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कश्मीर के हालात से निपटने की चुनौती हुई और कठिन

मिहिर शर्मा /  February 17, 2019

कश्मीर घाटी के इतिहास के सबसे घातक हमले के बाद कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर चर्चा करके हम यह देख सकते हैं कि भविष्य में क्या कुछ हो सकता है। ये तमाम बातें बहुत परेशान करने वाली हैं। सबसे पहली बात तो यह कि 2014 के बाद से घाटी में हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इसकी कई वजह हैं  लेकिन सबसे बड़ी वजह यही है कि भारत सरकार ने 2014 के पहले के 10 वर्षों में हासिल लाभ को गंवा दिया। सरकार ने अधिक से अधिक कश्मीरियों को देश की मुख्य धारा के साथ जोडऩे के बजाय, कश्मीर को एक राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया। 

ऐसा नहीं है कि 2014 के पहले घाटी स्वर्ग जैसी थी, लेकिन तब से अब तक हिंसा की घटनाओं में जो इजाफा हुआ है, वह आंकड़ों में स्पष्ट नजर आ रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद के समक्ष आतंकवाद के जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, उनमें निरंतर इजाफा नजर आया है। वर्ष 2014 में जहां 222 आतंकी घटनाएं हुई थीं वहीं, 2018 में इनकी तादाद 614 हो गई। 2014 में जहां 47 सुरक्षा जवान शहीद हुए थे, वहीं 2017 में 80 और 2018 में 91 जवानों की मृत्यु हुई।

जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई, तो उसने नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से जारी संघर्षविराम से अलग रुख अख्तियार किया। इसका उद्देश्य घुसपैठ का मुकाबला करना था। इससे आतंकी घटनाओं में कमी नहीं आई और न ही असली समस्या दूर हुई। यही कारण है कि एक बार फिर कश्मीरी युवा बंदूक उठाते नजर आ रहे हैं। यह बात सन 1990 के दशक की याद दिलाती है जब कश्मीरी युवाओं का हथियार उठाना आम होता था। विदेशी आतंकियों को लेकर चिंतित होने के बजाय हमें स्थानीय युवाओं में बढ़ती कट्टरता की चिंता अवश्य करनी चाहिए। पुलवामा में कार बम से हमला करने वाला 20 वर्षीय युवा भी ऐसे ही लोगों में से एक था। देश के युवाओं में आतंक के प्रति झुकाव दूसरा बिंदु है।

तीसरी चिंता है इस्लामिकों की रणनीतियों में आ रहा बदलाव। इन नीतियों को आसानी से बदला जा सकता है। दुनिया भर के उपद्रवियों और आतंकियों के कार्य व्यवहार का अनुकरण करके ऐसा किया जा सकता है। पुलवामा हमले के बारे में खुफिया जानकारी थी कि यह सीरिया के कार बम हमलों की शैली में किया जा सकता है। कश्मीर में ऐसे आत्मघाती हमले बहुत कम हुए हैं और इस आकार का कार बम हमला तो कभी नहीं। हालांकि जैश-ए-मोहम्मद ने सन 2000 के दशक में श्रीनगर के बादामी बाग कैंट में ऐसा ही एक हमला किया था। मौत के बाद जारी हमलावर का वीडियो भी काफी हद तक पश्चिम एशिया के इतिहास की याद दिलाता है जहां वह तालिबान को अपनी प्रेरणा बताता है और अमेरिका की हार की बात करता है। आईईडी और कार बम तथा आत्मघाती हमलावरों से भरी घाटी, उससे बिल्कुल अलग है जिसका सामना सुरक्षा बलों को अब तक करना पड़ता आया है।

चौथी बात आतंकियों की रणनीति भी बदल रही है। जिहादियों ने अब खासतौर पर सेना या पुलिस बलों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। आम नागरिकों की सहानुभूति अब उनको सन 1990 के दशक की तुलना में अधिक मिल रही है। धार्मिक कट्टïरपंथ में लगातार इजाफा हो रहा है और स्थानीय स्तर पर धार्मिक परंपराओं का स्थान अब कहीं अधिक कट्टïर और शून्यवादी विचार ले रहे हैं जो पश्चिम एशिया से आयात किए गए हैं। यानी सेना और अद्र्घसैनिक बलों के सामने आगे काफी मुश्किल वक्त आने वाला है। सैन्य बल पहले ही यह शिकायत करते रहे हैं कि आम नागरिकों की भीड़ उन इलाकों के बचाव के लिए घेरेबंदी करती है जहां कथित तौर पर आतंकियों के छिपे होने की आशंका होती है।

आतंकियों से लड़ाई एक बात है, उपद्रवियों से निपटना कहीं अधिक मुश्किल हो सकता है और एक बड़ी आबादी से निपटना बेहद मुश्किल भरा हो सकता है। पांचवीं बात, पड़ोस में जो कुछ घट रहा है, उसे भी एकदम आसानी से महसूस किया जा सकता है। अमेरिका ने अफगानिस्तान से हड़बड़ी में बाहर निकलने का ऐलान किया जो खतरनाक रूप से मूर्खतापूर्ण बात है। इससे दुनिया भर के जिहादियों को वैसी प्रेरणा मिलेगी जैसी मुजाहिदीन के हाथों तत्कालीन सोवियत संघ की हार से मिली थी। इस संभावित विदाई की बात ने पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान का उत्साह बढ़ा दिया। चीन की ओर से मिल रहा समर्थन तो है ही। पिछली बार पाकिस्तान समर्थक जिहादियों को तीन दशक पहले छूट मिली थी जब एक महाशक्ति का अंत हुआ था। हमें इस आशंका से डर लगना चाहिए कि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर दबाव कम होने का क्या असर हो सकता है?

छठी बात, कश्मीर पर तो पाकिस्तान में भी उतनी अधिक बातचीत नहीं होती है। फिलहाल पाकिस्तान अपनी क्रिकेट लीग और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त है। जानकारी के मुताबिक उनकी यात्रा के लिए 3,500 कबूतर खरीदे जा रहे हैं। पाकिस्तान में कश्मीर आज उस कदर सुर्खियों में नहीं है जैसा कि वह कुछ दशक पहले हुआ करता था। परंतु इसके बावजूद वहां घरेलू राजनीति में कश्मीर के मुद्दे के इस्तेमाल में आई कमी का कोई लाभ उठाने का खास प्रयास नहीं किया गया गया है। 

सातवां, भारत में कश्मीर एक जीवंत राजनीतिक मसला है। वह भी पहले से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बनकर उभरा है। सन 1990 के दशक में भारत को उपद्रवियों से निपटना था और वह यह काम बिना राष्ट्र की मर्दवादी छवि की चिंता किए कर सकता था। अब कश्मीर का इस्तेमाल एक रूपक के रूप में किया जाता है। हमारा सामना अब सन 1990 के दशक की अशांति जैसी परिस्थितियों से नहीं है। तमाम तरह के कुप्रबंधन, बढ़ते कट्टरपंथ और राजनीतिकरण के कारण खतरा आज कई गुना बढ़ चुका है।

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