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राफेल सौदे में नाकामी के सबूत जगजाहिर

अजय शुक्ला /  February 13, 2019

फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले को लेकर विवाद 2017 के आखिर में पैदा हुआ था। यह शुरुआत में राहुल गांधी का राजनीति प्रेरित हमला नजर आता था, जो अधिक कीमत पर खरीद और मोदी के नजदीकी माने जाने वाले अनिल अंबानी के रिलायंस समूह को फायदा पहुंचाने के लिए सांठगांठ करने के आरोपों पर केंद्रित था। पिछले डेढ़ साल के दौरान राफेल सौदे में अनुचितता, प्रक्रियाओं का पालन न करने, मानक अनुबंध शर्तों को विदेशी वेंडरों के अनुकूल बनाने के लिए इनमें बदलाव करने और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की चिंताओं की अनदेखी करने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। पूरा विपक्ष अब राहुल के आरोपों के सुर में सुर मिला रहा है। 

इस अवधि में भारतीय जनता पार्टी और सरकार ने राफेल से जुड़ी सभी लड़ाइयां जीती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण समेत अनेक की याचिकाएं खारिज कर दीं। नागरिक समूहों के आग्रह के बावजूद सीबीआई ने कोई जांच शुरू नहीं की है। टेलीविजन पर बहस में सरकार और भाजपा के प्रवक्ताओं ने सफलतापूर्वक इस मुद्दे को तकनीकी और प्रक्रिया के जाल में उलझा दिया। इन सबके बावजूद राफेल युद्ध जारी है, जो मोदी को कमजोर कर रहा है। वे अधिकारी लगातार खुलासे कर रहे हैं, जो इस बात से खफा हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के ताकतवर फैसला लेने वाले लोगों के कहे अनुसार काम करने के लिए दबाया गया। इससे पहले सौदे की बात में शामिल रक्षा मंत्रालय के तीन अधिकारियों ने भी लिखित में यह मतभेद जताया था कि कैसे 'वित्तीय मितव्ययिता की बुनियादी जरूरत' की अनदेखी की जा रही है। इस समाचार-पत्र ने भी यह खबर प्रकाशित की थी कि कैसे मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट निविदा के तहत 126 राफेल की खरीद की जगह 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के मोदी के एकतरफा फैसले ने कैसे भारतीय वायु सेना और तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को चौंका दिया था। 

पहला आरोप यह है कि फ्रांसीसी वेंडरों दसॉ (विमान) और एमबीडीए (हथियार) को भारतीय वायु सेना से राफेल के लिए 126-एमएमआरसीए सौदे की कीमतों की तुलना में अधिक कीमत वसूलने की मंजू्री दी गई। इसी समाचार-पत्र की खबरों में कहा गया था कि दसॉ ने 2007 में 126 राफेल के लिए 19.5 अरब यूरो की बोली लगाई थी। यह 2016 में 36 राफेल के लिए 7.87 अरब यूरो में हुए करार से करीब 40 फीसदी सस्ता था। सरकार ने तर्क दिया कि अब राफेल में भारत की जरूरतों के हिसाब से कुछ चीजें जोड़ी गई हैं, जिससे ये ज्यादा सक्षम बन गए हैं।  लेकिन बाद में यह भी सामने आया कि जो नई क्षमताएं जोड़ी गई थीं, वे पहले के खरीद सौदे का भी हिस्सा थीं। 

सरकार ने ऐसी रिपोर्टों को खारिज करने की कोशिश की है, लेकिन उसने आधिकारिक आंकड़ों का खुलासा करने से इनकार कर दिया है। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन्हें सार्वजनिक करने का वादा किया था, लेकिन बाद में फ्रांस के साथ गोपनीयता समझौता का हवाला देते हुए पीछे हट गईं। इस बीच पार्टी के प्रवक्ताओं ने तर्क दिया है कि 36 राफेल की कीमत की 126-एमएमआरसीए निविदा से तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह निविदा कभी अनुबंध नहीं बन पाई। 

विवाद का एक अन्य बिंदु ऑफसेट के लिए दसॉ के मुख्य साझेदार के रूप में रिलायंस समूह का चयन है। ऑफसेट के तहत वेंडरों को अपने अनुबंध के मूल्य की आधी राशि भारत के रक्षा उद्योग में निवेश करनी पड़ती है। ऑफसेट नियमों के तहत वेंडर को अपनी ऑफसेट योजना सौंपनी पड़ती है ताकि उसकी रक्षा मंत्रालय पहले ही जांच कर सके। हालांकि दसॉ के साथ बातचीत शुरू होने के बाद 2 अगस्त, 2015 को एक संशोधन किया गया, जिसमें रक्षा मंत्रालय को ऑफसेट प्रस्तावों की जांच और मंजूरी की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया। इसे लेकर सीतारमण ने तर्क दिया कि रिलायंस समूह अपनी कमजोर वित्तीय स्थिति और हवाई विनिर्माण में अनुभव न होने के बावजूद दसॉ की पसंद था। फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि भारत ने ही कहा था कि ऑफसेट के लिए रिलायंस समूह को चुना जाए। हालांकि दसॉ का अनुबंध अधर में है, इसलिए उसने इस फैसले की जिम्मेदारी खुद पर ली है। 

हाल में द हिंदू द्वारा किए गए खुलासे पीएमओ की आशंकाओं पर केंद्रित हैं। एक फाइल में रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने लिखा है कि पीएमओ के हस्तक्षेप के कारण भारत की फ्रांस के साथ बातचीत कमजोर पड़ रही है, विशेष रूप से सॉवरिन गारंटी के मामले में।

सोमवार को हुए खुलासे और चिंताजनक हैं। दस्तावेज संकेत देते हैं कि 36 राफेल के अनुबंध दस्तावेज को कैबिनेट द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद सरकार ने अनुबंध के कई प्रावधानों को कमजोर किया। इससे कई सवाल पैदा होते हैं। कैबिनेट द्वारा मंजूर एक अनुबंध से भ्रष्टाचार निरोधी प्रावधानों को हटाने के लिए पीएमओ को क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए? क्या फ्रांस के वार्ताकारों ने 'इंटीग्रिटी क्लॉज' को हटाने के लिए कहा था या ऐसा भारत की तरफ से किया गया? आगे और खुलासे होने के बावजूद केवल पैसे का लेनदेन ही राफेल मामले में आपराधिक दोष साबित करेगा। उसके बिना केवल जनमत की अदालत में ही फैसला सुनाया जा सकता है। इसके बावजूद मामले से काफी नुकसान हुआ है। प्रक्रियाएं और संस्थागत प्रणाली की भारी अनदेखी की गई है और रक्षा खरीद की पहले से ही मुश्किल प्रक्रिया और जटिल हो गई है। हो सकता है कि हमें यह कभी पता न चले कि राफेल सौदे में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं। लेकिन अक्षम्य नाकामी के सबूत जगजाहिर हैं।  
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