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बैंक ऋण की मानक दर अब तक कपोल कल्पना

तमाल बंद्योपाध्याय /  February 22, 2019

बैंक आरबीआई के सूक्ष्म प्रबंधन से प्रसन्न नहीं हैं लेकिन जब मुक्त बाजार प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा हो तो ऐसा करना अनिवार्य हो जाता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय 

 
आगामी अप्रैल तक देश के बैंकों को अपने फ्लोटिंग रेट वाले ऋण और सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को दिए गए ऋण को कम से कम चार मानकों में से किसी एक से जोडऩा होगा। ये मानक हैं, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रीपो दर, 91 दिन और 182 दिन के ट्रेजरी बिल, ओवरनाइट मुंबई इंटरबैंक आउटराइट रेट (माइबर) समेत कोई अन्य मानक बाजार ब्याज दर और यहां तक कि 14 दिन, एक महीने या तीन महीने की अवधि की माइबर। यह आंशिक तौर पर एमसीएलआर अर्थात फंड आधारित ऋण दर की सीमांत लागत के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा क्योंकि अन्य ऋण के लिए यह जारी रहेगी। एक बार नया मानक आने के बाद बैंकों को तब तक मानक दर को बदलने या पार करने की इजाजत नहीं होगी जब तक कि किसी ऋणकर्ता के जोखिम की अवधारणा में बदलाव नहीं आता। 
 
नियामक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नई व्यवस्था चाहता है लेकिन अधिकांश बैंक इससे नाखुश हैं। वास्तव में बैंकरों की राष्ट्रीय लॉबी इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने आरबीआई को लिखा है कि एमसीएलआर प्रणाली जारी रहने दी जाए क्योंकि उक्त बाहरी कारकों में से किसी का बैंक की फंडिंग की लागत से कोई लेनादेना नहीं है। केवल सिटी बैंक को यह बेहतर लगा है और उसने आवास ऋण ब्याज दर को मार्च 2018 में तीन महीने के टे्रजरी बिल से जोड़ दिया। ऐसा लगता है कि ऋण की अवधि तक ऋण दर में बदलाव न करने की बात ने बैंकों को अधिक प्रभावित किया है। ऐतिहासिक तौर पर अधिकांश बदलाव की व्यवस्था का फायदा उठाते रहे हैं। वे अपनी एमसीएलआर में कटौती कर देते हैं लेकिन मुनाफा बरकरार रखने के लिए ऋण दर बढ़ाए रखते हैं। 
 
एक आंतरिक अध्ययन, जिसके आधार पर आरबीआई नई व्यवस्था पेश कर रहा है, उसने वाणिज्यिक बैंकों को ऋण दर तय करने में अपारदर्शी तरीके अपनाने के लिए आड़े हाथों लिया। सन 1990 के दशक में देश के बैंकों ने अपनी प्राथमिक ऋण दर (पीएलआर) का खुलासा करना शुरू किया। यह वह ब्याज है जो सबसे उपयुक्त कर्जदारों से वसूली जाती है। सन 2003 में मानक पीएलआर पेश की गई। किसी बैंक को उससे कम दर पर ऋण देने की इजाजत नहीं थी। चूंकि कुछ ही दर इससे जुड़ी थीं इसलिए बैंक इस दर को कृत्रिम रूप से ऊंचे स्तर पर रखते और अपने अधिकांश कर्जदारों से उससे कम दर पर ऋण की वसूली करते। 
 
सन 2010 में इसकी जगह आधार दर ने ले ली जो अब किसी भी कर्ज के लिए न्यूनतम दर थी। बैंक अब कर्जदारों के जोखिम प्रोफाइल के आधार पर इसे तय करते। फंड की लागत, बकाया, कथित नकद आरक्षित अनुपात और फंसे कर्ज का स्तर पर विचार करके आधार दर तय की जाती। आधार दर और वास्तविक ऋण के बीच के दायरे पर कोई अंकुश नहीं था। एमसीएलआर व्यवस्था 2016 में लागू की गई और सीमांत लागत का आकलन किया जाने लगा। नए कर्ज पर ब्याज दर का पारेषण एमसीएलआर में बेहतर रहा लेकिन बकाया कर्ज के मामले में हालात जस के तस रहे। बैंक नए ग्राहकों को तो कम दर पर आकर्षित करते लेकिन पुराने ग्राहकों को लाभ नहीं दिया जाता। मौद्रिक नीति सख्ती के वक्त दरों में इजाफा करने में भी बैंक देर नहीं करते। 
 
आरबीआई ने अध्ययन में पाया कि बैंक आधार दर और एमसीएलआर के आकलन में छेड़छाड़ करके आधार दर को बढ़ाए रखते। इसके अलावा बैंकों द्वारा दरों के निर्धारण में भी अपेक्षित पारदर्शिता देखने को नहीं मिलती थी।  सवाल यह है कि नया मानक क्या होना चाहिए? साफ कहें तो आरबीआई द्वारा सुझाए गए चारों मानकों में से कोई उपयुक्त नहीं है क्योंकि देश के बैंक ऋण परिसंपत्तियां अपने जमा से तैयार करते हैं, वे नियामक अथवा बाजार के ऋण के माध्यम से ऐसा नहीं करते। निश्चित तौर पर वे आरबीआई की रीपो विंडो से उधार ले सकते हैं लेकिन इसकी राशि उनकी शुद्घ मांग के एक चौथाई प्रतिशत तक सीमित है।
 
उनकी फंड की लागत भी ट्रेजरी बिल प्रतिफल पर निर्भर नहीं है, जोकि व्यवस्था में मौजूद नकदी तथा अल्पावधि के मार्ग के जरिये ली जाने वाली सरकारी उधारी पर निर्भर करती है। इसमें तथाकथित नकदी प्रबंधन बिल भी शामिल हैं। इसके अलावा माइबर  की विश्वसनीयता भी लाइबर या लंदन इंटरबैंक की पेशकश वाली दर जैसी नहीं है। लाइबर बैंकों द्वारा असुरक्षित फंड को दी जाने वाली उधार पर निर्भर होता है। बैंक ये उधारी लंदन इंटरबैंक बाजार में एक दूसरे को देते हैं।  बैंक जिस दर पर आरबीआई से उधारी लेते हैं, वह भी बैंकों के लिए बेहतर उधारी मानक हो सकती है। इसके माध्यम से बैंक रीपो की तुलना में कहीं अधिक नकदी उधार ले सकते हैं। देश के बैंकों ने जहां फ्लोटिंग दर वाले ऋणों की राह चुन ली है लेकिन फ्लोटिंग रेट पर जमा को स्वीकार करने वाले लोग देश में अब भी काफी कम हैं। मुद्रास्फीति से संबद्घ बॉन्ड की बिक्री भी अच्छी तरह नहीं हो पा रही है। सरकार की उच्च दर और कर बचत वाली अल्प बचत योजनाएं तथा कर बचत वाले म्युचुअल फंड भी जमाकर्ताओं को फ्लोटिंग दर वाले जमा की ओर आकर्षित  नहीं कर पा रहे हैं। 
 
बैंक ऋण के लिए सही मानक तय करना अभी भी कल्पना का विषय ही है। परंतु बैंकों द्वारा किए जाने वाले दर के विस्तार पर गौर किया जा सकता है। इसके अलावा सभी प्रकार के ऋण को एक ही मानक से जोड़ दिया जाना चाहिए। विकसित बाजार आमतौर पर दो मानक दरें रखते हैं। इनमें से एक खुदरा ऋण के लिए होती है तो दूसरी कॉर्पोरेट ऋण के लिए। उदाहरण के लिए अमेरिका में प्राथमिक दर फेडरल रिजर्व की दर से ऊंची होती है और वही सभी उपभोक्ता और खुदरा ऋण के लिए मानक दर होती है। वहीं लाइबर को सभी कॉर्पोरेट ऋण के लिए संदर्भ बिंदु माना जाता है। 
 
बैंक आरबीआई द्वारा सूक्ष्म प्रबंधन किए जाने से प्रसन्न नहीं हैं लेकिन जब मुक्त बाजार भी प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है तो ऐसा करना आवश्यक है। उद्योग जगत को बैंक बचत दर के मुक्त होने के  बाद की स्वतंत्रता हासिल करने में काफी वक्त लगा। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना देश के बैंकों की रुचि का विषय कभी नहीं रहा। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड में सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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