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मोदी सरकार में संसाधनों के इस्तेमाल पर उठते सवाल

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 19, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) को पूंजी मुहैया कराने में अहम बढ़ोतरी हुई है। लेकिन पीएसयू के लिए आवंटन में बढ़ोतरी के बावजूद इन सरकार नियंत्रित उद्यमों में आंतरिक संसाधन सृजन तुलनात्मक रूप से कम है और इन पांच वर्षों में सरकार की पीएसयू लाभांश पर निर्भरता में बढ़ोतरी जारी रही। पीएसयू के साथ सरकार के जुड़ाव का एक अहम संकेतक वह बजट मदद है, जो वह इन उद्यमों को मुहैया कराती है। इस मामले में भी मोदी सरकार ने काफी अधिक बजट सहायता मुहैया कराई, जिसका कुल बजट खर्च में हिस्सा इन पांच वर्षों में दोगुने से अधिक यानी 9 फीसदी से अधिक हो गया है। हालांकि इस बढ़ोतरी की गहन जांच से पता चलता है कि सरकार नियंत्रित उद्यमों को लेकर मोदी सरकार की नीति में बुनियादी कमजोरी है। सरकार पीएसयू को 90 फीसदी से अधिक बजट सहायता इक्विटी के रूप में देती है। शेष सहायता ऋण के रूप में दी जाती है। मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के दौरान इक्विटी के जरिये पीएसयू में 6.26 लाख करोड़ रुपये झोंके जाने का अनुमान है। लेकिन इस राशि में से करीब 94 फीसदी पीएसयू कंपनियों के चार समूहों में गई। इस राशि में से 2.53 लाख करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, 2.07 लाख करोड़ रुपये भारतीय रेलवे, 1.14 लाख करोड़ रुपये भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) और 17,320 करोड़ रुपये एयर इंडिया को मुहैया कराए गए। 

 
भारतीय रेलवे और एनएचएआई को इक्विटी पूंजी मुहैया कराने को लेकर कोई हो-हल्ला नहीं होना चाहिए। निस्संदेह सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें मुहैया कराई गई पूंजी का सदुपयोग होना चाहिए ताकि उससे पर्याप्त प्रतिफल मिले और रेलवे एवं सड़क क्षमता में बढ़ोतरी हो। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सरकार को हमेशा इन दो अहम बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को पर्याप्त संसाधन मुहैया कराने चाहिए। असल में मोदी सरकार का भारतीय रेलवे में इक्विटी योगदान पांच वर्षों के दौरान मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल 2009-10 से 2013-14 या संप्रग-2 के मुकाबले करीब दोगुना रहा। मोदी सरकार के दौरान एनएचएआई के लिए इक्विटी आवंटन मनमोहन सिंह के पांच वर्षों के मुकाबले करीब डेढ़ गुना अधिक रहा। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए इक्विटी आवंटन में भारी बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठेंगे। यह 2009-14 के दौरान 45,517 करोड़ रुपये था, जो 2014-19 के दौरान 2.53 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। 
 
साफ तौर पर इक्विटी आवंटन में भारी बढ़ोतरी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए अधिक पूंजी पर्याप्तता की जरूरत की वजह से हुई क्योंकि उनकी फंसे कर्जों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। क्या यह तय करने पर पर्याप्त विचार-विमर्श किया गया कि सरकार नियंत्रित किस कुशल बैंक को ऐसी इक्विटी पूंजी मिलनी चाहिए? या यह पूंजी हर सरकार नियंत्रित बैंक को उनका प्रदर्शन देखे बिना दी गई? यह बड़ी राशि है। क्या सरकार ने केवल कुशल बैंकों पर ध्यान देकर और अकुशल बैंकों को पूर्वनिर्धारित समय सीमा के दौरान अपने परिचालन को समेटने के लिए कहकर इस पैसे का सदुपयोग किया? 
 
इससे भी चिंताजनक मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल के दौरान एयर इंडिया को इक्विटी का आवंटन है। एयर इंडिया में वर्ष 2014 से 2019 के दौरान करीब 17,320 करोड़ रुपये का निवेश किए जाने का अनुमान है। सरकार ने एयर इंडिया की रणनीतिक बिक्री की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन राजनीतिक विरोध और निजीकरण के गलत तरीके समेत कई वजहों से एयर इंडिया सरकार के गले की फांस बनी हुई है। अब भी एयर इंडिया केंद्रीय सरकारी खजाने को चपत लगा रही है। असल में मोदी सरकार द्वारा एयर इंडिया के लिए मुहैया कराई गई 17,320 करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी संप्रग-2 से अधिक है। संप्रग-2 ने अपने पांच साल के कार्यकाल में एयर इंडिया को 15,200 करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी मुहैया कराई थी। रोचक बात यह है कि 2019-20 के अंतरिम बजट में एयर इंडिया के लिए इक्विटी पूंजी का आवंटन नहीं किया गया है। क्या इसका यह मतलब है कि सरकार 2019-20 में एयर इंडिया की रणनीति बिक्री करने में कामयाब रहेगी? इस समय इसके बहुत कम आसार नजर आ रहे हैं। इसलिए पीएसयू में इक्विटी के लिए प्रावधान करना यह दर्शाता है कि अनुमान कम रखा गया है। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए इक्विटी आवंटन भी अनुमान से कम है। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की और पूंजी की जरूरत अभी पूरी नहीं हुई है। उम्मीद है कि इन जरूरत से कम अनुमानों को पूर्ण बजट में ठीक किया जाएगा, जो जुलाई 2019 में पेश होने की संभावना है। 
 
लेकिन मोदी सरकार का पांच वर्षों में पीएसयू के लिए पूंजी आवंटन यह दर्शाता है कि उसने संभवतया इक्विटी के लिए आवंटित संसाधनों के एक बड़े हिस्से को बरबाद होने दिया। यह सरकार की कड़े फैसले लेने की अक्षमता को भी दर्शाता है। भले ही ये फैसले निजीकरण से संबंधित हों या सार्वजनिक क्षेत्र के कमजोर बैंकों को अपना परिचालन बंद करने के लिए बाध्य करने से संबंधित हो। 
Keyword: narendra modi, BJP, PSU,,
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