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पीएफसी-आरईसी सौदे से दोनों को हो सकती है मुसीबत

श्रेया जय और अरूप रायचौधरी / नई दिल्ली February 17, 2019

विनिवेश लक्ष्य हासिल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से चलाए जा रहे अभियान के कारण बिजली क्षेत्र का वित्तपोषण करने वाली दो प्रमुख कंपनियां संकट में आ सकती हैं। इस क्षेत्र के जानकारों को डर है कि इसकी वजह से दोनों कंपनियों को संकट हो सकता है। ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) को इससे कर्ज की रियायती दर गंवानी पड़ सकती है, जो वह प्रमुख योजनाओं के वित्तपोषण में इस्तेमाल करती है, वहीं इनके विलय से पावर फाइनैंस कॉर्पोरेशन (पीएफसी) के वित्तपोषण पर दबाव पड़ सकता है। 

धन के चक्रानुक्रम को लेकर भी डर है। केंद्र सरकार प्रस्तावित विलय वाली इकाई में इस सौदे से मिले धन के सिर्फ एक हिस्से को लगाएगी। प्रस्तावित विलय के बाद नई कंपनी में इसकी हिस्सेदारी घटकर करीब 45 प्रतिशत होने के बाद वह निजी कंपनी हो जाएगी। विलय के बाद बनी कंपनी में अगर सरकार 51 प्रतिशत तक हिस्सेदारी लेती है तो इसके लिए मोटे तौर पर करीब 7,000 करोड़ रुपये निवेश करने होंगे। 

एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, 'विलय के बाद बनी नई कंपनी में केंद्र अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के बजाय, पीएफसी विलय पूरा होने तक आरईसी में ज्यादा हिस्सेदारी का अधिग्रहण करेगी। इससे शेयर-स्वैप रेशियो पर असर पड़ेगा।' अधिकारी ने कहा कि पीएफसी उस लाभांश का इस्तेमाल कर सकती है, जो आरईसी के शेयरों के बाजार से पुनर्खरीद करने पर अधिग्रहण के बाद भुगतान करेगी। पीएफसी केंद्र सरकार की आरईसी में पूरी 52.62 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदेगी।

विलय प्रक्रिया में एक साल से ज्यादा लग सकता है। पीएफसी ने हाल के निवेशक प्रस्तुति में भी संकेत दिाया था कि उसका ध्यान अधिग्रहण सौदे को पूरा करने पर है, उसके बाद विलय की अवधि के बारे में विचार किया जाएगा। एक अधिकारी ने कहा कि आरईसी को  वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा है और विलय के बाद यह समस्या और बढ़ जाएगी।  अधिकारी ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा, 'इस फैसले के बाद कुछ रेटिंग एजेंसियां आरईसी को नकारात्मक श्रेणी में डाल सकती हैं। इससे कंपनी की उधारी योजना पर ऐसे समय में बुरा असर पड़ेगा, जब वह विभिन्न सरकारी बिजली योजनाओं के लिए अंतिम स्तर पर वित्तपोषण कर रही है। आरईसी राज्यों को खासतौर पर इन योजनाओं के लिए उधारी दे रही है। जल्द ही यह सब काम अधर में लटक जाएगा।' 

आरईसी गांवों व मकानों (शहरी और ग्रामीण दोनों) के विद्युतीकरण की डीडीयूजीजेवाई और सौभाग्य योजनाएं चला रही है। केंद्र सरकार इस परियोजना में 60 प्रतिशत धन राज्यों को उपलब्ध कराती है, जिससे परिवारों को मुफ्त बिजली कनेक्शन दिया जा सके। शेष खर्च राज्य सरकार वहन करती है। ज्यादातर राज्यों में सरकारी बिजली कंपनियां घाटे में चल रही हैं, ऐसे में वे इस काम के लिए आरईसी से कर्ज लेती हैं। 

मूडीज इन्वेस्टर सर्विसेज ने दिसंबर में कहा था कि पीएफसी द्वारा आरईसी में सरकार की हिस्सेदारी खरीदना पीएफसी के लिए नकारात्मक होगा, क्योंकि इससे व्यावहारिक रूप से एकीकृत पूंजी अनुपात कमजोर होगा। इसने कहा था, 'इस सौदे से कुछ परिचालन संबंधी एकरूपता आएगी, क्योंकि पीएफसी और आरईसी दोनों का कारोबार एक है। मूडीज का मानना है कि कम पूंजी स्तर से नकारात्मक असर पड़ सकता है।' 

इसके अलावा पीएफसी को बिजली उत्पादन क्षेत्र से गैर निष्पादित संपत्तियों का संकट झेलना पड़ रहा है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों ने अधिग्रहण के बाद पीएफसी के पूंजीकरण को लेकर चिंता जताई है। एसऐंडपी ग्लोबल ने अपनी रिपोर्ट में पीएफसी को क्रेडिट वाच में डालते हुए कहा, 'हम पीएफसी की अपनी रेटिंग नीचे कर सकते हैं, अगर पूंजीकरण कमजोर रहता है। अगर पीएफसी का पूंजीकरण तेजी से गिरता है तो जोखिम समायोजन पूंजी (आरएसी) घटकर 7 प्रतिशत से नीचे आ जाएगी और तब हम रेटिंग घटा सकते हैं।'

बहरहाल वित्त मंत्रालय ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि पीएफसी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'एनबीएफसी के लिए टियर-1 पूंजी पर्याप्तता 7 प्रतिशत होने की जरूरत है और बुनियादी ढांचा वित्त कंपनी के लिए पूंजी पर्याप्तता 10 प्रतिशत जरूरी है। अधिग्रहण के बाद पीएफसी दोनों शर्तों को पूरा कर रही है और इसकी आरएसी 10 प्रतिशत बनी रहेगी।' 

Keyword: Divestment, Disinvestment, REC, PFC, Central Government, Share Swap, Payment, acquisition, Share, Merger,
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