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प्रवर्तकों पर नरमी

संपादकीय /  February 19, 2019

जेट एयरवेज अपनी बहुलांश हिस्सेदारी कर्जदाताओं को एक रुपये में बेच रही है। यह बिक्री एक जटिल व्यवस्था के तहत की जा रही है, इस विषय पर आगामी 21 फरवरी को निर्णय लिया जाएगा। भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व में कर्जदाताओं के एक समूह ने देश की सबसे बड़ी पूर्णकालिक सेवा प्रदान करने वाली इस विमानन कंपनी में 50.1 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का प्रस्ताव रखा है। इसके लिए 11.4 करोड़ नए शेयर जारी किए जाएंगे। यह व्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा गत वर्ष प्रस्तुत एक खाके के अनुरूप ही है। यह प्रक्रिया नकारात्मक नेटवर्थ वाली कंपनियों पर लागू होती है और इसे बैंक-लेड प्रोविजनल रिजॉल्युशन प्लान का नाम दिया गया है। इसके लिए प्रवर्तक समूह और एतिहाद के बोर्ड समेत तमाम अंशधारकों की मंजूरी आवश्यक होगी। एतिहाद की जेट में 24 फीसदी हिस्सेदारी है। दिक्कत यह है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है।

 
यह अच्छी खबर है कि जेट एयरवेज शायद संभावित संकट से बच जाएगी लेकिन यह बात अहम है कि जेट एयरवेज बची रहे। अगर ऐसा होगा तभी नागरिक उड्डयन क्षेत्र में समुचित प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सकेगी। फिलहाल इस क्षेत्र में सस्ती विमानन सेवा इंडिगो का दबदबा है। परंतु इस प्रस्तावित राहत के कुछ अन्य पहलू हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बात, योजना यह है कि राष्ट्रीय निवेश एवं अधोसंरचना फंड (एनआईआईएफ) जेट के 8,500 करोड़ रुपये के कर्ज को निपटाने में कुछ राशि का सहयोग करेगा। यह अपने आप में एक पहेली है। एनआईआईएफ की स्थापना बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इस फंड में निजी निवेशकों और सरकार के बीच साझेदारी है। इसका उद्देश्य है ऐसी बुनियादी परियोजनाओं को निवेश मुहैया कराना जिन्हें फिलहाल निजी पूंजी से नहीं बनाया जा सकता है। बहरहाल, एनआईआईएफ का इस्तेमाल कर जेट एयरवेज को उबारना सही संकेत नहीं है। इससे भविष्य के निजी निवेशकों को यह संकेत मिलेगा कि सरकार इस फंड का इस्तेमाल राजनीतिक रूप से सहज कॉर्पोरेट बचाव के लिए कर सकती है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि निजी निवेशक फंड पर आगे भरोसा क्यों करेंगे? इसके अलावा ऐसे प्रश्न भी उठेंगे कि बैंकों को किसी ऐसी कंपनी में बहुलांश हिस्सेदारी रखनी चाहिए या नहीं जो नागर विमानन जैसे अत्यंत जोखिम भरे क्षेत्र में काम कर रही हो।
 
एक सवाल यह भी है कि डेट-इक्विटी वाले इस सौदे में जिसमें स्पेशल राइट का मसला शामिल है, उसमें जेट के संस्थापक और प्रमुख नरेश गोयल को 20-21 फीसदी हिस्सेदारी रखने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। यह उनकी मौजूदा 50 फीसदी की हिस्सेदारी के आधे से भी कम है। सवाल यह है कि आखिर गोयल को राहत पैकेज के बाद भी किसी तरह की हिस्सेदारी क्यों सौंपी जा रही है? अगर बैंकों जैसे कर्जदार बोझ वहन कर रहे हैं तो वित्त जगत के मूलभूत सिद्घांत कहते हैं प्रवर्तक (इस मामले में गोयल) को कोई हिस्सेदारी नहीं मिलनी चाहिए। शेयर का जोखिम, कर्ज के जोखिम से बड़ा है और कर्जदारों का बकाया शेयर धारकों के पहले चुकाया जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि इस सौदे में जेट के प्रवर्तक के प्रति काफी नरमी बरती जा रही है और यह मामला किंगफिशर एयरलाइंस के प्रति बैंकों की नरमी की याद दिलाता है। बैंकों ने माल्या के विमानन कंपनी का मालिक रहते हुए भी उसमें काफी पैसा डाला। प्रभावी तौर पर देखा जाए तो बैंक एक निजी विमान कंपनी के लिए जनता के पैसे को दांव पर लगा रहे हैं। जेट के कुल कर्ज में स्टेट बैंक की हिस्सेदारी एक चौथाई है। ऐसे सौदों को रुक जाना चाहिए था, तो अब तक प्रवर्तकों को ऐसी पेशकश क्यों की जा रही है।
Keyword: aviation, flight, airport, jet airways,,
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