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कारोबार में संकट

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 22, 2019

पहले बैंकों के लिए शीघ्र सुधारात्मक कार्रवाई की बात कही गई और अब कारोबारियों की बारी है। अनिल अंबानी का कारोबारी समूह संकट से घिरा हुआ है। नरेश गोयल के हाथों से जेट एयरवेज का नियंत्रण छिनने की नौबत आ चुकी है। सुभाष चंद्रा का ज़ी समूह संकट से उबरने की जद्दोजहद में है। रुइया को अपना एक प्रमुख उपक्रम गंवाना पड़ा है और दूसरा भी हाथ से जाता दिख रहा है। कोलकाता में बीएम खेतान समूह अपने चाय बागान बेच रहा है और उसने एक कंपनी को भी बेचने की घोषणा कर दी है। दिल्ली में सिंह बंधु रैनबैक्सी की अपनी विरासत को नष्ट करने के बाद एक दूसरे को नष्ट करने में लग गए हैं। लंदन में विजय माल्या किसी तरह यह प्रयास करने में लगे हुए हैं कि उन्हें आर्थर रोड की जेल में वक्त न बिताना पड़े।

 
भारी भरकम कर्ज वाली कंपनियों में बिकवाली का दौर जारी है। चाहे मामला हवाई अड्डे बनाने वाली दिग्गज कंपनियों जीएमआर और जीवीके का हो या वित्तीय क्षेत्र की आईएलऐंडएफएस और डीएचएफएल जैसी कंपनियों का या फिर अचल संपत्ति की डीएलएफ जैसी कंपनियों का, ये सारी कंपनियां समस्याओं से दो चार हैं। भूषण समूह की कंपनियां और लैंको आदि बहुत पहले परिदृश्य से नदारद हो चुकी हैं। अफवाह है कि वित्तीय क्षेत्र से अभी और गड़बडिय़ां सामने आ सकती हैं।
 
सामान्य समझ यह रही है कि सरकारी क्षेत्र बुरा है और निजी क्षेत्र अच्छा है। सरकारी क्षेत्र अभी भी बुरी स्थिति में है। एयर इंडिया पर गौर कीजिए, सरकारी बैंकों में 48,000 करोड़ रुपये की राशि डाली जानी है। बीते दो वर्ष में 1.57 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली जा चुकी है। सरकारी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए राहत पैकेज जल्दी आ सकता है। परंतु अब निजी क्षेत्र का झंडा कौन बुलंद करेगा क्योंकि बैंकों की बैलेंस शीट की दिक्कतों, ऋण की कमी और अर्थव्यवस्था में धीमेपन के लिए प्रमुख तौर पर वही जिम्मेदार हैं। 
 
संकट का शिकार होने वालों में से कई पहली पीढ़ी के कारोबारी हैं। रुइया सन 1990 के दशक में भी एक बार दिवालिया हो चुके हैं लेकिन शायद उन्होंने इससे कोई सबक नहीं सीखा। कई कंपनियां कर्ज में डूबी हैं या उन्होंने जिंस कीमतों में बदलाव और लंबी अवधि की परियोजनाओं का कमतर आकलन किया। कुछ किस्से वही पुराने हैं जहां कंपनियां डूबती रहीं और कारोबारी फलते-फूलते रहे। परंतु अब नए नियमों की बदौलत कंपनियों और उनके प्रवर्तकों की तकदीर एक दूसरे से कहीं अधिक गुंथी हुई हैं। जहां तक दूसरी या तीसरी पीढ़ी के कारोबारियों की बात है उनके कुप्रबंधन के कारण खस्ता हुई हालत का आनंद लेने वाले लोग भी मौजूद हैं। 
 
उनका स्थान कौन लेगा? क्या कारोबारियों की कोई नई पीढ़ी, बेहतर कारोबारी समझ या बेहतर तकदीर के साथ सामने आएगी? परंतु 100 करोड़ डॉलर की पूंजी वाली निजी कंपनियां ज्यादातर दूसरों की नकल करने वाले उद्यमी हैं जिनकेपास चीन समेत दुनिया भर से फंडिंग आ रही है। टेक सेवाओं की तेजी के दौर में जो अरबपति सामने आए, उनमें से कई परोपकार का रुख कर चुके हैं। डीमार्ट के राधाकृष्णन दमानी जैसे कुछ सितारे अब भी फल-फूल रहे हैं जबकि सन फार्मा के दिलीप सांघवी जैसे सितारे फार्मा क्षेत्र के साथ ही अस्त हो गए। सुनील मित्तल दूरसंचार क्षेत्र के टैरिफ के भंवर में उलझ कर रह गए। मौजूदा परिदृश्य की एक खास बात यह है कि दूरसंचार और विमानन जैसे तेज विकसित होते क्षेत्र अधिशेष तैयार नहीं करते। शेयर बाजार भी बीते पांच साल में शिथिल रहा है।
 
उपभोक्ता कारोबार अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे हैं जहां इमामी, मैरिको तथा अन्य कंपनियों ने शानदार प्रदर्शन किया है। बजाज, महिंद्रा, पीरामल, गोदरेज और रिलायंस जैसे कुछ प्रतिष्ठित समूहों का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। परंतु टाटा बमुश्किल डेढ़ कंपनियों का समूह नजर आ रहा है क्योंकि समूह की पुरानी दिग्गज कंपनियां केवल पूंजी खपाए जा रही हैं सुजूकी आधे कार बाजार पर काबिज है, मोबाइल फोन बाजार में चीन का दबदबा है और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तु बाजार में कोरियाई कंपनियां हावी हैं। ब्लैकस्टोन और केकेआर जैसे बड़े निवेशक अवसर देखकर बाजार में आए हैं। आईबीएम देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है, होंडा ने हीरो को पीछे छोड़ दिया है, डिएगो ने माल्या को खरीद लिया है और दो बड़े निजी बैंक विदेशी स्वामित्व वाले हैं और एतिहाद जेट को खरीद सकती है। विदेशी कारोबारियों के बिना हम कहां नजर आएंगे?
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