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एफडीआई की समस्या

संपादकीय /  February 25, 2019

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक नहीं रह गई है। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवद्र्घन विभाग (डीपीआईटीटी) की ओर से हाल ही में जारी आंकड़ों से यही संकेत निकलता है। आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से दिसंबर 2018 के बीच देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई ) घटकर 33.5 अरब डॉलर रह गया जबकि वर्ष 2017 की समान तिमाही में यह 36 अरब डॉलर था। इन आंकड़ों को जारी करने में काफी लंबी और रहस्यमय देरी हुई है। जबकि तथ्य यही है कि भारतीय रिजर्व बैंक नियमित रूप से डीपीआईटीटी से जुड़े आंकड़े दे रहा था। यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि आंकड़ों को इतने लंबे समय तक एकत्रित क्यों किया गया।

 
इन आंकड़ों में सरकार के लिए ऐसा परीक्षण छिपा हुआ है जिसकी वह अनदेखी नहीं कर सकती। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के शुरुआती वर्ष एफडीआई के लिए अच्छे थे। पिछली सरकार नीतिगत पंगुता की शिकार थी और नई सरकार के आगमन के बाद आर्थिक संभावना को लेकर उत्सुकता का माहौल था। सरकार ने उस गतिशीलता का पूरा श्रेय लिया। अगर वह रुख अब बदल गया है तो उसकी जिम्मेदारी भी सरकार को ही लेनी चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017-18 में आंतरिक एफडीआई केवल 3 फीसदी बढ़ा जबकि 2014-15 में यह 25 फीसदी बढ़ा था। अन्य अनाधिकारिक संकेतक भी अर्थव्यवस्था में भरोसा कम होने की बात का समर्थन करते हैं। भारत 2018 के ताजातरीन एटी कियर्नी एफडीआई कॉन्फिडेंस इंडेक्स में तीन स्थान नीचे फिसल कर वर्ष 2015 के बाद पहली बार 10 देशों की सूची से बाहर हो गया है। 
 
इस मंदी को किस प्रकार समझा जा सकता है? यह बात सही है कि वर्ष 2018 में वैश्विक एफडीआई में 19 फीसदी की गिरावट आई। यह आंकड़ा संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) की ओर से जारी किया गया। इसके लिए कुछ हद तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा धनराशि स्वदेश भेजा जाना भी जिम्मेदार है। परंतु हमारे समकक्ष देशों का प्रदर्शन इतना बुरा नहीं रहा। उदाहरण के लिए दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में एफडीआई की आवक 11 फीसदी बढ़कर 145 अरब डॉलर तक पहुंच गई। यह समूचे दक्षिण एशिया के कुल अर्जित एफडीआई के लगभग तीन गुना के बराबर है। ऐसे में भारत के संदर्भ में यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर एफडीआई में गिरावट क्यों आई। सरकार को इस बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करनी होगी। अगर सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आता है तो अधिकांश पर्यवेक्षक यही मानकर चलेंगे कि देश को लेकर सॉवरिन जोखिम से जुड़े जोखिम खत्म नहीं हुए हैं। 
 
ई-कॉमर्स नीति को लेकर पहले मसौदे में कहा गया है कि ई-कॉमर्स क्षेत्र के उन कारोबारियों को अधिक सख्त नियमन का सामना करना पड़ेगा जिनमें विदेशी निवेश होगा। इसका असर निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ेगा। यह इस बात को दर्शाता है कि देश में नीति संचालित सॉवरिन जोखिम किस तरह के हैं और एफडीआई को किस तरह हतोत्साहित किया जा रहा है। कई बड़े निवेशक देश में ई-कॉमर्स में आ चुके हैं और इस बीच सरकार ने नियम बदल दिए हैं। दूसरा मसौदा जो शनिवार को जारी किया गया वह भी इस पहलू पर कुछ खास नहीं करता। विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत की स्थिति चाहे जितनी बेहतर हो रही हो लेकिन निवेशकों की अनुकूलता की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। अब यह अगली सरकार पर निर्भर करता है कि निवेशक समुदाय हमसे दूर न हो और एफडीआई की आवक ऊंची और स्थायित्व भरी हो।
Keyword: india, economy, DPITT, FDI,,
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