राज संस्थानों में उनके और अधिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता हो सकती है। 
 
केंद्र सरकार को राजकोषीय संसाधनों को सहयोगित करना बंद करना चाहिए। केंद्र सरकार भी अगर सूक्ष्म विकास प्रबंधन से मुक्त हो तो वह अपना ध्यान रक्षा, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, वृहद आर्थिक नीति, विदेश व्यापार एवं निवेश, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संवद्र्घन, अंतरराज्यीय व्यापार और बुनियादी ढांचा आदि क्षेत्रों पर केंद्रित कर सकती है, जो वास्तव में उसका ही कार्य क्षेत्र है। यही हमारे संविधान की मूल भावना है।
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