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खत्म हो बहस

संपादकीय /  February 20, 2019

रिजर्व बैंक ने सोमवार को अपनी अब तक की सबसे लंबी बोर्ड बैठक में यह तय किया कि वह चालू वित्त वर्ष में 28,000 करोड़ रुपये का अंतरिम लाभांश सरकार को हस्तांतरित करेगा। वर्ष 2017-18 के 40,000 करोड़ रुपये के अंतिम अधिशेष (केंद्रीय बैंक जुलाई-जून चक्र का अनुसरण करता है), जो पहली छमाही में केंद्र को मिला, उसे शामिल किया जाए तो आरबीआई द्वारा वर्ष 2018-19 में केंद्र को हस्तांतरित राशि 68,000 करोड़ रुपये हो गई। यह वर्ष 2017-18 में आरबीआई द्वारा केंद्र को दी गई 50,000 करोड़ रुपये की राशि से अधिक है। आरबीआई की ओर से सरकार को लाभांश सौंपे जाने का मामला पिछले काफी समय से विवाद और चर्चा का विषय बना हुआ है। 

 
सरकार आक्रामक ढंग से ज्यादा से ज्यादा राशि की मांग करती रही है। इसके लिए अनुमान से कम राजस्व संग्रह (खासतौर पर जीएसटी आने के कारण) तथा सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की जरूरत जैसी तमाम वजहों को जिम्मेदार बताया जाता रहा है। इस संदर्भ में अंतरिम लाभांश निश्चित तौर पर सरकार के लिए एक बड़ी राहत लेकर आएगा क्योंकि इसकी मदद से उसे चालू वित्त वर्ष में 3.4 फीसदी राजस्व घाटे का अपना तय लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। यह बात स्पष्टï है कि सरकार आरबीआई की उदारता और दानशीलता पर निर्भर रही है। उदाहरण के लिए इस माह के आरंभ में पेश किए गए अंतरिम बजट में वित्त मंत्री ने आरबीआई की ओर से राष्टï्रीयकृत बैंकों और वित्तीय संस्थानों को जारी किए जाने वाले लाभांश में संशोधन किया और वित्त वर्ष 2019 के लिए उसे 54,817 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 74,140 करोड़ रुपये कर दिया गया। अगले वित्त वर्ष के लिए सरकार 69,000 करोड़ रुपये का राजस्व केंद्रीय बैंक से चाहती है। यह केंद्र द्वारा आरबीआई, सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों से निर्धारित 82,911 करोड़ रुपये के राजस्व का 83 फीसदी है। 
 
आरबीआई की ओर से इस वर्ष उदारतापूर्वक दी गई राशि को देखें तो ऐसा लगता नहीं कि उसे इसमें कोई समस्या है। हालांकि अंतरिम लाभांश सरकार को देने की प्रक्रिया आरबीआई के पिछले गवर्नर ऊर्जित पटेल के कार्यकाल में शुरू हुई जिन्होंने गत वर्ष 10,000 करोड़ रुपये इस मद में दिए थे। परंतु यह मुद्दा केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच बड़े विवाद का विषय भी बन गया। आरबीआई ने उस वक्त यह दलील दी थी कि हर वर्ष अधिशेष राजस्व का बड़ा हिस्सा ब्याज से होने वाली आय और मुद्रा जारी करने से होने वाले लाभ के कारण जमा होता है और उसे आपातकालीन फंड के रूप में रहने देना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में वित्तीय स्थिरता बरकरार रखने के लिए जरूरत पडऩे पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। परंतु सरकार की चिंताएं कहीं अधिक तात्कालिक रही हैं। यही वजह थी कि दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। 
 
आरबीआई ने अंतरिम भुगतान को लेकर जो हालिया उदारता दिखाई है, उम्मीद की जानी चाहिए कि उस पर उठे सवाल विशेष सामिति की अगले माह आने वाली रिपोर्ट के बाद खत्म हो जाएंगे। समिति की अध्यक्षता पूर्व गवर्नर विमल जालान को सौंपी गई है। समिति आर्थिक पूंजीगत ढांचे की समीक्षा करेगी और यह सुझाव देगी कि केंद्रीय बैंक को पूंजी भंडार का प्रबंधन कैसे करना चाहिए और वह अपना अधिशेष सरकार को हस्तांतरित कर सकती है या नहीं। उम्मीद यह भी है कि समिति आरबीआई द्वारा जोखिम की प्रोविजनिंग के स्तर के मामले में भी अपनी राय देगी। अधिशेष भंडार से जुड़े तमाम मसले समिति के दायरे में रहेंगे। सरकार को समिति की अनुशंसाओं पर शीघ्र कदम उठाना होगा ताकि इस बहस पर विराम लग सके कि आरबीआई को कितना लाभांश सरकार के साझा करना चाहिए।
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