बिजनेस स्टैंडर्ड - बदलते हुए दौर में कारगर नहीं होगा मध्यवर्गीय पर्यावरणवाद
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बदलते हुए दौर में कारगर नहीं होगा मध्यवर्गीय पर्यावरणवाद

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  February 25, 2019

मैंने कुछ हफ्ते पहले यह सवाल पूछा था कि भारत जैसा देश क्या आर्थिक वृद्धि एवं स्थायित्व के पुराने रास्ते पर चलने का खतरा उठा सकता है या उसे नई राह अपनानी होगी? मैंने यह भी कहा था कि अलग तरीके से वृद्धि करने की चाह कम है लेकिन ऐसा होना चाहिए। हमारे सिर तक पहुंच चुके कृषि संकट पर गौर कीजिए। आज किसान का चेहरा खबरों में है। यह साफ है कि अतीत एवं वर्तमान की सरकारों ने इस दिशा में जो भी कदम उठाए हैं, वे कारगर नहीं हो रहे हैं। भारतीय किसान दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ खाद्य उत्पादों की उपज में आने वाली लागत बढ़ रही है क्योंकि उत्पादन में लगने वाली वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई हैं। मौसम के बदलते एवं तीखे होते मिजाज ने भी किसानों की उपज पर असर डाला है। दूसरी तरफ सरकारें महंगाई स्तर को काबू में रखने के लिए खाद्य उत्पादों की कीमतें कम चाहती हैं। सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत बड़े पैमाने पर अनाज की खरीद भी करनी होती है, लिहाजा वह उनकी कीमतें नियंत्रण में चाहती हैं। कृषि उत्पादकों के लाभ देने या मार्केटिंग सहयोग देने वाले ढांचागत क्षेत्र में भी बहुत कम निवेश हुआ है। जलवायु परिवर्तन और लगातार बदलते मौसम के चलते खेती के काम में जोखिम बढ़ गया है।

 
सुस्थापित आर्थिक शब्दकोशों का यह दृढ़ विश्वास है कि खेती अब या तो अनुत्पादक हो गई है या कम-उत्पादक रह गई है और इसे तगड़ा धक्का लगाने की जरूरत है। कहा जाता है कि इस अनुत्पादक कारोबार से इतनी बड़ी संख्या में भारतीय लोग जुड़े हुए हैं कि यह कारगर हो ही नहीं सकती है।  लेकिन यह दलील कोई जवाब नहीं है। अगर खाद्यान्न उपजाने वाला कारोबार यानी खेती से लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा तो फिर कौन रोजगार देगा? हम जितनी शिद्दत से औपचारिक अर्थव्यवस्था को अपनाना चाहते हैं, वह रोजगार को छोड़कर बाकी सभी नजरिये से  अच्छी है। हमें इसका अहसास है। 
 
हमें इस कृषि संकट के शहरी परिदृश्य को भी पहचानना होगा। आज अगर जमीन, पानी या जंगल का आजीविका के लिहाज से कोई भविष्य नहीं है तो लोगों के पास शहरी इलाकों में प्रवास के सिवाय कोई चारा नहीं है। शहरी इलाकों में कामगारों की संख्या बढऩे से सेवा एवं प्रदूषण की समस्या भी बढ़ेगी। सच तो यह है कि मौजूदा शहरी वृद्धि कानूनी दायरे में संचालित होने वाले आवासीय एवं वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के 'वैध' क्षेत्रों में नहीं हैं। शहर अवैध क्षेत्रों में विस्तारित हो रहे हैं जहां पर तमाम आवासीय एवं वाणिज्यिक गतिविधियां सरकारी अनुमति के बगैर ही चल रही हैं। विडंबना ही है कि अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के लिए सरकार जितनी मेहनत कर रही है, हालात लोगों को उतनी ही तेजी से गैरकानूनी एवं अनौपचारिक कारोबार की ओर धकेल रहे हैं।
 
पर्यावरण संरक्षण के मामले में भी यही बात लागू होती है। भारत के संदर्भ में, हम किसी अन्य देश पर अपनी पर्यावरणीय लागत नहीं डाल सकते हैं। लेकिन हम इसे औपचारिक कारोबार और संगठित औद्योगिक क्षेत्र में सक्रिय इकाइयों से अनधिकृत एवं रिहायशी इलाकों से बाहर ले जाने की कोशिश करते हैं। अब कारोबार भी प्रदूषण फैलाता है लेकिन वह नियामकों के दायरे से बाहर है। नियमन की लागत के चलते शासन महंगा हो जाता है और भारत जैसा देश इसका बोझ नहीं उठा सकता है। इसके चलते प्रदूषण बढ़ता जाता है और उसी के साथ खराब सेहत का दायरा भी बढ़ता है।
 
लेकिन यह भी साफ है कि भारत जैसे देश में गरीब का पिछवाड़ा अमीर के अगवाड़े से जुदा नहीं है। कारोबार के गैरकानूनी होने पर उसके उत्सर्जन का नियमन करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी वजह से हवा प्रदूषित हो रही है। इसकी चपेट में गरीब और अमीर दोनों आते हैं। सीवेज एवं औद्योगिक नालों के मामले में भी यही स्थिति है। गरीबों का गैरकानूनी निपटान अमीरों के शोधित कचरों से मिलकर नदियों को खत्म कर रहा है। हमारे जल स्रोतों का प्रदूषण इस संपर्क-विकार की चुनौती और स्वास्थ्य बोझ को बढ़ा देता है। कचरे के मामले में भी यही हालात हैं। अवैध बस्तियों में कचरा निपटान का कोई इंतजाम नहीं होने से वे कचरे को जला देते हैं जिससे आसपास की हवा जहरीली हो जाती है।
 
यही वजह है कि भूमडंलीकरण का मॉडल हमारे लिए कारगर नहीं होगा। इस मॉडल ने उत्सर्जन का स्वरूप बदल दिया लेकिन उपभोग में कोई गिरावट नहीं आई। हम अपने घर के पीछे की तरफ रहने वाले गरीबों की ओर प्रदूषण को खिसका सकते हैं, हम पर्यावरण एवं श्रम की लागत भी कम कर सकते हैं लेकिन हमें इसका झटका सहना होगा। यह काम कोई और नहीं करेगा। इस तथ्य से भागा नहीं जा सकता है। आज चीन जिस तरह से पश्चिमी दुनिया के प्लास्टिक एवं अन्य अवशिष्टों के लिए अपने दरवाजे बंद कर रहा है, उससे यही लगता है कि उसे इन अवशिष्टों के निपटान से जुड़े दर्द का अहसास हो रहा है। अमेरिका के अपेक्षाकृत विपन्न इलाकों में कचरा निपटान केंद्र लगाए जाने का अब लगातार विरोध हो रहा है। लोग अपने पिछवाड़े में उत्सर्जन होने के पक्ष में नहीं हैं। ऐसा कौन करेगा? यह अपने आप में एक चुनौती है। 
 
इसी वजह से मैं यह कहती रही हूं कि मध्यवर्गीय पर्यावरणवाद भारत में काम नहीं करेगा। हमारे लिए संवहनीयता का अर्थ समावेशी एवं वहन की जा सकने वाली वृद्धि से है। लेकिन संभवत: तकनीकी समाधान की वकालत करने वाले और समस्या को दूसरे क्षेत्रों की तरफ धकेलने में यकीन रखने वाले सिद्धांत 'मध्यवर्गीय पर्यावरणवाद' का युग अब खत्म हो जाएगा। हम अपने अवशिष्टों को किसी अन्य ग्रह पर तो ले नहीं जा सकते हैं। हमें यह समझने का वक्त आ चुका है। 
Keyword: environment, world, india, farmer,,
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