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युवा बेरोजगारी का दंश और जनांकिकी लाभांश

राधिका कपूर /  February 20, 2019

युवाओं के रोजगार को देखें तो हमें पता चलता है कि बहुत बड़ी संख्या में लोग स्वरोजगार को अपनाए हुए हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रही हैं राधिका कपूर

 
देश इस समय रोजगार के गंभीर संकट से दो चार है। इस समाचार पत्र द्वारा हाल ही में पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे यानी पीएलएफएस (2017-18) के हवाले से एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें बताया गया कि देश में रोजगार का संकट कितना विकराल हो चुका है। प्रच्छन्न बेरोजगारी हमारी अर्थव्यवस्था की विशेषता रही है। करीब 6 फीसदी की बेरोजगारी दर काफी कुछ कहती है। चेतावनी की बात यह है कि उच्च बेरोजगारी काफी हद तक युवाओं यानी 15 से 29 की उम्र के युवाओं की बेरोजगारी से जुड़ी हुई है। 
 
युवाओं में बेरोजगारी की दर ग्रामीण पुरुषों और महिलाओं में क्रमश: 17.4 फीसदी और 13.6 फीसदी रही। शहरी युवाओं में पुरुषों और महिलाओं के लिए यह क्रमश: 18.7 फीसदी और 27.2 फीसदी थी।  मोदी सरकार जब सत्ता में आई थी तो इसमें युवाओं को रोजगार देने के वादे और इस पर उन्हें मिले समर्थन की अहम भूमिका रही। ऐसे में सरकार के लिए हालिया आंकड़ों को स्वीकार करना असहज करने वाली बात है। परंतु यह केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं है। इसका संबंध देश के गंवाए जाते जनांकिकी लाभ से भी है जबकि ऐसा अवसर किसी देश के समक्ष यदाकदा ही आता है। 
 
किसी भी देश में जब कामगार आबादी की वृद्घि कुल आबादी से तेज होती है तो कहा जाता है कि उसके पास जनांकिकी लाभ का अवसर है। माना जाता है कि इससे आय बढ़ेगी, बचत बढ़ेगी, प्रति कामगार अधिक पूंजी आएगी और एक किस्म का जनांकिकी लाभ अर्जित होगा। फिलहाल भारत दुनिया में सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है। आबादी का 65 फीसदी से अधिक हिस्सा 15 से 59 की उम्र का है। वर्ष 2035-40 तक इस संख्या में इजाफा होने की उम्मीद है। यानी भारत के पास जनांकिकी लाभ लेने का अवसर अन्य किसी देश से अधिक है। अगर हमें इस अवसर का लाभ उठाना है तो हमें अतिरिक्त श्रम शक्ति को उपयोगी रोजगार देने होंगे। परंतु युवा बेरोजगारी की बढ़ती दर इसे निराशाजनक बना रही है।
 
श्रम ब्यूरो ने 2015-16 में आखिरी बार रोजगार और बेरोजगारी का जो पारिवारिक सर्वे किया था उसके द्वारा जारी आखिरी आंकड़े हमें कहीं अधिक बेहतर विश्लेषण करने की इजाजत देते हैं और इस बात की पुष्टिï करते हैं कि युवाओं के बीच बेरोजगारी पिछले काफी समय से बढ़ रही है। मैं 2017-18 के पीएलएफएस और श्रम ब्यूरो के 2015-16 के आंकड़ों की तुलना नहीं करूंगी क्योंकि उनमें घरों के चयन के मानक अलग-अलग थे। परंतु फिर भी श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण से यह संकेत मिलता है कि युवा बेरोजगारी के सामने कठिन चुनौतियां हैं। 
 
वर्ष 2015-16 के सर्वेक्षण में बेरोजगारी की दर 3.7 फीसदी थी जबकि 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं के लिए यह दर 10.3 फीसदी थी। श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 30 से 59 की उम्र के लोगों के लिए रोजगार की दर बमुश्किल 1 फीसदी रह गई।  श्रम ब्यूरो के 2015-16 के सर्वेक्षण में शैक्षणिक स्तर के आधार पर बेरोजगारी का विश्लेषण और अधिक परेशान करने वाले नतीजे पेश करता है। श्रम ब्यूरो के सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि शैक्षणिक स्तर के साथ बेरोजगारी दर में इजाफा होता है। स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री वालों में बेरोजगारी की दर तकरीबन 30 फीसदी थी। इससे पता चलता है कि पढ़े लिखे लोगों के लिए अपने कौशल और योग्यता के अनुसार रोजगार हासिल करना कितना मुश्किल काम है। 
 
दूसरी ओर अशिक्षित लोगों के लिए बेरोजगारी दर केवल 2.7 फीसदी रही। यह कमतर आंकड़ा बहुत आश्वस्त नहीं करता। यह केवल इस वजह से है कि अशिक्षित युवा अक्सर लंबे समय तक बेरोजगार रहने की स्थिति में नहीं रह सकते। युवाओं के बीच रोजगार की प्रकृति की बात करें तो स्वरोजगार प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी में भी भारी विसंगति नजर आती है। एकबार फिर 2015-16 के आंकड़े दिखाते हैं कि ये पारिवारिक श्रमिक हैं जिनको किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता है। रोजगारशुदा लोगों की अगली बड़ी श्रेणी यदाकदा काम करने वालों की है जो 36.64 फीसदी हैं। नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों की हिस्सेदारी 17.13 फीसदी के साथ अपेक्षाकृत कम है जो बताती है कि युवाओं के लिए अच्छे उत्पादक काम कितने कम हैं। इसके अलावा वर्ष 2015-16 में 40 प्रतिशत से अधिक युवा कृषि कार्यों में लगे हुए थे जबकि मात्र 13 फीसदी युवा ही विनिर्माण क्षेत्र में संलग्न थे। शैक्षणिक स्तर में सुधार के बावजूद बड़ी तादाद में युवाओं का कृषि कार्यों में लगे रहना यह बताता है कि गैर कृषि क्षेत्र उनके लिए जरूरत के मुताबिक रोजगार के उपयुक्त अवसर तैयार करने में नाकामी हासिल हुई है। 
 
करियर के उठान पर युवाओं को उनके योग्य रोजगार न मिल पाने से न केवल उनमें हताशा उत्पन्न होती है, बल्कि इसका उनके करियर पर काफी गहरा असर होता है। इतना ही नहीं यह बात भविष्य में उनके बेरोजगार रहने की आशंका को भी काफी मजबूत कर देती है। युवाओं की बेरोजगारी की समस्या से निपटने का कोई जादुई उपाय नहीं है। कई लोग कहते हैं शिक्षा और कौशल विकास क्षेत्र में सुधार करने से बात बन सकती है। इसके अलावा उद्यमिता पर जोर देने और श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात भी कुछ ऐसी ही है। परंतु इन कामों में से कोई भी तभी सफल साबित हो सकती है कि उसका क्रियान्वयन समग्र आर्थिक नीति के संदर्भ में किया जाए ताकि रोजगार की तादाद अधिकतम की जा सके न कि केवल जीडीपी में इजाफा हो। 
 
यकीनी तौर पर यह अपने आप में एक पहेली है कि हमारा देश 7 फीसदी की दर से वृद्घि हासिल कर रहा है लेकिन इसके बावजूद हमारे यहां शिक्षित युवाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर तैयार नहीं हो पा रहे हैं। आने वाले महीनों में राजनीतिक बदलाव संभव है लेकिन यह बात आवश्यक है कि देश में युवाओं की बेरोजगारी के मसले से भलीभांति निपटा जाए। ऐसा नहीं है कि इसकी केवल आर्थिक लागत ही मायने रखती है।  युवाओं की बेरोजगारी के सामाजिक प्रभाव बहुत गहरे हो सकते हैं। वर्ष 2011 का अरब उभार हमें यह याद दिलाता है कि मोहभंग की स्थिति वाले बेरोजगार युवाओं की हताशा हमें किस स्थिति में पहुंचा सकती है। 
 
(लेखिका इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशंस की वरिष्ठï फेलो हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: employment, BJP, narendra modi, NSSO,,
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