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प्रतिशोध नहीं प्रतिकार से मिलेगा ठोस जवाब

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 24, 2019

उड़ी हमलों के बाद सर्जिकल स्ट्राइक पुलवामा का हमला नहीं रोक सकी। ऐसी घटनाओं का प्रतिशोध के बजाय प्रतिरोध का प्रयास किया जाए। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित किसी भी आतंकी हमले की स्थिति में सबसे पहले बदले की मांग उठती है। कुछ अरसे के लिए सार्वजनिक बहसों से समझदारी नदारद हो जाती है लेकिन जल्द ही उसकी वापसी होती है और एक पुरानी कहावत दोहराई जाने लगती है। कहावत का अर्थ कमोबेश यह है कि बदला लेने का आनंद तभी है जबकि तात्कालिक क्रोध समाप्त हो गया हो। इस कहावत को जन्म देने का श्रेय अफगानों को दिया जाता है। 

 
हकीकत में 18वीं सदी में इस कहावत का इस्तेमाल फ्रांसीसियों ने शुरू किया था लेकिन यह अफगानों पर अधिक सटीक बैठती क्योंकि पीढिय़ों तक खिंचने वाला प्रतिशोध उनकी जीवनशैली का हिस्सा है। रुडयार्ड किपलिंग द्वारा लिखित जनजातीय इतिहास को पढ़कर या सोवियत, अमेरिकी और पाकिस्तान के अनुभवों से जाना जा सकता है कि अफगानों के लिए इसका क्या अर्थ है। इसके बावजूद अफगानिस्तान पर नजर डालिए। तमाम पुरानी जीतों, भारत के अमीरों को लूटने और दो महाशक्तियों को परास्त करने के बावजूद अफगानिस्तान एक टूटा हुआ, गरीब, मध्ययुगीन सा मुल्क है जिसे संभालना आसान नहीं। एक ऐसा मुल्क जो लगातार शिकस्त खाता रहा है। लब्बोलुआब यह कि बदला चाहे जल्दी लिया जाए या देर से और वह चाहे जितना आकर्षक प्रतीत हो, वह अस्थायी संतुष्टि के अलावा कुछ नहीं देता। बदले की भावना से भरा हुआ मुल्क जीत के बजाय आत्मघात की ओर अधिक बढ़ता है। सद्दाम हुसैन के हाथों पिता के अपमान का बदला लेने के लिए जॉर्ज बुश जूनियर ने इराक पर हमला किया और पश्चिम एशिया को बरबाद कर दिया। ओबामा ने ओसामा बिन लादेन को मारा जरूर लेकिन बीमार और निर्वासन में जी रहे ओसामा को मारने से इस्लामिक आतकंवादी कतई हतोत्साहित न हुए। 
 
पाकिस्तान ने सन 1971 का बदला लेने के लिए तमाम तैयारियां कीं और अपनी अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति को बरबाद कर लिया। जीत उसकी होती है जो प्रतिशोध के बजाय प्रतिरोध को चुनता है। हमारी रणनीतिक सोच की हालिया दिक्कत यह है कि यह दिमाग से नहीं बल्कि अंहकार उत्पन्न करने वाले हार्मोन से संबंधित है। प्रतिशोध भावनात्मक आवेश मात्र है जो मूर्खों को शोभा देता है जबकि प्रतिरोध समझदार और परिपक्व दिमाग की उपज है। उड़ी में हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक को याद करें। उन्होंने हमारे 19 जवान मारे, हमने उनके ज्यादा मारे, खून का बदला खून से लिया गया। बेशक पुलवामा में वे एक बार फिर हमलावर हुए और एक बार फिर बदला-बदला की मांग गूंजी। टेलीविजन स्टूडियो युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गए हैं और लक्ष्यों और हथियार के बारे में बता रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आंसू की एक-एक बूंद हिसाब लेने की बात कह रहे हैं। टीकाकार भी मान रहे हैं कि कुछ न कुछ करने की आवश्यकता है। बदला सबको चाहिए, कुछ को अभी तो कुछ को ठहरकर। सवाल यह उठता है कि क्या बदले के बाद शांति और सुरक्षा की गारंटी है या केवल तात्कालिक सुर्खियां हासिल होंगी और बाद में इस विषय पर कोई फिल्म बना दी जाएगी? इससे आपको चुनावी जीत भी मिल सकती है लेकिन शत्रु इससे शायद ही भयभीत हो। इन दिनों चाणक्य की चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है तो बात को उनके सहारे आगे बढ़ाते हैं।
 
हमें उनकी पुस्तक अर्थशास्त्र पढऩे की आवश्यकता नहीं है। चाणक्य के बारे में सबसे चर्चित किस्से से ही काम चल जाएगा। जब उनकी धोती एक झाड़ी में फंस कर फट गई तो उन्होंने उसे काटने के लिए कुल्हाड़ी नहीं उठाई। वह कुछ समय बाद मीठा दूध उसकी जड़ों में डालने के लिए लाए। चंद्रगुप्त ने उनसे इस बारे में सवाल किया। जवाब में उन्होंने कहा कि काटने पर तो वह फिर उग आएगा लेकिन मीठा दूध लाखों चीटियों को आकर्षित करेगा और वे उसकी जड़ समाप्त कर देंगी। यह बहुत दिलचस्प नहीं है लेकिन यही वास्तविक प्रतिकार है, एकदम क्रूर।
 
हम अपने रणनीतिक इतिहास पर भी एक दृष्टि डाल सकते हैं। चीन ने सन 1962 जो आक्रमण किया वह भारत को दंडित करने, बदला लेने या जमीन हथियाने के लिए नहीं था। यह एक किस्म का प्रतिकार था जिसने भारत की अग्रगामी नीति को खत्म कर दिया, तिब्बत को लेकर हमें सीमित किया और देश के नीतिकारों की कई पीढिय़ों को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया। हम अपनी सीमाओं के बचाव के लिए दशकों से सन 1962 की वही जंग अपने दिमाग में लड़ रहे हैं। इसके बाद चीन पिछले पांच दशक से पाकिस्तान का इस्तेमाल हमारे साथ संतुलन कायम करने में कर रहा है। यह कम लागत में बेहतर प्रतिकार का उदाहरण है।
 
सन 1971 में इंदिरा गांधी ने अपनी तरह का अर्थशास्त्र लागू किया। उन्होंने मार्च में पश्चिमी पाकिस्तान में टूटन होने के बाद जन भावनाओं के खिलाफ जाते हुए पर्याप्त सैन्य और कूटनीतिक बढ़त बनाने के लिए नौ महीने प्रतीक्षा की। उन्होंने सैन्य शक्ति बढ़ाई, अमेरिका और चीन को संतुलित करने के लिए तत्कालीन सोवियत संघ से संधि की, दुनिया भर के दौरे कर पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाया और याह्या खां को दिसंबर में युद्ध छेडऩे पर मजबूर कर दिया। परंतु क्या पाकिस्तान इससे बाज आया? उस बात को 50 वर्ष होने वाले हैं और पाकिस्तान ने दोबारा कभी कश्मीर में सैन्य शक्ति का प्रयोग करने की नहीं सोची। सन 1980 के दशक से ही वह आतंकवाद और झड़प तथा छद्म युद्ध का सहारा ले रहा है। आप इनका बदला लेते रहिए, पाकिस्तान को फर्क नहीं पड़ता। अगर आप उनकी फौज पर हमला करेंगे तो वे जवाबी कार्रवाई की धमकी देंगे। इस प्रक्रिया में आप नाराज और हताश होंगे। पाकिस्तान यह सिलसिला जारी रखेगा क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार हैं और पारंपरिक शक्ति में भी वह बहुत पीछे नहीं है। हमें यह समझना होगा कि हम इस स्थिति में कैसे पहुंचे। मेरी समझ से इसकी तीन वजह हैं:
 
1. समझ यही बताती है कि हारने वाला, विजेता से कहीं अधिक सबक लेता है। भारतीय नेताओं ने सन 1971 की जंग को पाकिस्तानी चुनौती का अंत समझने की गलती की। वहीं जुल्फिकार अली भुट्टो ने यह स्वीकार किया कि पाकिस्तान को पारंपरिक सैन्य विकल्प त्यागना होगा। परंतु भारत को संदेश देने के लिए उन्होंने परमाणु होड़ शुरू की। सन 1980 के दशक में उनके उत्तराधिकारी को लगा कि वह इस परमाणु क्षमता की बदौलत दोबारा अपनी हरकतें शुरू कर सकता है। पहले पंजाब और फिर कश्मीर में ऐसा किया गया।
 
2. सन 1998 के परमाणु परीक्षण से संतुलन कायम हुआ लेकिन पाकिस्तान का दुस्साहस बढ़ा। भारत यह मान बैठा कि परमाणु परीक्षण के साथ पारंपरिक लड़ाई का विकल्प समाप्त हो गया है। कह सकते हैं कि भारत आश्वस्त हो गया। हम भूल गए कि व्यापक विनाश के हथियार पराजित होने वाले का अंतिम सहारा हैं। पाकिस्तान हमसे चतुर निकला।
 
3. भारत ने पारंपरिक शक्ति विकसित करने में रुचि गंवा दी हालांकि हमारी अर्थव्यवस्था फलती-फूलती रही। हम यह भूल गए कि हमारी पारंपरिक शक्ति संपन्नता पाकिस्तान को रोकने का काम करेगी। वह परमाणु आत्मघात के पहले सौ दफा सोचता। वह हमारी बसों में धमाके करने के पहले भी बार-बार सोचता।
 
परमाणु शक्ति के आलस में जीडीपी में हमारा रक्षा बजट कम होता गया। आखिरी बार इसमें सुधार तब हुआ था जब राजीव गांधी के कार्यकाल में रक्षा बजट जीडीपी के 4 फीसदी के ऊपर गया था। तब से यह लगातार कम हुआ है। ऐसे में अगर अब जंग छिड़ती है तो हमारे अधिकांश हथियार तीन दशक पुराने होंगे जिनका ऑर्डर राजीव गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री दिया था। राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाली मोदी सरकार भी उसी सोच पर चल रही है कि परमाणु हथियारों ने जंग की आशंका खत्म कर दी है तो पैसे क्यों खर्च करना। उसने एक रैंक, एक पेंशन लागू की, सातवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू की लेकिन रक्षा बजट में कटौती जारी रखी।
 
आज हम अपने बचाव में सक्षम हैं, यहां-वहां रणनीतिक बदला भी ले सकते हैं लेकिन हम पाकिस्तान को रोक नहीं पा रहे। आगे की राह क्या है? हमें यह सोचना बंद करना होगा कि पाकिस्तानी परमाणु हथियार हमारा प्रतिरोध हैं, हमें भारी भरकम सैन्य तैयारी के साथ चुनौती पेश करनी होगी।  पारंपरिक सैन्य शक्ति के रूप में एक नया प्रतिरोध तैयार करना होगा।  मेरी दृष्टि में चाणक्य के मीठे दूध के सिद्धांत का यही समानार्थी है। यह ऊबाऊ तरीका है, इसके लिए धैर्य और समय चाहिए लेकिन यह कारगर होगा। लेकिन चाणक्य के समक्ष चंद्रगुप्त को चुनाव जिताने की अनिवार्यता भी तो नहीं थी। 
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