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भाजपा को भारी नुकसान से कमजोर सरकार की आशंका

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  February 20, 2019

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने दो सप्ताह पहले सार्वजनिक तौर पर कहा था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस साल होने वाले आम चुनावों में 135 सीटें गंवा सकती है। मुझे कांग्रेस नेता का सीटों के बारे में यह आकलन बेहद सटीक लगा जो संभवत: कांग्रेस के आंतरिक अनुमानों पर आधारित था। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया था कि कांग्रेस इस चुनाव में कितनी सीटें जीतने जा रही है? अगर कांग्रेस नेता का यह आकलन सही होता है तो भाजपा वर्ष 2014 में जीती गई 282 सीटों से घटकर इस बार 147 पर आ जाएगी। अगर भाजपा की मौजूदा सीट संख्या 268 से तुलना करें तो फिर वह 2019 में 133 पर ही रह सकती है। यह वर्ष 2004 में भाजपा को मिली 138 सीटों के काफी करीब होगा।

 
इस बीच कांग्रेस को खुद भी यह भरोसा नहीं है कि वह आगामी चुनावों में 125 से अधिक सीटें जीत पाएगी। हालांकि वह आंकड़ा भी वर्ष 2014 में उसे हासिल सीटों का तिगुना होगा। वैसे कांग्रेस के कुछ कम आशावान एवं अधिक वास्तविक अनुमान यही हैं कि वह 100 सीटों के करीब रहेगी। इतनी सीटें भी कांग्रेस को जीत का ऐलान करने और राहुल गांधी को चैंपियन बताने के लिए काफी होंगी। अगर हम कांग्रेस के सर्वाधिक आशावान अनुमान- भाजपा 133 और कांग्रेस 125, को भी लें तो अगली सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति का निमंत्रण किसे मिलेगा? इस सवाल का तो केवल एक ही जवाब है। 
 
वैसी स्थिति में जो भी प्रधानमंत्री बनेगा, हमें देखना होगा कि कहीं उसकी हालत 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह न हो जाए? वाजपेयी को केवल 13 दिन सत्ता में रहने के बाद ही हटना पड़ा था। अगर भाजपा इस बार 100 से अधिक सीटें गंवाती है तो 1996 का वाकया भी दोहराया जा सकता है। इस बात की संभावना अधिक लग रही है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की सम्मिलित सीटों की संख्या 280 ही रहती है तो बाकी दलों के पास 264 सीटें चली जाएंगी। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिलाकर 326 सीटें थीं और अन्य दलों के खाते में 218 सीटें ही गई थीं।
 
ऐसी स्थिति में अगली सरकार की अगुआई जो भी करे, पिछले पांच साल तक बेहद मजबूत सरकार रहने के बाद हमें एक अशक्त या बेहद कमजोर सरकार मिलने जा रही है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए जरूरी होगा कि केंद्र में सरकार बनाने वाली किसी भी पार्टी को कम-से-कम 210 सीटें मिलें। ऐसा होने पर ही नई सरकार की बुनियादी कमजोरी काफी हद तक दूर हो पाएगी। हम 1996, 1998, 1999 और 2004 के उदाहरण देख चुके हैं। इनमें से हरेक सरकार को क्षेत्रीय दलों का बंधक बनना पड़ा था। कांग्रेस ने 2009 के चुनाव में अपने दम पर 206 सीटें जीतकर क्षेत्रीय दलों के चंगुल से काफी हद तक निजात पा ली थी लेकिन उसने शासन के स्तर पर वह मौका गंवा दिया था।
 
सवाल है कि हम क्या चाहते हैं? भारत में राजनीति केवल दो बातों से ही संबंधित है: 90 फीसदी मसले सामाजिक नीतियों के बारे में होते हैं और केवल 10 फीसदी ही आर्थिक नीतियों से ताल्लुक रखते हैं। इस 90 फीसदी में से भी 90 फीसदी मुद्दे जाति एवं समुदाय से संबंधित होते हैं और बाकी 10 फीसदी मुद्दों में 90 फीसदी मसले मुद्रास्फीति से संबद्ध होते हैं।  यह भी सच है कि भाजपा एवं कांग्रेस दोनों ही अपनी अलग वजहों से जाति को अपना मुख्य वाहक बनाने से परहेज करते रहे हैं। भाजपा ने हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की है और कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। इन दोनों दलों के बीच की यह इकलौती साझा बात है। बुरी बातों के मामले में दोनों एक जैसे ही हैं। अगर कांग्रेस से उसके शीर्ष परिवार को अलग कर दें और भाजपा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को हटा दें तो दोनों साथ आ सकते हैं।
 
इस तरह कांग्रेस ने समुदायों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। वर्ष  2015 में आई एंटनी समिति की रिपोर्ट याद कीजिए जिसमें कांग्रेस के मुस्लिमों के पक्ष में अधिक झुक जाने को लेकर आगाह किया गया था। लेकिन कांग्रेस ने महंगाई और जाति के मसले को नजरअंदाज किया है। दूसरी तरफ, भाजपा ने हमेशा ही महंगाई और समुदाय को तवज्जो दी है और जाति को नजरअंदाज किया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि जाति-आधारित दलों के लिए खुला मैदान मिल गया है। अगली लोकसभा में इन दलों को करीब आधी सीटें मिल सकती हैं। ऐसा होना 2019 चुनावों के बारे में वाकई बहुत खराब खबर होगी।
 
वर्ष 1989 से अब तक का अनुभव यही रहा है कि जब भी केंद्र सरकार की जातिगत राजनीति करने वाले दलों पर अतिशय निर्भरता रही है तो देश में शासन डांवाडोल हो जाता है क्योंकि घरेलू एजेंडा बहुत संकीर्ण मुद्दों से तय होने लगता है। इस बार के चुनाव में अगर भाजपा की सीटों में 80-100 की भी गिरावट आती है तो मुझे डर है कि ऐसी ही हालत पैदा होने वाली है। लेकिन अगर आप भाजपा के पदाधिकारियों से बात करें तो वे इस नुकसान के 50 सीटें तक ही सीमित रहने की उम्मीद कर रहे हैं। इसके पीछे उनकी दलील है कि पहले अच्छा प्रदर्शन नहीं रहने वाले राज्यों में भाजपा प्रदर्शन सुधारकर नुकसान की भरपाई करने की रणनीति पर चल रही है। लेकिन वह महज एक उम्मीद ही बनकर रह सकती है। 
 
आखिर में, मोदी फैक्टर भले ही कम हुआ है लेकिन खत्म नहीं हुआ है। उस लिहाज से देखें तो 2019 का आम चुनाव मोदी के कामकाज पर एक जनमत संग्रह बन सकता है।  अगर ऐसा हो जाता है तो फिर भाजपा अपने सभी आलोचकों को गलत साबित कर सकती है। 
 
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