बिजनेस स्टैंडर्ड - पाकिस्तान ने खुद पर ही चला दी बंदूक
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पाकिस्तान ने खुद पर ही चला दी बंदूक

शेखर गुप्ता /  February 15, 2019

दक्षिण एशियाई मामलों के अमेरिकी विद्वान स्टीफन पी कोहन की पाकिस्तान की सामरिक सोच को लेकर एक अनूठी व्याख्या है। कोहन के मुताबिक, पाकिस्तान अपनी कनपटी पर बंदूक रखकर दुनिया के साथ बातचीत करता है, मानो कहता हो कि 'जो मुझे चाहिए वह दे दो नहीं तो मैं अपना भेजा उड़ा लूंगा'। फिर आपको उसकी फैलाई गड़बड़ी से जूझना पड़ता है। क्या पाकिस्तान ने पुलवामा में उस बंदूक का ट्रिगर दबा दिया है? 

पहली बात, इस ख्याल को अपने दिमाग से निकाल दीजिए कि यह हमला घरेलू आतंक की उपज है। यह फिदायीन आतंकी एक मतांध भारतीय कश्मीरी था। इन वजहों से यह हमला पूरी तरह से भारतीयों द्वारा सोचा-समझा और अंजाम दिया हुआ नहीं हो सकता है: हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली है जो पूरी तरह पाकिस्तान में स्थित और आईएसआई के निर्देशों से संचालित होने वाला संगठन है। भले ही कट्टरपंथ का असर और इसकी प्रेरणा स्थानीय हो सकती है लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर विस्फोटक अनाड़ी स्थानीय समूहों के पास उपलब्ध रहा हो। उनके लिए विस्फोट ट्रिगर और टाइमर की कार्यप्रणाली को भी समझ पाना मुश्किल है। हमला अंजाम देने के पहले रिकॉर्ड वीडियो को देखिए। हमलावर की भाषा कश्मीरी अवाम की शिकायतों या बदले वाली न होकर बाकी हिस्सों के मुसलमानों को उकसाने वाली है। बाबरी मस्जिद और गुजरात का जिक्र किया गया है और 'गोमूत्र पीने वालों' के खिलाफ बगावत करने की अपील 'अपने सभी मुस्लिमों' से की गई है। यह लश्कर-ए-तैयबा की सोच से कहीं अधिक जैश की राय है, स्थानीय कश्मीरियों की तो कतई नहीं।

यह हमला जैश के पिछले कारनामों की शैली से पूरी तरह मेल खाता है। वर्ष 2001 में श्रीनगर में विधानसभा पर आत्मघाती हमला, उसी साल संसद भवन पर आतंकी हमला, पठानकोट और गुरदासपुर में हमला, सभी का मकसद आतंक को किसी तरह कश्मीर के बाहर ले जाना था। लश्कर ने भी नवंबर 2008 के मुंबई हमले में भी यही किया था लेकिन उसकी ज्यादा ताकत कश्मीर में लड़ाई जारी रखने में ही लग रही है। वैश्विक दबाव में लश्कर के सैन्य हुक्मरान उसे पाकिस्तानी राजनीति में लाना चाह रहे हैं। वहीं जैश आकार में छोटा होने के बावजूद अधिक खतरनाक, साधन-संपन्न और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का चहेता भी है। जैश 'असरदार' हमलों के चयन में भी अधिक सजग रहा है।

हम आईसी-814 विमान कांड से ही जैश की साधन-संपन्नता को जानते हैं। उसने काठमांडू से उड़ान भरने वाले इस भारतीय विमान को अगवा किया और सुरक्षित पनाहगाह कंधार तक ले गया। उसने यात्रियों की सुरक्षित रिहाई के एवज में भारतीय जेलों में बंद बड़े आतंकी सरगनाओं की रिहाई की मांग रखी। कई अनुसंधानों में यह बात पुख्ता हो चुकी है कि अपहरणकर्ताओं को काठमांडू तक पहुंचाने, कंधार में तालिबान के जरिये बातचीत करने और जैश के सरगना मसूद अजहर की सुरक्षित रिहाई तक की समूची प्रक्रिया की निगरानी आईएसआई ने ही की थी। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और आईएसआई के लिए मसूद अजहर एवं जैश की अहमियत लश्कर और हाफिज सईद से कहीं अधिक है। जैश उसकी ताकत बढ़ाने वाला मुख्य संगठन है। चीन भी इस बात को मानता है इसीलिए वह शर्मनाक ढंग से उसका बचाव भी कर रहा है।  

पुलवामा हमले के आत्मघाती युवक का स्थानीय होना कोई अचरज वाली बात नहीं है। अब तक के अपने सभी हमलों में जैश ने भारतीय कश्मीरियों की अहम भागीदारी रखी है। संसद हमले में शामिल रहा अफजल गुरु भारतीय ही था। ऐसे में स्थानीय संगठन की संलिप्तता और हमले की वजह खोजने में वक्त जाया होने से बचाने के लिए हमारे पास पुख्ता सबूत हैं। पाकिस्तान भी उन्हें नकार नहीं सकेगा।  

फिर उस सवाल पर लौटते हैं कि क्या पाकिस्तान ने वाकई इस बार अपनी कनपटी पर रखी बंदूक का ट्रिगर दबा दिया है? इससे पहले हुए जैश और लश्कर के सभी हमले घोषित जवाबी कार्रवाई के बगैर ही निकल गए हैं, हालांकि कुछ गोपनीय सर्जिकल स्ट्राइक जरूर हुई। वाजपेयी और मनमोहन सिंह के दौरान भारत बाध्यकारी कूटनीति, पाकिस्तान पर वैश्विक दबाव बढ़ाने और मूलत: शांतिवादी रवैया रखने वाली सामरिक मनोदशा के चलते अपने गुस्से भरे दौर से निकलने में सफल रहा था। भारत की सोच यही थी कि किसी भी उकसावे की कार्रवाई का हद से ज्यादा जवाब नहीं देना है। लेकिन मोदी सरकार में ऐसा धीरज नहीं है। यह सरकार मनमोहन और वाजपेयी समेत पिछली तमाम सरकारों को उनकी 'कायरता' के लिए जिम्मेदार मानती रही है। उड़ी में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद मचे शोर और उससे हासिल राजनीतिक पूंजी को देखें तो इसकी कोई उम्मीद नहीं है कि वह खुद पर लंबे समय तक काबू रख पाने में सफल होगी। पाकिस्तान को जवाब मिलने जा रहा है। यह कोई नहीं जानता है कि ऐसा कब, कहां और कैसे होगा लेकिन इसमें लंबा वक्त भी नहीं लगेगा। 

जवाबी कार्रवाई जल्द ही हो सकती है। यह सबकी नजरों में आने वाला, गहरे शोर वाला और विजयी बदले के दावों में लिपटा होगा। भारत में चुनाव अभियान शुरू होने में अभी कुछ दिन बाकी हैं। ऐसे में मोदी नहीं चाहेंगे कि दोबारा सरकार बनाने के लिए जनता के बीच जाने के पहले उन पर पुलवामा का दाग लगा रहे।

ऐसे में पाकिस्तान को यह फैसला लेना होगा कि वह मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाए या इसका जवाबी हमला शुरू कर जवाब दे। इसका सैन्य नतीजा कुछ भी हो लेकिन इससे इमरान खान का वर्तमान कार्यकाल खत्म हो जाएगा। हमें इतिहास बताता है कि कोई भी पाकिस्तानी नेता भारत के साथ छोटा-बड़ा युद्ध करके कुर्सी पर नहीं बना रह सकता है। इसका उदाहरण अयूब खान (1965), याह्या खान (1971) और नवाज शरीफ हैं। पाकिस्तान की बुनियादी हकीकत को लेकर ज्यादा तर्क नहीं हो सकते। इमरान को आखिरकार सेना/आईएसआई की जिद की  कीमत चुकानी होगी, जिस तरह करगिल के लिए नवाज को चुकानी पड़ी थी। उन्हें बलि का बकरा बनने से बचने के लिए बहुत चतुराई और किस्मत की जरूरत होगी। 

पाकिस्तान में ऐसे मसलों पर अंतिम फैसला निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं होता है और इमरान तो पिछले कुछ वर्षों के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं। फौरन जवाबी हमला करने का फैसला उनकी सेना करेगी। क्या वह उन्हें ऐसा न करने की सलाह भी दे सकते हैं, इसे लेकर हम सुनिश्चित नहीं हो सकते। सेना ही फैसला करेगी कि उसे जंग छेडऩी है या नहीं। इमरान तो किसी भी तरह नाकाम ही होंगे। 

अब दो अन्य अहम फर्क भी हैं। पहला, अब दुनिया वर्ष 2008 या 2001-02 से बिल्कुल अलग है। तब शीर्ष अमेरिकी और यूरोपीय देशों के प्रमुख फोन करते थे। रूस और चीन जैसे देश हालात शांत करने पर जोर देते थे। वे हमारे साथ खड़े होकर और पाकिस्तान की आलोचना कर भारतीय जनता के रोष को शांत करते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह परंपरा उसी दिन खत्म हो गई थी, जब डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने और उन्होंने अपने सैनिकों को वापस बुलाकर तथा शेष विश्व को अपने हाल पर छोड़ दिया। उप-महाद्वीप में कोई समस्या खड़ी होने पर ट्रंप संयम बरतने का ट्वीट भी फौरन नहीं करेंगे। इससे उपमहाद्वीप को विश्व से मिलने वाली यह राहत खत्म नहीं तो कम जरूर हो गई है कि 'आओ और हमें रोको नहीं तो हम एक-दूसरे पर परमाणु हमला कर देंगे'। दोनों देशों के जिम्मेदार परमाणु शक्तियां होने के दावे के बाद इस क्षेत्र के दुनिया को ब्लैकमेल करने का संदेह बढ़ रहा है। निस्संदेह, यह बात भारत से ज्यादा पाकिस्तान पर लागू होती है। क्योंकि इस उप-महाद्वीप में परमाणु हथियार कमजोर शक्ति या संभावित पराजित देश के तरजीही हथियार हैं। 1990 में वीपी सिंह से लेकर अब तक पाकिस्तान ने परमाणु धमकी का इस्तेमाल पूरी तरह अपने फायदे के लिए किया है। उसने अपने उकसावे को उस सीमा तक ही रखा है कि भारत की तरफ से बड़ा जवाबी हमला न हो। 

परमाणु हथियारों का जुनून बताता है कि पाकिस्तानी शायद ही उस स्थिति की कभी समीक्षा करेंगे। ऐसा नहीं करने पर उन्हें विनाशकारी अचंभा देखने को मिलेगा। यह भारतीय सरकार परमाणु हथियारों को केवल एक पक्ष के संयम के रूप में नहीं देखती है। अगर आपने दुस्साहस किया और वह भी चुनाव होने से कुछ हफ्ते पहले तो हो सकता है कि आपने अपनी कनपटी पर रखी बंदूक का ट्रिगर दबा दिया हो। 
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