बिजनेस स्टैंडर्ड - पीएम किसान से जीत आसान!
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पीएम किसान से जीत आसान!

साई मनीष /  02 24, 2019

योजना से भाजपा की तरफ झुकाव संभव

बिजनेस स्टैंडर्ड पीएम किसान से जीत आसान!राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की किसानों के लिए 75,000 करोड़ रुपये की आय समर्थन योजना पीएम-किसान से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को आम चुनावों में काफी फायदा हो सकता है। देश के किसानों को जिस राशि का वादा किया गया है, वह उनकी आय, खपत, बचत और अधिशेष का एक अहम घटक है। पंजाब, केरल और हरियाणा जैसे कम आबादी वाले और समृद्ध राज्यों की तुलना में ज्यादा आबादी और चुनावी रूप से अहम खासकर हिंदी भाषी राज्यों में इसकी अधिक अहमियत है। 

नरेंद्र मोदी सरकार के इस कार्यकाल के अंतिम बजट में इस महत्त्वाकांक्षी योजना की घोषणा की गई है। इसके तहत दो हेक्टेयर से कम जोत वाले किसानों को तीन किस्तों में सालाना कुल 6,000 रुपये दिए जाएंगे और इससे करीब 12.5 करोड़ किसानों को फायदा होने की उम्मीद की जा रही है। सरकार ने हर चार महीने में पात्र किसानों को 2,000 रुपये की नकद मदद देने की घोषणा की है। यह योजना रविवार को शुरू हो गई और अगले कुछ हफ्तों में किसानों को इसकी पहली किस्त का भुगतान कर दिया जाएगा। 

अप्रैल में आम चुनावों से महज एक महीने पहले मोदी सरकार किसानों को इसकी दूसरी किस्त जारी कर सकती है। इस तरह चुनावों तक किसानों के खाते में 4,000 रुपये आ जाएंगे। इस पर चुनाव आयोग की तिरछी नजर भी नहीं होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि आयोग ने दिसंबर 2018 में तेलंगाना में विधानसभा चुनावों के लिए आदर्श आचाार संहिता लागू होने के बावजूद के चंद्रशेखर राव सरकार को किसानों को 4,000 रुपये हस्तांतरित करने की अनुमति दे दी थी।

चूंकि इस योजना को 1 दिसंबर, 2018 से लागू किया जा रहा है, इसलिए सभी लाभार्थियों को वित्त वर्ष 2018-19 के लिए 2,000 रुपये मिलेंगे। अगर मोदी सरकार अपने कार्यकाल के बाकी महीनों में एक और किस्त जारी करती है तो चुनावों से पहले किसानों के खाते में 4,000 रुपये आ जाएंगे। चुनावों के बाद भी उन्हें वित्त वर्ष 2019-20 में 4,000 रुपये मिलेंगे।  यह पैसा केवल उन्हीं परिवारों को मिलेगा जिनके पास जमीन है। मोदी सरकार ने इस योजना में भूमिहीन किसानों के लिए कोई प्रावधान नहीं किया है। ये वे लोग हैं जो जोखिम लेते हैं और वास्तव में खेती करते हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के अनुमान के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में करीब 1.2 करोड़ भूमिहीन किसान परिवार हैं जो देश की कुल ग्रामीण आबादी का सात फीसदी है। योजना में लाभार्थियों की पहचान की जिम्मेदारी राज्यों पर डाली गई है और जमीन की जोत का निर्धारण करने के लिए 2015-16 की कृषि जनगणना का सहारा लिया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि जनगणना में कई खामियां हो सकती है क्योंकि रिपोर्ट गांवों में जमीन के क्रमरहित नमूनों के आधार पर तैयार की गई है। यह जनगणना कोई निर्धारित दस्तावेज नहीं है जिससे ग्रामीण भारत में जमीन के वास्तविक और कानूनी मालिक की पहचान की जा सके। 

तो फिर 12.5 करोड़ सीमांत और छोटी जोत वाले किसानों के लिए चुनाव से पहले 4,000 रुपये की नकद राशि के क्या मायने हैं? सीमांत कृषि परिवारों (जिनके पास एक हेक्टेयर तक जमीन है) के लिए यह राशि उनकी आधे महीने की कमाई के बराबर है। 2015-16 की कृषि जनगणना और नाबार्ड रिपोर्ट के अनुमानों के मुताबिक सीमांत किसान परिवारों की औसत मासिक आय करीब 7,650 रुपये है। 0.1 और 0.4 हेक्टेयर जोत वाले कृषि परिवारों की मासिक आय 6,650 रुपये से भी कम है। देश के अधिकांश किसानों के पास इतनी ही जमीन है। 

2015-16 की कृषि जनगणना के मुताबिक देश में करीब 70 फीसदी सीमांत किसानों की जोत दो हेक्टेयर तक या उससे कम है। ऐसे किसानों के लिए चुनावों से पहले 4,000 रुपये की एकमुश्त नकद राशि उनकी मासिक आय के दो-तिहाई के बराबर है। एक हेक्टेयर से दो हेक्टेयर तक जोत वाले छोटे किसान परिवारों की मासिक आय 10,000 रुपये है। पीएम-किसान योजना के तहत मिलने वाली राशि इन परिवारों की मासिक आय की करीब आधी है। अगर आप गरीब, बड़ी आबादी वाले और चुनावी रूप से अहम राज्यों के दृष्टिकोण से देखें तो आपको इस योजना के आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव साफ नजर आते हैं।

देश में सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से भी सबसे अहम है। यहां लोक सभा की 80 सीटें हैं। राज्य में औसत मासिक कृषि आय करीब 6,700 रुपये है। कृषि आय पर अनुमान लगाने वाले अध्ययनों के मुताबिक जोत और मासिक आय में परस्पर संबंध है। नाबार्ड के 2016-17 के अध्ययन में कहा गया है कि जिन कृषि परिवारों के पास दो हेक्टेयर से भी कम जोत है उनकी कमाई दो हेक्टेयर से अधिक जोत वाले किसानों से आधी से भी कम है। सभी ग्रामीण परिवारों में से 20 फीसदी की मासिक कमाई 2,500 रुपये से भी कम है जो जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

बिहार में लोक सभा की 40 सीटें हैं। राज्य में किसान परिवारों की मासिक आय 7,175 रुपये है। संसद के निचले सदन में 42 सदस्य भेजने वाले पश्चिम बंगाल में यह राशि 7,756 रुपये है। मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में लोक सभा की क्रमश: 29 और 25 सीटें हैं। इन दोनों राज्यों के किसान परिवारों की मासिक आय क्रमश: 7,900 रुपये और 6,900 रुपये है। इन सभी राज्यों में किसान परिवारों की औसत मासिक आय राष्ट्रीय औसत (8,900 रुपये) से कम है। बड़े राज्यों में केवल महाराष्ट्र के किसानों की आय ही राष्ट्रीय औसत से अधिक है। राज्य में लोक सभा की 48 सीटें हैं। जाहिर है कि इस योजना का सबसे अधिक फायदा सीमांत और छोटे किसान परिवारों को मिलेगा। इसलिए पीएम-किसान योजना के तहत 4,000 रुपये का नकद हस्तांतरण इन परिवारों की मासिक आय का अहम हिस्सा होगा।  

दिलचस्प है कि पीएम-किसान योजना के तहत चुनावों से पूर्व नकद भुगतान पाने वाले सभी लाभार्थियों में से करीब आधे किसान केवल सात राज्यों मे होंगे जहां लोक सभा की कुल 305 सीटें हैं। यह संख्या लोक सभा की कुल सीटों की आधी से अधिक है। योजना के एक चौथाई लाभार्थी उत्तर प्रदेश और बिहार के होंगे जहां लोक सभा की कुल 120 सीटें हैं। यह सदन की कुल सीटों का करीब 20 फीसदी है। इन अहम राज्यों में भूमिहीन परिवारों की संख्या बेहद मामूली है। एनएसएसओ के अनुमानों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार में क्रमश: तीन और पांच फीसदी भूमिहीन परिवार हैं। पश्चिम बंगाल में भी ऐसे परिवारों की संख्या केवल सात फीसदी है। 

मासिक आय के अलावा नकद हस्तांतरण से किसान परिवारों की आय अधिशेष में भी मदद मिलती है। नाबार्ड के आंकड़ों के मुताबिक सीमांत कृषि परिवारों का मासिक खपत खर्च करीब 6,500 रुपये है जिससे उसके पास हर महीने 1,175 रुपये का नकद अधिशेष बच जाता है। किसानों को मोदी की नकद मदद से इन परिवारों का अधिशेष करीब आधा बढ़ जाएगा। इस योजना के तहत हर परिवार को हर महीने 500 रुपये मिलेंगे। सीमांत परिवारों के बीच जिन किसानों की जोत 0.1 से 0.4 हेक्टेयर तक है, उनके पास भोजन और दूसरी जरूरी चीजों पर खर्च के बाद केवल 465 रुपये बचते हैं। 

पीएम-किसान योजना से इस श्रेणी के परिवारों का मासिक अधिशेष दोगुना हो जाएगा। दो हेक्टेयर तक जोत वाले छोटे किसान परिवारों का मासिक अधिशेष करीब 25 फीसदी बढ़ जाएगा। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अहम राज्यों में किसानों को नकदी हस्तांतरण के गहरे मायने हैं। इन राज्यों में किसान परिवारों के मासिक अधिशेष का औसत महज 300 रुपये है। इन राज्यों में पीएम-किसान योजना के 25 फीसदी से अधिक लाभार्थी रहते हैं और नकदी हस्तांतरण से उनका मासिक अधिशेष ढाई गुना बढ़ जाएगा। अगर इन किसान परिवारों के बचत के रुझानों को देखें तो इसमें भी पीएम-किसान का अहम योगदान हो सकता है। अधिकांश किसान परिवार फसलों के खराब होने, उत्पादकता घटने और उपज के बाजार मूल्य में कमी की स्थिति में महाजन से कर्ज मांगने से पहले अपनी बचत का इस्तेमाल करते हैं। 

नाबार्ड के मुताबिक सीमांत कृषि परिवारों की औसत मासिक बचत महज 650 रुपये है। जिन सीमांत किसानों की जोत 0.1 से 0.4 हेक्टेयर तक है, उनकी बचत सबसे कम होती है। दो हेक्टेयर तक जोत वाले छोटे किसानों की बचत इनसे करीब दोगुना होती है। लेकिन इन दोनों श्रेणियों के किसानों को 4,000 रुपये (या सालाना 500 रुपये) के नकदी हस्तांतरण से उनकी मासिक बचत में अहम बढ़ोतरी होगी। अगर यह मान लिया जाए कि सीमांत किसान इन पैसों का इस्तेमाल अपने खपत खर्च में नहीं करेंगे तो उनकी मासिक बचत करीब दोगुना हो सकती है।

अधिशेष की तरह बचत बढ़ाने में भी इस योजना का ज्यादा असर गरीब, ज्यादा आबादी वाले और चुनावी रूप से अहम राज्यों में देखने को मिलेगा। उत्तर प्रदेश में कृषि परिवारों की मासिक बचत करीब 1,000 रुपये है। बिहार और पश्चिम बंगाल में यह 555 रुपये और 435 रुपये है। जाहिर है कि शहरी परिवारों के मुकाबले इन परिवारों के लिए हर महीने 500 रुपये की बहुत अहमियत है। चुनाव पूर्व इस तरह के नकद हस्तांतरण से मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर हो सकता है और इससे आम चुनावों में भाजपा की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

इस तरह की नकद मदद का लोगों की धारणा पर असर फिनलैंड में देखा गया था जहां कुछ लोगों को बिना किसी काम के लिए हर महीने 560 यूरो की मूल आय दी गई। एक साल बाद उनकी मनोवैज्ञानिक पड़ताल की गई। इसमें दो सनसनीखेज बातें सामने आई हैं। पहला यह कि जिन लोगों को मूल आय का फायदा मिला था उनका जीवन स्तर और संतुष्टि का स्तर औरों के मुकाबले बेहतर था। दूसरा यह कि जिन लोगों को यह पैसा मिला वह राजनेताओं के कामकाज को लेकर दूसरों से ज्यादा संतुष्ट थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि संस्थाओं पर भरोसे के बारे में पहले आए शोध में लोगों का संस्थाओं पर भरोसे का स्तर हर मामले में अलग था। राजनीतिक संस्थान लोगों को  प्रभावित कर सकते हैं लेकिन इन पर लोगों को सबसे कम भरोसा था। इस अध्ययन में शामिल लोगों में कानूनी व्यवस्था और राजनेताओं के बारे में भरोसा बाकी लोगों की तुलना में बेहतर हुआ है। राजग सरकार भी बिना किसी काम के सीधे किसानों के खातों में पैसे डाल रही है। साथ ही उसने चुनावों के बाद और पैसे देने का वादा किया है। ऐसी स्थिति में 12.5 करोड़ किसान मतदाताओं और उनके परिवारों का झुकाव भाजपा की तरफ हो सकता है। 

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