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प्रबंधकीय कौशल में निजी क्षेत्र बनाम सरकार

अजय शाह /  February 18, 2019

सरकारी कार्यप्रणाली के उलट एक निजी फर्म का प्रबंधन काफी हद तक निरंकुश ही होता है। ऐसी स्थिति में उसके प्रबंधन कौशल का सरकार में इस्तेमाल काफी मुश्किल है। बता रहे हैं अजय शाह

 
भारत में किसी फर्म के संचालन के बारे में हम काफी कुछ जानते हैं। लेकिन कंपनियों के प्रबंधन से अर्जित ज्ञान को सरकार के प्रबंधन तक स्थानांतरित कर पाना बहुत कम ही हो पाता है। सरकारों  को अशक्त फीडबैक लूप का सामना करना पड़ता है। किसी भी सरकार का सार कही जाने वाली बाध्यकारी शक्ति का कंपनियों में अभाव होता है। सरकार का आकार और जटिलता निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी एवं सर्वाधिक  जटिल कंपनियों से काफी बड़ी होती है। सरकार के प्रमुख अवयव- नीति एवं वार्तालाप, निजी क्षेत्र में नहीं दिखाई देते हैं। नीति एवं लोक प्रशासन की दुनिया कंपनियों में व्याप्त मुनाफे की दुनिया से बुनियादी तौर पर अलग है। 
 
वर्ष 1991 के पहले भारत में अधिकांश कंपनियों का प्रबंधन खराब ढंग से होता था। लेकिन अब भारत में हमारे पास बेहद कुशलता से संचालित कंपनियों की बड़ी तादाद है। इन कंपनियों में अहम पदों पर कार्यरत लोग बड़े एवं जटिल संगठन चलाने की अपनी काबिलियत को लेकर काफी गर्व महसूस करते हैं। इसके साथ ही हम भारतीय राज्य को अव्यवस्थित रूप में भी देखते हैं जहां बुनियादी चीजें भी सही ढंग से नहीं हो पाती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारतीय निजी क्षेत्र के प्रबंधन कौशल एवं तकनीकों को सरकार के भीतर तक लाया जा सकता है?
 
इस दिशा में पहली समस्या तो फीडबैक लूप में ही निहित है। सभी बड़ी निजी कंपनियां शेयर बाजार में कारोबार के लिए सूचीबद्ध हैं और वे शेयर मूल्य में वृद्धि का लक्ष्य लेकर काम करती हैं। वित्तीय बाजारों में अटकलों की बड़ी मशीनरी सक्रिय होने से उस कंपनी के प्रदर्शन का वास्तविक पैमाना सामने आ जाता है। आंतरिक स्तर पर निजी फर्मों में परिचालन से संबंधित प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईसी) दैनिक आधार पर दर्ज होती है। राजस्व एवं लाभ किसी भी फर्म के कामकाज को परखने के सहज उपकरण हैं। लेकिन जब मामला देश का आता है तो ये तमाम तरीके नदारद हो जाते हैं। विनिमय दर किसी भी देश की सफलता या नाकामी का सूचक नहीं है और शेयर बाजार सूचकांक भी एक कमजोर मानक ही है। निर्णय के स्तर और उसके प्रदर्शन को आंकने को लेकर कोई दैनिक मानक एवं फीडबैक लूप भी नहीं है।
 
उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत में यह समस्या और गंभीर है क्योंकि हम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का भी आकलन सटीकता से नहीं करते हैं। सभी कंपनियों के समग्र प्रदर्शन, निवेश परियोजनाओं और परिïवारों की स्थिति को दर्ज कर अब अर्थव्यवस्था के कामकाज के बारे में काफी हद तक उपयोगी रिपोर्ट कार्ड बनाया जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद कमजोर फीडबैक लूप नीति के संचालन को बाधित करेगा। विभेद का दूसरा बड़ा क्षेत्र सरकार की शक्तियों में निहित है। एक फर्म में प्रबंधन टीम उत्पाद, उत्पादन प्रक्रिया और आंतरिक संगठन को साधने वाले तरीके आजमाती है। लेकिन सरकार में आंतरिक संगठन के बारे में निर्णय-निर्माण की शक्ति होती है। हालांकि बाध्य करने की एकाधिकारिक शक्ति सरकार को निजी क्षेत्र से अलग करने वाला अहम अवयव है।
 
सरकार को हिंसा संबंधी मामलों में एकाधिकार होता है। वह निजी व्यक्तियों को कर देने या अपने व्यवहार में बदलाव के लिए बाध्य करने की क्षमता रखती है। सरकार की एजेंसियों का आम तौर पर एकाधिकार होता है। मसलन, ड्राइविंग लाइसेंस एक सरकारी कार्यालय से ही हासिल किया जा सकता है, उपभोक्ता के पास कोई और विकल्प नहीं होता है।  निजी फर्म अपनी आंतरिक गतिविधियों को ही नियंत्रित करती हैं और अपनी कंपनी के बाहर के लोगों को बाध्य नहीं कर सकती हैं। वे बाहर की तरफ व्यग्रता से देखती हैं और उपभोक्ताओं की अपने उत्पादों के प्रति प्रतिक्रिया को लेकर फिक्रमंद रहती हैं। किसी कंपनी के मेहनत से तैयार उत्पाद को खारिज करने की पूरी शक्ति उपभोक्ताओं के पास रहती है। इसके विपरीत, सरकारी एजेंसियां अपने क्षेत्र की आंतरिक गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं और उसके बाहर के लोगों को बाध्य करती हैं। मनीष सभरवाल की व्याख्या के मुताबिक एक ठेठ सरकारी एजेंसी के उपभोक्ता नहीं बल्कि बंधक होते हैं। सरकारी संगठनों के बारे में एक बुनियादी अहंकार होता है जबकि निजी संगठन उससे बचे रहते हैं। लोक नीति की पहेली छापा मारने और जेल में डालने की शक्ति रखने वाले कर्मचारियों में निहित होती है।
 
निजी एवं सार्वजनिक प्रबंधन के बीच असमानता का तीसरा आयाम आकार और जटिलता है। भारत में किसी बड़ी कंपनी के भी कर्मचारियों की संख्या 25,000 होती है। इसकी तुलना में किसी भी सरकारी निकाय का आकार काफी बड़ा होता है। भारतीय रेलवे में ही करीब 13 लाख कर्मचारी हैं। अगर रेलवे के सक्षम कर्मचारियों की संख्या इसकी आधी है तो भी यह निजी क्षेत्र की तुलना में एक विशाल एवं जटिल संगठन बन जाता है।  लोक नीति की प्रक्रिया न केवल कर्मचारियों बल्कि सभी लोगों के जरिये संचालित होती है। यह निर्णय निर्माण की जटिलता बढ़ा देता है। नीतिगत निर्णयों के दौरान विशाल जटिल सरकारी संगठनों के आंतरिक व्यवहार और फिर एक अरब से अधिक की संख्या वाली जनता की प्रतिक्रिया को भी ध्यान में रखना होता है। किसी भी निजी फर्म में इस तरह की जटिलता नहीं देखी जाती है। 
 
आखिर में, लोक नीति के सार-नीतिगत चिंतन और वार्तालाप पर गौर करते हैं। सरकार के भीतर एक नीति को सही बनाने की प्रवृत्ति देखी जाती है और फिर उस नीति को विवेकाधीन के दायरे से परे एवं गैर-नियोजित ढंग से संचालित किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग उस नीति का हिस्सा बनेंगे और अपनी पसंद चुनेंगे और कोई भी संवेदनशील सरकार एक नियोजित ढंग से बरताव नहीं करेगी। सरकार सामान्य ढांंचे से भरा वह दायरा होता है जो बड़े स्तर पर काफी अच्छे नतीजे देते हैं। इसके उलट एक निजी फर्म विविध बिंदुओं वाले अनुबंधों का बड़ा जोड़ होता है। निजी कंपनी में समान बरताव वाला कोई प्रावधान नहीं होता है।
 
एक निजी फर्म का प्रबंधन काफी हद तक निरंकुश मिजाज वाला होता है, क्योंकि उसके नियंत्रण में उसका स्टाफ ही होता है। इसके उलट, लोक नीति में शक्ति के बिखराव की जरूरत होती है। सफल सरकारों में बातचीत और समझौते की अंतहीन प्रक्रिया चलती है क्योंकि सरकार के बाहर के लोगों को बाध्य करना ही सरकार का सार है। लोक नीति की दुनिया में नेतृत्व के पास दूसरे की बात सुनने, उसकी राय का सम्मान करने और मध्यम मार्ग अपनाने का गुण होना चाहिए। यह सांगठनिक संस्कृति अधिकांश निजी फर्मों से काफी अलग है।
 
यह देखना दिलचस्प है कि कुछ बेहद बड़ी एवं जटिल फर्मों का सांगठनिक डीएनए सरकार की रणनीतियों की तरफ मुड़ा है। बड़ी एवं जटिल फर्मों ने मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) की शक्तियां कम कर दी हैं, निर्णय-निर्माण ढांचे को विभक्त किया है और विवेकाधीन निर्णयों के बजाय नियमों पर अधिक जोर देना शुरू किया है। इस सांगठनिक विकास को सौ या हजार गुना स्तर पर ले जाना लोक प्रशासन की चुनौती है। भारत में हम सफलता एवं समृद्धि को सम्मान की नजर से देखते हैं और कारोबारी तबके के प्रति भी काफी इज्जत है। हम यह मान लेते हैं कि टीसीएस में अपनाई जाने वाली पुख्ता मानव संसाधन नीतियां सरकार में भी अच्छी तरह काम करेंगी। लेकिन हमें इस विशेषज्ञता को लोक नीति की दुनिया में स्थानांतरित करने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। एक देश कोई कंपनी नहीं होता है।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं)
Keyword: private firm, management, MIC,,
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