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सार्वजनिक उपक्रम: संसाधनों की वृद्धि में धीमेपन के आसार

ए के भट्टाचार्य /  February 14, 2019

नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की वित्तीय एवं निवेश जरूरतों का किस तरह ध्यान रखा है? गत पांच वर्षों के केंद्रीय बजट एक दिलचस्प कहानी बताते हैं। अब तक का लोकप्रिय आख्यान यही है कि मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के परिव्यय में कटौती की है और इस दौरान पीएसयू का कुल निवेश मंद गति से बढ़ा है। लेकिन मोदी सरकार के पांच वर्षों पर नजर डालें तो कहानी अलग नजर आती है। 

पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार के आखिरी वित्त वर्ष 2013-14 में पीएसयू के लिए कुल पूंजीगत व्यय करीब 3.32 लाख करोड़ रुपये रहा था। यह उस साल के कुल सरकारी व्यय का करीब 21 फीसदी और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 फीसदी से थोड़ा ही कम था। इसके उलट मोदी सरकार के अंतिम वित्त वर्ष 2018-19 में पीएसयू का कुल पूंजीगत व्यय 163 फीसदी बढ़कर 8.74 लाख करोड़ रुपये जा पहुंचा है और यह इस साल के कुल सरकारी व्यय का करीब 36 फीसदी है। जीडीपी में हिस्सेदारी के तौर पर भी पीएसयू परिव्यय 4.64 फीसदी बढ़ा है। इस परिव्यय के दायरे में आने वाले पीएसयू की संख्या में कोई खास गिरावट नहीं आई है। वर्ष 2013-14 में यह संख्या 146 थी और 2018-19 में मामूली रूप से गिरकर 139 रही।

इन पांच वर्षों में पीएसयू के लिए उपलब्ध कराए गए कुल संसाधनों के मामले में भी यही रुझान दिखा है। वर्ष 2013-14 के दौरान 2.58 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर यह 2018-19 में 6.44 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस तरह पीएसयू का संसाधन केंद्र सरकार के कुल बजट व्यय के छठे हिस्से से बढ़ते हुए 2018-19 में चौथाई हिस्से से थोड़ा अधिक रहा है। इस दौरान जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी भी 2.29 फीसदी से बढ़कर 3.42 फीसदी हो चुकी है।

सरकार का पीएसयू को दी जाने वाली बजट सहायता भी इन पांच वर्षों में खूब बढ़ी है। वर्ष 2013-14 में जो बजट सहायता 69 हजार करोड़ रुपये थी, वह बढ़कर 2018-19 में 2.29 लाख करोड़ रुपये हो गई। कुल बजट व्यय में इसकी हिस्सेदारी 4.43 फीसदी से दोगुनी होकर 9.34 फीसदी हो गई। इसी तरह जीडीपी में बजट सहायता भी 0.62 फीसदी से बढ़कर 1.22 फीसदी जा पहुंची। पीएसयू को दी जाने वाली बजट सहायता में सरकार का इक्विटी अंशदान और ऋण भी शामिल होता है। इक्विटी अंशदान के नजरिये से भी देखें तो पीएसयू के लिए सरकारी आवंटन 64,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.12 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। इस अवधि में पीएसयू को सरकार की तरफ से दिया गया कर्ज भी 5,497 करोड़ रुपये से बढ़ते हुए 17,100 करोड़ रुपये हो चुका है।

जहां सरकार ने अधिक निवेश एवं बजट सहायता से पीएसयू के लिए अपना आवंटन बढ़ाना जारी रखा है, वहीं अपने दम पर संसाधन जुटाने की पीएसयू की आंतरिक क्षमता प्रभावित हुई है। यह प्रवृत्ति परेशान करनी वाली है और पीएसयू के लिए इसके प्रतिकूल दीर्घकालिक निहितार्थ हो सकते हैं। पीएसयू अपने लाभ और बचत से ही आंतरिक संसाधन जुटाते हैं लेकिन इन पांच वर्षों में यह काफी धीमी दर से ही बढ़ा है। वर्ष 2013-14 में पीएसयू ने 1.72 लाख करोड़ रुपये के आंतरिक संसाधन जुटाए थे और 2018-19 में यह 1.98 लाख करोड़ रुपये तक ही पहुंच पाया। इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार के कुल व्यय के प्रतिशत के तौर पर पीएसयू द्वारा आंतरिक स्रोतों से जुटाया गया संसाधन 11 फीसदी से घटकर 8 फीसदी रह गया। जीडीपी के प्रतिशत हिस्से के भी तौर पर पीएसयू का आंतरिक संसाधन 1.53 फीसदी से गिरकर 1.05 फीसदी पर आ गया। 

पीएसयू के आंतरिक संसाधनों के सृजन में सुस्ती उनके समग्र वित्तीय प्रदर्शन में गिरावट की ओर संकेत करती है। हालांकि सरकार को इस अवधि में पीएसयू से मिलने वाले लाभांश में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई है। पीएसयू की दीर्घकालिक वित्तीय सेहत को देखते हुए यह रुझान भी परेशान करता है।

पीएसयू (सरकारी बैंकों को छोड़कर) से मिलने वाला लाभांश 2013-14 के 25,921 करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 45,124 करोड़ रुपये हो गया। अंतरिम बजट में पीएसयू की वित्तीय स्थिति के बारे में जताए गए अनुमान भी चिंता का बड़ा मुद्दा हैं। वर्ष 2019-20 में पीएसयू के लिए कुल पूंजीगत परिव्यय 14 फीसदी की गिरावट के साथ 7.48 लाख करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है जबकि 2018-19 में यह 8.74 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इसी तरह पीएसयू को बजट सहायता में 43 फीसदी की भारी गिरावट आने की आशंका है। वर्ष 2018-19 के 2.29 लाख करोड़ रुपये के बजाय अगले वित्त वर्ष में इसके 1.3 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। ऐसे में पीएसयू में सरकारी अंशदान के भी 47 फीसदी की गिरावट के साथ 1.13 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया है।

लेकिन पीएसयू के आंतरिक संसाधन सृजन के 11 फीसदी बढ़कर 2.2 लाख करोड़ रुपये रहने की संभावना जताई गई है। सरकार को उम्मीद है कि पीएसयू से उसे मिलने वाला लाभांश भी बढ़कर 53,160 करोड़ रुपये हो जाएगा जो 2018-19 की तुलना में 18 फीसदी अधिक होगा। 

कुल मिलाकर, मोदी सरकार के पांच वर्षों में सार्वजनिक उपक्रमों के परिव्यय एवं उन्हें दी जाने वाली बजट सहायता में स्वस्थ वृद्धि देखने को मिली है। लेकिन अगले साल के लिए पीएसयू का अनुमान सरकार के अपने संसाधनों में भी कमी आने की ओर इशारा करता है। इस तरह, पीएसयू के कुल पूंजी व्यय में चार साल में पहली बार गिरावट देखी गई है। सरकार ने पीएसयू के इक्विटी अंशदान में कमी की है फिर भी वह उससे अधिक लाभांश मिलने की उम्मीद कर रही है। अगर जुलाई में पेश होने वाले पूर्ण बजट में ये आंकड़े दुरुस्त नहीं किए जाते हैं तो यह स्थिति आने वाले समय में पीएसयू के लिए तस्वीर अच्छी नहीं रहने का संकेत दे रही है। 

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