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केंद्र सरकार की सीमित राजकोषीय गुंजाइश

रथिन रॉय /  February 14, 2019

चुनावी वर्ष ऐसा समय होना चाहिए जब हम राजकोषीय नीति के मध्यम अवधि के ढांचे पर गंभीरता से दृष्टिï डाल सकें। परंतु चुनावी वर्ष में अंतरिम बजट भी शामिल होता है। पारिभाषिक तौर पर इसकी प्रकृति ऐसी होती है कि बहुत अधिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं होती लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा होता नहीं हैं और यह मध्यम अवधि के राजकोषीय मुद्दों पर से ध्यान हटाने में कामयाब है।

केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो फिलहाल आर्थिक हितों को लेकर मध्यम अवधि के चार रुझान प्रमुख तौर पर नजर आ रहे हैं: 

केंद्र सरकार का सीमित होता आकार:

जीडीपी के प्रतिशत के रूप में केंद्र सरकार के व्यय में निरंतर कमी आ रही है। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण व्यापक तौर पर इसी वजह से है। वर्ष 2014-15 से अब तक राजकोषीय घाटे में 76 फीसदी की कमी आई है जो काफी हद तक व्यय में कमी की वजह से आई है। चूंकि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण व्यय में कमी करके हासिल किया गया है इसलिए केंद्र राजकोषीय तंगी का भी शिकार है। 

दो तिहाई उधारी आवर्ती राजस्व व्यय के लिए है:

मौजूदा सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखकर अच्छा किया है। बहरहाल, तथ्य यह है कि कुल व्यय में कमी आने के बावजूद केंद्र सरकार अपनी दोतिहाई उधारी का इस्तेमाल आवर्ती व्यय के लिए कर रही है। इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र सरकार पूंजीगत व्यय केसीधे वित्त पोषण के मामले में बहुत अहमियत नहीं रखती। 

केंद्र सरकार का आधा से अधिक व्यय प्रतिबद्घता वाला व्यय है:

जैसा कि हमने उपरोक्त तस्वीर में देखा, इस व्यय का अधिकांश हिस्सा राजस्व व्यय है। यह कुल सरकारी व्यय में 60 से 65 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। 

कर जीडीपी अनुपात अभी भी कम बना हुआ है जबकि गैर कर राजस्व एवं विनिवेश प्राप्तियां अस्थिर बनी हुई हैं:

ये ढांचागत कमजोरियां, राजस्व के मोर्चे पर नुकसान पहुंचाती हैं और राजकोष की ढांचागत समस्या में इजाफा करती हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के वित्त की ढांचागत स्थिति कमजोर बनी हुई है। सार्वजनिक व्यय में कमी आ रही है, 65 फीसदी उधारी आवर्ती व्यय की है, दोतिहाई व्यय की प्रकृति गैर विवेकाधीन है। ऐसे में राजस्व प्राप्ति में भी ठहराव और अस्थिरता देखने को मिल रही है। सरकार की नीतिगत स्वायत्तता और परिवर्तन की संभावना के समक्ष ढांचागत बाधाएं मौजूद हैं। दुख की बात है कि अर्थशास्त्रियों और सरकारी अधिकारियों ने राजकोषीय नीति को लेकर होने वाली समस्त परिचर्चा को इवेंट मैनेजमेंट की कवायद में बदल दिया है। 

गंभीर ढांचागत समस्याओं और चुनौतियों से इस प्रकार नहीं निपटा जा सकता है। राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर इनके कम से कम दो प्रकार के प्रभाव देखने को मिलते हैं, जिनका हमें ध्यान रखना होता है। मध्य अवधि के दौरान राजकोषीय ढांचे को लेकर परिचालन का अभाव। इसका अर्थ यह हुआ कि इन ढांचागत चुनौतियों को हल करना तो दूर इनको समझने तक की कोई क्षमता नहीं है। ऐसे में राजकोषीय निर्णयों की प्रकृति कुछ ऐसी हो जाती है कि राजस्व और व्यय के घटकों में जबरदस्त अस्थिरता आ जाती है। कर प्राप्तियों को लेकर सही अनुमान भी नहीं लग पा रहे हैं। ऐसे में इस वर्ष जीएसटी संग्रह में भारी कमी देखने को मिली और प्रत्यक्ष कर प्राप्तियां अनुमान से परे निकल गईं। विनिवेश और गैर कर राजस्व की प्रकृति अस्थिर और तदर्थ है। बड़ी योजनाओं के मद में किया जाने वाला आवंटन साल दर साल आधार पर काफी उतारचढ़ाव भरा है। बीते पांच वर्ष के आंकड़ों से तो यही अनुमान लगता है। 

ऐसे में बहुत साधारण सी बात है कि केंद्र सरकार की राजकोषीय गुंजाइश (फिस्कल स्पेस) के क्षेत्र में ऐसे गंभीर ढांचागत दबाव के कारण केंद्र सरकार को राज्यों की राजकोषीय गुंजाइश कम करने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके दो उदाहरण हमारे सामने हैं। पहला, चौदहवें वित्त आयोग ने आदेश दिया कि करों के बांटे जाने योग्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी सकल कर राजस्व का तकरीबन 42 फीसदी होगी। परंतु एक बात जो स्पष्ट देखी जा सकती है वह यह है कि इस लक्ष्य को कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सका। वर्ष 2015-16 के बाद से लगातार यह हिस्सेदारी जीटीआर के एक तिहाई के आसपास बनी रही है। दूसरी बात, वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार की योजनाओं और केंद्र प्रायोजित योजनाओं में कुल मिलाकर केंद्रीय व्यय का 9 फीसदी खर्च किया गया। वर्ष 2019-20 के बजट अनुमान में केंद्र सरकार की योजनाओं की हिस्सेदारी बढ़कर 12 फीसदी तक पहुंच गई जबकि केंद्र समर्थित योजनाओं के मामले में यह 9 फीसदी पर ही स्थिर है। ऐसे में कहा जा सकता है कि संघीय सुसंबद्घता तो दो मोर्चों पर क्षति पहुंची है। कर में हिस्सेदारी के रूप में राज्यों की प्राप्ति कम हुई है और केंद्र सरकार द्वारा समर्थित योजनाओं में भी उनकी हिस्सेदारी कम हुई है। 

भारतीय राजनीति में राज्यों पर दबाव बनाने की यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है। राष्ट्रीय दल केंद्र पर नियंत्रण की कामना पाल सकते हैं लेकिन राज्यों के वित्त पर नियंत्रण की नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि देश के अधिकांश राज्यों में क्षेत्रीय दलों की अच्छी खासी मौजूदगी है। परंतु इसके साथ ही एक दिक्कत यह है कि केंद्र सरकार की राजकोषीय स्थिति काफी कमजोर है। जब तक ढांचागत दिक्कतों को हल करने का प्रयास नहीं किया जाता है तब तक केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा राजकोषीय नीति में मामूली रद्दोबदल ही कर सकती है। परंतु राष्ट्रीय राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे तो कर लेते हैं लेकिन सत्ता में आते ही उनको मामूली से मामूली अतिरिक्त संसाधन के लिए भी जूझना पड़ जाता है। इससे एक ओर जहां ढांचागत व्यय में अस्थिरता आती है वहीं राज्यों के साथ राजकोषीय मोर्चे पर एक प्रतिस्पर्धा की भी शुरुआत होती है। 

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