बिजनेस स्टैंडर्ड - अनुबंध में प्रावधान होने पर ही ब्याज भुगतान का आदेश
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अनुबंध में प्रावधान होने पर ही ब्याज भुगतान का आदेश

एम जे एंटनी /  February 17, 2019

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि निर्माण कार्यों के अनुबंध की सामान्य शर्तें अगर ब्याज की मांग करने से रोकती हैं तो मध्यस्थों के पास ब्याज भुगतान का आदेश देने का अधिकार नहीं रह जाता है। उसने जेपी एसोसिएट्स बनाम टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन मामले में यह फैसला सुनाया है। निर्माण कंपनी को एक परियोजना का ठेका मिला था लेकिन कुछ मुद्दों पर विवाद खड़ा हो गया। इस मामले के मध्यस्थता में जाने के बाद जो फैसला आया, वह काफी हद तक जेपी के पक्ष में था जिसमें बकाया राशि पर ब्याज देने को भी कहा गया था। लेकिन अनुबंध शर्तों में ब्याज न देने का प्रावधान होने से इस फैसले पर भी विवाद खड़ा हो गया।

इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि अनुबंध की सामान्य शर्तों में बकाया राशि पर किसी भी तरह के ब्याज भुगतान से रोक लगाने वाले प्रावधान रखे गए थे, लिहाजा मध्यस्थों के पास ब्याज भुगतान का आदेश देने का अधिकार नहीं रह जाता। इसके खिलाफ सर्वोच्च अदालत में की गई जेपी की अपील भी नकार दी गई है। इस फैसले के मुताबिक, जेपी ने जिन पुराने मामलों की नजीर दी है वे मध्यस्थता अधिनियम 1940 के दायरे में थे और मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम के नए कानून में ये प्रावधान बदल चुके हैं।

हरियाणा के शराब लाइसेंस नियम में बदलाव निरस्त

उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा में बोतलबंद विदेशी शराब के आयात के लाइसेंस संबंधी नियमों में बदलाव करने का अधिकार राज्य के वित्त आयुक्त के पास न होने से इस नियम को निरस्त कर दिया है। वित्त आयुक्त ने समूचे राज्य के लिए एकल शराब लाइसेंस जारी करने के नियम बदल दिए थे जिसे विदेशी शराब कंपनियों की प्रतिनिधि संस्था इंटरनैशनल स्पिरिट्स ऐंड वाइंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी। हरियाणा शराब लाइसेंस नियमों में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन को चुनौती देते हुए विदेशी शराब कंपनियों ने दलील दी थी कि शराब कारोबार में एक निजी कंपनी का एकाधिकार स्थापित करने वाला राज्य सरकार का यह कदम संविधान के तहत हासिल व्यापार की स्वतंत्रता के खिलाफ है। इसके अलावा इस संशोधन को हरियाणा में लागू पंजाब आबकारी अधिनियम का भी उल्लंघन करने वाला बताया गया है। न्यायालय ने उसकी अपील मंजूर करते हुए कहा है कि समूचे राज्य के लिए कई लाइसेंस जारी के संदर्भ में नियम बदलने के लिए वित्त आयुक्त सक्षम प्राधिकारी नहीं है। यह शक्ति राज्य सरकार के पास है। हालांकि यह फैसला तीन न्यायाधीशों के पीठ ने 2-1 के बहुमत से दिया। असहमति जताने वाले न्यायाधीश ने शराब विक्रेता कंपनियों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि नई व्यवस्था से राजस्व संग्रह बढऩे से राज्य लाभांवित ही हुआ है। हालांकि उन्होंने भी राज्य से सुरक्षा-उपायों का एक समुचित ढांचा तैयार करने को कहा है। 

चेक बाउंस मामले में कंपनी के निदेशक को सजा

चेक बाउंस होने पर अगर उस कंपनी को मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है तो उस चेक पर दस्तखत करने वाले कंपनी निदेशक को इसके लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने हिमांशु बनाम बी शिवमूर्ति मामले में यह फैसला सुनाया है। भुगतान पाने वाले व्यक्ति ने चेक बाउंस होने पर उस पर दस्तखत करने वाले निदेशक के खिलाफ निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स ऐक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। मजिस्ट्रेट ने लक्ष्मी सीमेंट ऐंड सिरैमिक्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड के निदेशक के खिलाफ समन जारी किया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उस समन को निरस्त करने की अर्जी ठुकरा दी तो उच्चतम न्यायालय में अपील की गई। निदेशक की दलील दी थी कि उन्होंने निजी हैसियत से वह चेक नहीं जारी किया था और इस मामले में कंपनी एवं निदेशकों के खिलाफ शिकायत नहीं की गई थी। इस कानून के मुताबिक कंपनी को नोटिस नहीं जारी किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील से सहमति जताते हुए निदेशक की अपील स्वीकार कर ली। 

कंपनी के खिलाफ पूर्व सीईओ की अर्जी खारिज 

उच्चतम न्यायालय ने कंपनी के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग करने वाले पूर्व सीईओ की रिट याचिका को खारिज कर दिया है। रमेश संका बनाम भारत संघ मामले में कहा है कि कर्मचारी और नियोक्ता के बीच के विवाद का निपटारा रिट याचिका के जरिये नहीं किया जा सकता है। इस मामले में न्यायालय ने याची से सिविल अदालत का रुख करने की सलाह दी है। याची ने इस कंपनी पर कई वित्तीय अनियमितताओं में लिप्त रहने का आरोप लगाया था। उसने पहले भी इस संदर्भ में कई अन्य इकाइयों से शिकायत की थी और उसके बाद आरोपों की जांच की मांग को लेकर उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि कुछ एजेंसियां इन आरोपों की जांच कर रही हैं और दोषी पाए जाने वाले कंपनी अधिकारियों को कार्रवाई का सामना करना होगा। 

हाउसिंग सोसाइटी के उप-नियम निरस्त

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली की एक हाउसिंग सोसाइटी के उस नियम को निरस्त कर दिया है जिसमें सोसाइटी की मंजूरी के बगैर अपना घर किसी गैर-सदस्य को बेचने पर रोक लगाई गई थी। न्यायालय ने दिल्ली दयालबाग को-ऑपरेटिव बनाम रजिस्ट्रार मामले में दायर अपील को खारिज करते हुए कहा है कि दिल्ली को-ऑपरेटिव सोसाइटी ऐक्ट में इस तरह की पाबंदी लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। लिहाजा इस सोसाइटी का यह नियम सोसाइटी ऐक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। यह फैसला कहता है, 'यह रजिस्ट्रार और पंजीकृत हाउसिंग सोसाइटी का ही दायित्व है कि निर्धारित नियमों का परीक्षण किया जाए और जरूरी लगने पर उनमें बदलाव को भी सुनिश्चित करें।' अगर अधिकारी इस जिम्मेदारी को नहीं निभाते हैं तो कानून के प्रतिकूल सोसाइटी का कोई भी उप-नियम प्रभावी नहीं हो सकता है।

तीन दशक बाद भी इंसाफ का इंतजार अधूरा

श्रम एवं पर्यावरण संबंधी मामलों के निपटारे में लंबा समय लगने की स्थिति फिर देखी गई है। उच्चतम न्यायालय के हाल के दो फैसले इस हालत को बयां करते हैं। श्रम संबंधी एक मामला तीन दशकों तक कछुए की चाल चलने के बाद उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा और फिर वापस औद्योगिक अदालत में भेज दिया गया। बूंदी जिला पेट्रोल पंप डीलर्स एसोसिएशन बनाम जिला पेट्रोल मजदूर संघ मामले में सर्वोच्च अदालत ने एसोसिएशन को पक्ष रखने का मौका नहीं दिए जाने के आधार पर राजस्थान उच्च न्यायालय और औद्योगिक पंचाट के आदेशों को निरस्त कर दिया। यह विवाद आकस्मिक अवकाश, महंगाई भत्ता और सालाना वृद्धि की मांग को लेकर खड़ा हुआ था। इसी तरह एक मामला दो दशक पुराना था। वसंत केमिकल्स लिमिटेड बनाम हैदराबाद वाटर ऐंड सीवरेज बोर्ड मामला भी वर्ष 2000 में सीवर टैक्स की मांग को लेकर शुरू हुआ था। बोर्ड ने कंपनी के अवशिष्ट निपटान को लेकर उससे कर की मांग की थी जिसे अदालत में चुनौती दी गई। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने कंपनी की अर्जी को खारिज कर दिया है।

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