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नई लोकसभा में कई पुराने सदस्य नहीं आएंगे नजर

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  February 22, 2019

लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने पर सदन के अध्यक्ष को धन्यवाद देने की परंपरा का निर्वाह करने के दौरान दिए जाने वाले सांसदों के भाषण हमेशा भावनाओं से भरपूर एवं धारदार होते हैं। मर्मस्पर्शी होने की वजह यह है कि तमाम सदस्य एक-दूसरे के साथ बिताए गए पलों को याद करते हुए साथ छूटने की वेदना जाहिर करते हैं। उनके भाषण धारदार होने की वजह यह है कि इस मौके पर नेता ऐसी बातें कह जाते हैं जो वे किसी अन्य मंच पर नहीं कह सकते हैं। इस बार दिए गए धन्यवाद भाषण भी कोई अलग नहीं थे। मौजूदा लोकसभा के अंतिम कार्य दिवस पर एच डी देवेगौड़ा ने सार्वजनिक तौर पर उन दिनों को याद किया जब वह विदेशी मूल की होने के कारण  सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते थे। उस समय सोनिया सदन में ही मौजूद थीं। हालांकि देवेगौड़ा ने यह माना कि उनके लिए अब यह कोई मसला नहीं रह गया है क्योंकि वह सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने की मांग का खुद ही समर्थन कर चुके हैं। (इस दौरान सोनिया ने अपनी आदत के उलट हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वह कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं।) 

 
देवेगौड़ा ने कहा कि वह सदन में 29 साल व्यतीत कर चुके हैं और लोकसभा में यह उनका अंतिम भाषण होगा। भले ही उनकी पार्टी कर्नाटक में भाजपा का मुखर विरोध कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते समय वह भावुक नजर आए। इसी तरह मुलायम सिंह यादव ने भी प्रधानमंत्री के चुनाव जीतने और दोबारा सरकार बनाने की उम्मीद जताने वाला भाषण दिया। (इस पर उनकी रिश्तेदार राबड़ी देवी ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कहा कि मुलायम अब बुजुर्ग हो चुके हैं और बोलने पर उनका काबू नहीं रह गया है)। 
 
मोदी ने अपने भाषण में मुलायम का खास जिक्र करते हुए उनके स्नेह के लिए आभार जताया। इस तरह नई लोकसभा को लेकर चर्चा तेज होने के बीच मौजूदा लोकसभा को अलविदा कहा गया। हालांकि मौजूदा लोकसभा के उन सदस्यों को निजी तौर पर विदाई नहीं दी जा सकी जो अगला लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का ऐलान पहले ही कर चुके हैं। सुषमा स्वराज अटल सरकार के समय संसदीय कार्य मंत्री रहने के दौरान विपक्षी दलों की चहेती नेता होती थीं। एक बार अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सुषमा की पुरजोर तारीफ करते हुए कहा था कि वह देश की सर्वश्रेष्ठ संसदीय कार्य मंत्री रही हैं। 
 
सोमनाथ के इस बयान से उनकी माक्र्सवादी पार्टी को काफी कोफ्त भी हुई थी। मोदी सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद जब सुषमा पर ललित मोदी के लिए लॉबिइंग करने के आरोप लगने लगे थे तो मुलायम ने उनका बचाव भी किया था। यह सच है कि इस सरकार में सुषमा को विदेश मंत्री बनाकर किनारे कर दिया गया है जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय कई मुद्दों पर विदेश सचिव के मार्फत लगातार खुद संपर्क में बना रहा। झांसी से सांसद उमा भारती ने राजनीति से संन्यास लेने से तो मना किया है लेकिन स्वास्थ्य कारणों से अगला चुनाव न लडऩे की बात कही है। उनके इस फैसले में प्रधानमंत्री मोदी के उस फैसले की बड़ी भूमिका हो सकती है जिसके तहत उनसे गंगा पुनरुद्धार का दायित्व वापस ले लिया गया था। उन्होंने मोदी मंत्रिमंडल के अंतिम पुनर्गठन में हुए शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत नहीं की थी। बेलाग अंदाज में अपनी बात रखने के लिए मशहूर उमा ने वर्ष 2006 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान अपने एक पार्टी सहयोगी के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी की थी, जिससे पार्टी के भीतर बहुत लोग नाखुश हो गए थे। उनमें से कुछ लोगों ने उमा को अब तक उस दिन के बयान के लिए माफ नहीं किया है।
 
गढ़वाल से सांसद मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी भी अगली लोकसभा में नहीं नजर आएंगे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में राजमार्गों के विस्तार का जिम्मा संभाल चुके खंडूड़ी को रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष पद से कार्यकाल पूरा होने के तीन महीने पहले ही हटा दिया गया। शायद इस अपमान के अहसास या फिर 'बस, बहुत हो गया' के भाव ने ही उन्हें चुनाव से दूर रहने को कहा है।  उत्तराखंड से ही एक और सांसद भगत सिंह कोश्यारी भी अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसी तरह बिहार के मधुबनी से सांसद हुकुमदेव नारायण यादव ने भी चुनाव लडऩे के बजाय पार्टी के लिए काम करने की इच्छा जताई है। 
 
कुछ ऐसे नेता भी हैं जो भले ही इस लोकसभा के सदस्य न रहे हों लेकिन पार्टी का दबाव पडऩे पर दोबारा चुनाव लडऩे को तैयार हैं। शरद पवार को लेकर स्थिति उलझी हुई है। वह फिलहाल राज्यसभा के सदस्य हैं और पिछली लोकसभा में महाराष्ट्र के माढा से निर्वाचित हुए थे। उनके भतीजे एवं विधायक अजित पवार ने शरद पवार से लोकसभा चुनाव लडऩे की मांग रखने के लिए हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं की खिंचाई की थी। उन्होंने कहा था, 'वह खुद कह चुके हैं कि वह चुनाव नहीं लडऩा चाहते हैं। ऐसे में चुनाव लडऩे की मांग करने वाले नारे न लगाएं।' लेकिन शरद पवार का ताजा रुख यही है कि अगर उनकी पार्टी चाहती है तो वह माढा सीट से चुनाव लडऩे को तैयार हैं। ऐसी खबरें हैं कि उन्होंने अपने भतीजे के लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे की बात भी कही है। जो भी हो, मई में नई लोकसभा का गठन हो जाएगा। तब तक के लिए पुराने सदस्यों को विदाई और नए सदस्यों के स्वागत को तैयार रहें।
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