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लोकतांत्रिक गणराज्य में संस्थाओं का संयम रखना जरूरी

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  February 18, 2019

यह गणराज्य राजनीतिक एवं संवैधानिक टकराव के अभूतपूर्व दृश्य देख रहा है। हालांकि आम चुनावों के तेजी से नजदीक आने से ऐसा होना अप्रत्याशित भी नहीं है। अगर तमाम संवैधानिक संस्थानों में एक खास प्रवृत्ति ही फैली हुई है तो पता चलता है कि संवैधानिक संस्थान किस तरह संयम बरतने से दूर हैं। एजेंसियों और विविध संवैधानिक भूमिकाओं के लिए निर्धारित संस्थानों में टकराव होना पूरी तरह बुरा भी नहीं है। असल में, ऐसे संघर्ष उस राजनीतिक नियंत्रण एवं संतुलन को प्रोत्साहित करते हैं जिसकी परिकल्पना संविधान में की गई है। यही वजह है कि संस्थानों के मिलकर काम करने और आपसी संघर्ष से परहेज करने की वकालत करने वाले लोग इस संघर्ष में निहित मूल्य को समझ नहीं पाते हैं। जब एक राज्य सरकार केंद्र की जांच एजेंसियों के खिलाफ खड़ी होती है तो इसका बुरा होना कोई जरूरी नहीं है। जब केंद्रीय जांच एजेंसी इस मामले में दखल के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है तो यह एक अच्छी बात होती है। आखिर उच्चतम न्यायालय पक्षपात-रहित हस्तक्षेप का सही मंच है।

 
फिर भी यह याद रखना अहम है कि संघर्ष की अनवरत स्थिति का होना अच्छी बात नहीं है। जब कोई संस्था अपने लिए निर्धारित कार्य का निर्वहन करती है और उसका अन्य संस्थाओं से टकराव होता है तो वह एक अच्छी बात है लेकिन अपनी भूमिका का गलत इस्तेमाल करने से पैदा होने वाला टकराव अच्छा नहीं है। ऐसी स्थिति में अक्सर यह सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या वास्तव में संस्था ने अपनी भूमिका का उल्लंंघन किया है? उस समय न्यायालयों को ही विवाद के समाधान के लिए आगे आना पड़ता है। 
 
राजकाज में दक्ष व्यक्ति की तरह परिपक्व तरीके से किसी संघर्ष के समाधान का अहम पहलू यह है कि संस्थान और उनकी बागडोर संभालने वाले लोग संयम बरतें। अपने चारों तरफ नजर दौड़ाने पर आपको दिख जाएगा कि संघर्ष की स्थिति में संयम लगभग नदारद ही रहता है। कई उदाहरणों से संयम की यह कमी देखी जा सकती है। जब संविधान के निर्माताओं ने यह प्रावधान रखा कि लोकसभा का अध्यक्ष ही किसी प्रस्तावित विधेयक के 'धन विधेयक' होने के बारे में अंतिम रूप से फैसला कर सकता है तो उसके पीछे यही सोच थी कि इस उच्च पद पर बैठा व्यक्ति यह तय करने का जरूरी संयम रखेगा कि उस विधेयक पर राज्यसभा को चर्चा करने की जरूरत नहीं है। लेकिन इतिहास बताता है कि हमारे संविधान निर्माताओं का यह भरोसा गलत साबित हुआ है।
 
जब भारतीय गणराज्य का गठन एक सच्चे लोकतंत्र के तौर पर होने के बावजूद सशस्त्र बलों के लिए आंतरिक लोकतंत्र को निलंबित रखा गया तो इस ढांचे के पीछे यही भरोसा था कि सशस्त्र बलों का नेतृत्व संयम की एक अंतर्निहित व्यवस्था बनाएगा कि इस संरक्षण का किस तरह इस्तेमाल किया जाए। फिर भी, सशस्त्र बलों में अर्दली (अब उन्हें सहायक कहा जाता है) की दासता की हद तक जाने वाली व्यवस्था बदस्तूर जारी है। जब सेना को लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के अधीन बनाया गया था तो उम्मीद यही थी कि नेतृत्व संयम का परिचय देगा और तय नियमों से चलेगा। असल में, सैन्य नेतृत्व हर दूसरे दिन खबरों में रहता है। लेकिन इसकी वजह यह है कि वे सामाजिक मुद्दों से लेकर दूसरे देशों के साथ संबंधों तक के मसले पर खुलकर अपनी राय रखते हैं।
 
जब राज्यपालों को एक राजनीतिक दल या एक गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने या राज्य में कानून व्यवस्था की हालत खराब होने के बारे में रिपोर्ट देकर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को हटाकर वहां राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने की शक्ति दी गई थी तो उसके पीछे यही सोच थी कि इस उच्च पद पर आसीन व्यक्ति संयम का परिचय देते हुए फैसले करेगा। हालांकि इतिहास इस धारणा को गलत साबित करता है। जब संवैधानिक अदालतों को न्यायिक समीक्षा की शक्ति दी गई थी तो उसके पीछे यही धारणा थी कि न्यायाधीश संयम बरतेंगे और समाज एवं इसके सदस्यों की किस्मत तय करने वाले कार्यकारी फैसले वाले आईएएस अधिकारी नहीं बनना चाहेंगे। जब संविधान के अनुच्छेद 142 ने उच्चतम न्यायालय को न्याय देने के लिए कोई भी आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान की थी तो कभी भी यह नहीं सोचा गया था कि यह प्रावधान कानून बनाने और उसके अनुपालन का अनूठा न्याय-क्षेत्र बना देगा। यह स्थिति पृथक शक्तियों के बीच घालमेल कर देती है। 
 
जब संसद ने नियामकीय एजेंसियों को विधायी, कार्यकारी एवं अद्र्ध-न्यायिक भूमिकाएं निभाने के लिए अधिकार प्रदान किए थे तो उसके पीछे यही सोच थी कि इन संस्थानों के प्रमुख अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाने के दौरान संयम का परिचय देंगे और वे आंतरिक अनुशासन का मामला मानते हुए इन प्रकार्यों को अलग रखेंगे। लेकिन यह अपेक्षा पूरी तरह गलत साबित हुई है। गणतंत्र के अस्तित्व में आने के 70वें साल में हम आम चुनाव की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस बात पर गौर करने का वक्त आ गया है कि क्या महज चुनाव कराना ही लोकतंत्र है या फिर हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य को मिलजुलकर आकार देने वाली विभिन्न संस्थाओं की कार्यप्रणाली में व्यापक संरचनात्मक एवं ढांचागत सुधार की बड़ी जरूरत खड़ी हो गई है।
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: cbi, BJP, congress, election, court,,
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