बिजनेस स्टैंडर्ड - मजबूत जनसंख्या नीति से होगा गरीबी उन्मूलन
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मजबूत जनसंख्या नीति से होगा गरीबी उन्मूलन

पार्थसारथि शोम /  February 25, 2019

भारत, जनसंख्या वृद्धि की समस्या से गंभीरतापूर्वक निपटने में नाकाम रहा है और इसकी वजह से हम गरीबी उन्मूलन के वैश्विक औसत तक पहुंचने में नाकाम रहे हैं। जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
गत माह मैंने अपने आलेख में चीन के जनसंख्या नियंत्रण का जिक्र करते हुए कहा था कि वह अपनी जनसंख्या नियंत्रण नीति की बदौलत सन 1960 के दशक के अंत से ही प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि के मामले में निरंतर भारत से आगे बना रहा। दोनों देशों के बीच जीडीपी वृद्घि दर का वह अंतर आज भी कायम है और चीन को निरंतर नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है। बीच के दशकों में चीन एक-एक करके सभी आर्थिक और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर भारत से काफी ऊपर निकल गया। हां, जैसा कि मैं पहले भी जिक्र कर चुका हूं, केवल मानवाधिकार के मामले में चीन भारत से आगे नहीं निकल सका।
 
अगर हम विभिन्न देशों की आबादी में होने वाली वृद्धि के बरअक्स उन देशों की जीडीपी वृद्धि दर और प्रति व्यक्ति जीडीपी को रखकर देखें तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। एक तरह से देखा जाए तो जनसंख्या नियंत्रण की स्थिति में जीडीपी वृद्धि में स्पष्ट सुधार देखने को मिलता है जबकि अगर नियंत्रण न हो तो जीडीपी में गिरावट साफ नजर आती है। इस प्रभाव को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। सन 1969 से 2017 के बीच भारत का प्रदर्शन जहां कुछ हद तक ही बेहतर हो सका, वहीं सन 2010 तक चीन के प्रदर्शन में  बेमिसाल ढंग से सुधार आया। सन 2010 के बाद चीन के प्रदर्शन में कुछ गिरावट आई है। इसके लिए हाल के कुछ वर्षों में चीन द्वारा जनसंख्या नीति में बरती गई नरमी को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। साफ जाहिर है कि एक लक्षित और सार्थक जनसंख्या नीति की मदद से भारत अपने प्रति व्यक्ति जीडीपी और उसमें होने वाली वृद्धि, दोनों में अच्छा खासा सुधार कर सकता है।
 
इतना ही नहीं जनसंख्या से प्रभावित होने वाला एक अन्य प्रमुख संकेतक है एक्सट्रीम पॉवर्टी हेडकाउंट रेश्यो (ईपीएचआर)। इसका आकलन इस आधार पर किया गया है कि आखिर किसी देश की कितनी आबादी प्रति दिन 1.90 डॉलर से कम आय पर गुजारा कर रही है। यह आकलन सन 1980 से 2015 तक की अवधि के लिए किया गया है। सन 1981 में चीन की 89 फीसदी आबादी इस मानक के नीचे जीवन बिता रही थी जबकि उस वक्त तक भारत की केवल 57 फीसदी आबादी ऐसी थी जो 1.90 डॉलर रोजाना से कम आय पर जी रही थी। उस समय ऐसे लोगों का वैश्विक औसत महज 42 फीसदी था। ब्राजील 21 फीसदी के आंकड़े के साथ इस स्तर से बहुत बेहतर स्थिति में था। परंतु चीन ने अपनी स्थिति में जबरदस्त सुधार करते हुए 2000 के दशक तक भारत को पीछे छोड़ दिया। सन 2015 तक ईपीएचआर संकेतक के मामले में भारत की आबादी का 13.4 फीसदी, ब्राजील की आबादी का 3.4 फीसदी और चीन की आबादी का 0.7 फीसदी इस दायरे में था। 
 
इस समय वैश्विक औसत 10 फीसदी था। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत वैश्विक औसत से खराब हालत में था जबकि चीन इस संकेतक से कमोबेश गायब ही था। चीन की हालत में यह सुधार उसके आर्थिक प्रदर्शन में आए सुधार की बदौलत था। यह सुधार उसने आबादी को नियंत्रित कर हासिल किया। एक आकलन सन 1981 से 2015 के बीच ईपीएचआर के दायरे में आने वाले लोगों का भी है। वैश्विक स्तर पर सन 1981 में करीब 1.9 अरब लोग अत्यधिक गरीब की श्रेणी में आने वाले थे। परंतु, सन 2015 में यह आंकड़ा सुधरकर 73.6 करोड़ रह गया। यानी 35 वर्ष में इसमें कुल मिलाकर 61 फीसदी की कमी आई। चीन में इस अवधि में आंकड़ा 87.8 करोड़ से घटकर एक करोड़ पर आ गया यानी उसने 99 फीसदी की कमी की। भारत 40.9 करोड़ से घटकर 17.5 करोड़ पर आया यानी 57 फीसदी की कमी। लेकिन भारत के मामले में यह कमी औसत से कम थी। समान अवधि में ब्राजील में यह आंकड़ा 3.6 करोड़ से घटकर 70 लाख पर आ गया। यह कमी 74 फीसदी थी जिसे  वैश्विक औसत की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन करार दिया जा सकता है। इन तीन देशों में केवल भारत का प्रदर्शन ही वैश्विक औसत से नीचे रहा। कहा जा सकता है कि आबादी पर नियंत्रण न रख पाना भारत के कमजोर प्रदर्शन की एक वजह रहा। व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक स्थिति में सुधार से जहां जन्म दर कम करने में मदद मिलती है, वहीं इसके ठीक उलट कम जन्म दर के कारण आर्थिक समृद्घि आती है और गरीबी में कमी आती है। विभिन्न देशों में हुए शोध इस दो दिशाओं वाले रिश्ते को स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया जिसमें थाईलैंड, इंडोनेशिया और हिंद-चीन क्षेत्र के देशों में पिछले 25 वर्ष के दौरान जन्म दर में काफी गिरावट आई है। जनसंख्या मामलों के विशेषज्ञ माने जाने वाले स्टीवन सिंडलिंग इस बात की पुष्टि करते हैं कि इन देशों में गरीबी में कमी और जीवन स्तर में सुधार के लिए काफी हद तक उनकी सफल जनसंख्या नियंत्रण नीति को श्रेय दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कई अन्य समाज विज्ञानी अफ्रीका से भी ऐसे प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं। फिलहाल एक बात साफतौर पर कही जा सकती है कि दुनिया के कई देशों को इन नीतियों को अपनाने की आवश्यकता है।
 
भारत गरीबी के भंवर से तभी बाहर निकल सकता है जबकि देश में जनसंख्या को नियंत्रित किया जा सके और आर्थिक नीतियां सब्सिडी को नहीं बल्कि वृद्घि को बढ़ावा देने वाली हों। एक सुझाव तो यह भी है कि वित्त आयोग को भी जनसंख्या वृद्घि दर को केंद्र राज्य की राजस्व साझेदारी में नकारात्मक मानक के रूप में दर्ज करना चाहिए।  अगले कुछ महीनों में देश में आम चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों को अपनी-अपनी पार्टी के घोषणापत्रों में जनसंख्या नियंत्रण नीति को स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहिए। जनसंख्या नियंत्रण के लिए जरूरत के मुताबिक प्रोत्साहित करने और हतोत्साहित करने वाले उपायों का भी प्रयोग करना चाहिए। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो देश की आबादी बढ़ती रहेगी और आने वाले बच्चे गरीबी का जीवन जीने को अभिशप्त होंगे। 
Keyword: india, Population, china,,
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