बिजनेस स्टैंडर्ड - आरकॉम पर भारी पड़े गलत फैसले
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आरकॉम पर भारी पड़े गलत फैसले

सुरजीत दास गुप्ता /  February 13, 2019

जून, 2005 में अनिल अंबानी से खफा उनके भाई मुकेश ने उन्हें परिवार के समझौते के तहत दूरसंचार कारोबार सौंपने पर सहमति जताई थी। उस समय बहुत से जानकारों ने कहा था कि अनिल को कमाई के लिहाज से कमजोर कारोबार मिला, जबकि उनके बड़े भाई ने समूह की कामधेनु (तेल एवं गैस कंपनी) अपने पास रखी। 

निस्संदेह अनिल को जो वायरलेस दूरसंचार कारोबार मिला, उसकी बाजार हिस्सेदारी दिसंबर 2006 में 20 फीसदी से अधिक थी। लेकिन उसके ज्यादातर ग्राहक सीडीएमए थे। सीडीएमए ऐसी मोबाइल तकनीक थी, जो तेजी से जीएसएम से पिछड़ रही थी। सीडीएमए की बाजार हिस्सेदारी महज 3 फीसदी थी। उस तकनीक का आधार डेटा था, लेकिन तब तक ग्राहकों के बीच डेटा का इस्तेमाल लोकप्रिय नहीं बना था। इसके अलावा उनके भाई की महत्त्वाकांक्षी 'मॉनसून हंगामा' योजना के तहत 501 रुपये में वॉयस और डेटा के साथ मोबाइल डिवाइस दिया जा रहा था। इस योजना ने कंपनी को घाटा दिया, जिससे कंपनी (तब रिलायंस इन्फोकॉम) को 450 करोड़ रुपये की फंसी राशि को बट्टे खाते में डालना पड़ा और कथित रूप से 10 फीसदी ग्राहकों के कनेक्शन काटने पड़े। लेकिन अनिल अंबानी ने अपने आलोचकों को गलत साबित कर दिया। उन्होंने कुछ त्वरित कदम उठाकर कंपनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा गया। 

उन्होंने तुरंत जीएसएम पर दांव लगाने का फैसला किया और महज 12 महीनों में ही देश भर में सेवाएं शुरू कर दीं। उन्होंने प्रतिस्पर्धियों से कम कीमतों की रणनीति (60 फीसदी कम) के जरिये ग्राहक जोड़े और 10 करोड़ ग्राहकों का एक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया। वह 3जी में अवसरों को देखते हुए इसमें भी जोर-शोर से उतरे। रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) ने अपनी प्रतिस्पर्धियों को मात देने के लिए 13 सर्कल में 3जी स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए 8,500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। इन सर्कलों में दिल्ली और मुंबई सर्कल भी शामिल थे। ऐसा लगता है कि उनका यह दांव काम कर रहा था। परिवार के समझौते को स्वीकार करने के महज पांच साल बाद उन्होंने आरकॉम को देश की दूसरी सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी बना दिया। इसके ग्राहकों की संख्या पांच गुना बढ़कर दिसंबर 2010 में 12.5 करोड़ पर पहुंच गई। लेकिन उनके इस कारोबार को संभालने के 14 साल बाद आरकॉम पिछले दिनों राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) जाने को मजबूर हो गई। आरकॉम ने 2017 में मोबाइल परिचालन बंद करने और 43,000 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाने के लिए अपनी दूरसंचार संपत्तियां बेचने का फैसला किया था। उन्हें अपने भाई के रूप में एक खरीदार भी मिला, जिनके साथ उन्होंने सुलह कर ली थी। ऋणदाताओं की समिति के किसी सहमति पर न पहुंचने के बाद कंपनी ने बिक्री की मंजूरी हासिल करने की एनसीएलटी में याचिका दायर की है। 

ऐसे में सवाल पैदा होता है कि अनिल के लिए इन सात वर्षों में ऐसे क्या बदलाव हुए हैं, जिनकी वजह से उनकी सïफलता की कहानी असफलता में बदल गई है? इसमें कोई संदेह नहीं है कि हालिया झटका मुकेश का जियो के जरिये दूरसंचार में फिर से उतरना है। जियो ने करीब तीन साल में 30 करोड़ से अधिक ग्राहक बना लिए हैं। 

जियो की बाजार में उथल-पुथल लाने वाली रणनीति से उद्योग में हर किसी की उम्मीद से पहले एकीकरण हुआ। आरकॉम उन अन्य कंपनियों (टीटीएसएल, टेलीनॉर, एमटीएस) में से एक थी, जिन्हें परिचालन बंद करना पड़ा। ग्राहकों ने मामूली कीमतों पर जियो की 4जी सेवाओं का लुत्फ उठाने के लिए उससे तेजी से जुड़े, जिसके कारण अन्य दूरसंचार कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी में गिरावट आई। जियो के आने से पहले जून, 2017 में आरकॉम का शेयर 9.54 रुपये पर था, जो अक्टूबर 2017 में गिरकर 5.20 रुपये पर आ गया। 

आरकॉम पर प्रतिस्पर्धा के असर का पहला संकेत उस समय मिला था, जब संचार मंत्री ए राजा ने बहुत से नए लाइसेंस आवंटित किए थे और देश में रातोरात मोबाइल कंपनियों की संख्या दोगुनी यानी 14 हो गई। नई कंपनियों ने कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा छेड़ दी, जिससे सभी दूरसंचार कंपनियों का मार्जिन घटा। वर्ष 2012 में वोडाफोन दूसरे पायदान पर पहुंच गई और आरकॉम तीसरे स्थान पर आ गई। फिर 2016 में आरकॉम चौथे पायदान पर पहुंच गई और साफ तौर पर उसकी बाजार हिस्सेदारी घट रही थी। कंपनी की बाजार हिस्सेदारी अक्टूबर, 2011 में करीब 17 फीसदी थी। 

उच्चतम न्यायालय के बहुत से लाइसेंस रद्द करने के बाद सीबीआई की जांच ने भी कहर बरपाया। अनिल को भी अदालत जाना पड़ा। वह भी स्वीकार करते हैं कि यह मुश्किल वक्त था। फिर भी अंतिम फैसले में सभी को बरी कर दिया गया। काफी समय कारोबार पर ध्यान देने के बजाय मामले से निपटने में बरबाद हो गया। विश्लेषकों का कहना है कि आरकॉम की हालत कमजोर होने की एक अन्य वजह यह थी कि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा था, जबकि उसकी आमदनी में इजाफा नहीं हो रहा था। नेटवर्क में निवेश के अलावा ऋण लेने का एक मुख्य कारण यह भी था कि कंपनी को स्पेक्ट्रम की मोटी कीमत चुकानी पड़ी। यह स्पेक्ट्रम उसे नीलामी के जरिये खरीदना था, जिसमें आधार कीमत बहुत ऊंची रखी गई थी। कंपनी ने 850 मेगाहट्र्ज बैंड में भी स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए 6,600 करोड़ रुपये खर्च किए थे ताकि इसे 4जी में इस्तेमाल किया जा सके। अनुमानों के मुताबिक कंपनी ने आधा कर्ज स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए लिया। 

कंपनी पर दबाव दिखने लगा था। आरकॉम पर कर्ज वर्ष 2010 में 25,000 करोड़ रुपये था, जो अब करीब 43,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि उसका एबिटा की तुलना में शुद्ध कर्ज करीब दोगुना हो गया है। बढ़ते कर्ज के कारण कंपनी की निवेश, विशेष रूप से 4जी पर निवेश की क्षमता कमजोर पड़ गई है। इसने समाधान ढूंढने की कोशिश की। इसमें से एक एयरसेल के साथ विलय था, लेकिन यह सौदा नहीं हो सका। 

क्या आरकॉम कोई अलग रणनीति अपना सकती थी? कुछ विश्लेषक भारती एयरटेल के मॉडल की तरफ इशारा करते हैं, जिसे भी जियो का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन फिर भी वह हर साल 24,000 करोड़ रुपये का निवेश करने के लिए पर्याप्त कमाई कर रही है। एयरटेल केवल आंतरिक कोष के जरिये नहीं बल्कि अपने टावर, फाइबर और अफ्रीकी दूरसंचार संपत्तियों को बेचकर निवेश कर रही है। विश्लेषकों का कहना है कि आरकॉम के पास बहुत सी संपत्तियां थीं, लेकिन उसने बिक्री का सही समय नहीं चुना।
Keyword: Reliance Communication, R-COM, JIO, Telecommunication, spectrum, Fiber deal, Stock Exchange, Mobile, CDMA, Data, GSM, Oil, Gas, Mukesh Ambani, Anil Ambani,
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