बिजनेस स्टैंडर्ड - समुचित हस्तक्षेप की अवस्था!
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समुचित हस्तक्षेप की अवस्था!

संपादकीय /  February 18, 2019

जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण हो रहा है, देश के नियामकों के समक्ष मौजूद चुनौतियां और अधिक जटिल होती जा रही हैं। ज्यादातर क्षेत्रों में ऐसा ढांचा देखने को मिल रहा है जहां विजेता को सबकुछ हासिल होता है। 'सामान्य' प्रतिस्पर्धी बाजारों में नियामकों के समक्ष तयशुदा लक्ष्य होते हैं और उन्हें हासिल करने के उपाय भी चुनिंदा होते हैं। वे यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करते हैं कि व्यावसायिक समूहन न हो, गैर प्रतिस्पर्धी तौर तरीकों का इस्तेमाल न किया जाए। इस मामले में आम धारणा यह है कि अगर बाजार को अपने स्तर पर काम करने दिया जाए तो वह स्वयं उपभोक्ताओं के हित का ध्यान रख सकता है और नियामक का काम केवल यह सुनिश्चित करना है कि कोई बाजार प्रतिभागी के कामकाज में विसंगति पैदा करने का प्रयास न करे।

 
बहरहाल, आधुनिक अर्थव्यवस्था में कई क्षेत्र नेटवर्क प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। दूसरे शब्दों में, कंपनियां जितनी बड़ी होती हैं, उतनी ही अधिक मुनाफा कमाने वाली या किफायती होती जाती हैं। इससे नैसर्गिक एकाधिकार उत्पन्न होता है। अतीत में उपयोगिता वाले क्षेत्र या बुनियादी ढांचा जैसे क्षेत्र ऐसे नैसर्गिक एकाधिकार के शिकार हो चुके हैं, इसलिए उनका अलग तरह से नियमन करने की आवश्यकता पड़ी। बहरहाल, अब नेटवर्क प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई प्रमुख क्षेत्रों का अहम कारक है। इनमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं जिनमें निजी क्षेत्र का दबदबा रहा है। बहरहाल, ऑनलाइन क्षेत्र का उदाहरण लेते हैं। यहां गूगल की नियंत्रक कंपनी अल्फाबेट का दबदबा है। यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई ऐसा सर्च इंजन सामने आएगा जो गूगल का मुकाबला कर सके। ऐसे में अल्फाबेट को गैर प्रतिस्पर्धी ढंग से व्यवहार करने की आवश्यकता नहीं है। 
 
हमारे देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। दूरसंचार भी ऐसा ही एक क्षेत्र है। रिलायंस जियो के आगमन का अर्थ यह था कि इस क्षेत्र के अन्य कई बाजार प्रतिभागियों की विदाई होगी क्योंकि उनके पास रिलायंस इंडस्ट्रीज के समान धन-संसाधन नहीं थे। अगर कोई पुरानी कंपनी आक्रामक कीमतों की पेशकश करती तो नियामक को यह पता होता कि उसे क्या करना है लेकिन अगर कोई नवागत कंपनी कम कीमत पर बेहतर उत्पाद दे रही है तो? ऐसे में नियामक को कब और कहां हस्तक्षेप करना चाहिए? यह समस्या केवल दूरसंचार क्षेत्र तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है। जरा नागरिक उड्डïयन क्षेत्र पर विचार कीजिए। कोई विमानन कंपनी जो अपनी उड़ानें भर रही है, वह अपनी आखिरी की सीटें सस्ती बेच सकती है क्योंकि उनकी सीमांत लागत तकरीबन शून्य होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि पहले से अच्छा प्रदर्शन कर रही विमानन कंपनी के लिए लाभ ही लाभ है। उदाहरण के लिए भारत में इसका अर्थ यह है कि बाजार में इंडिगो का दबदबा बरकरार है। 
 
अन्य क्षेत्रों में भी जल्दी नेटवर्क प्रभाव नजर आ सकता है। उदाहरण के लिए ई-रिटेल उपभोक्ता आधार में विस्तार के साथ अधिक प्रभावी हो सकता है। ऑफलाइन खुदरा कारोबारियों या लॉजिस्टिक्स का पहले से मौजूद नेटवर्क किसी कंपनी को वह किफायत दे सकता है जिसके लिए अन्य कंपनियों को संघर्ष करना होगा। नियामक ऐसे क्षेत्र का प्रबंधन कैसे करेंगे जहां कुछ कंपनियां बाहरी कारकों के कारण ज्यादा बेहतर हों। कीमतों और मात्रा के निर्धारण की बात करें तो भारतीय संदर्भ में यह कोई हल सुझाता नहीं नजर आता। देश में विजेता को सब कुछ मिलने की स्थिति को बदलने के लिए नियामकीय हस्तक्षेप को लेकर अधिक सशक्त बहस की आवश्यकता है। एकाधिकार स्थापित होने तक प्रतीक्षा करने पर बहुत देर हो जाएगी। इस मामले में उपभोक्ता कल्याण को लेकर दूरगामी दृष्टिï की जरूरत है।
Keyword: india, economy, online, retail,,
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