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वित्तीय कंपनियों के आचरण में गिरावट के कारण?

देवाशिष बसु /  February 13, 2019

बीते कुछ महीनों पर गौर किया जाए जो कारोबारी जगत से स्कैंडल और खराब संचालन के मामले निरंतर सुर्खियां बटोर रहे हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) मामला, दीवान हाउसिंग फाइनैंस लिमिटेड की खस्ता हालत, आईसीआईसीआई बैंक की पूर्व प्रबंध निदेशक की अनियमितता, ज़ी के प्रवर्तक की ओर से सामने आया झटका, येस बैंक और ऐक्सिस बैंक के कुछ अज्ञात मसले (इन बैंकों के प्रमुखों को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया है), स्टरलाइट और वेदांत के प्रवर्तकों का आत्म केंद्रित व्यवहार आदि ऐसे ही कुछ मामले हैं। 

इनमें से प्रत्येक घटना के बाद शेयरधारकों के मूल्य में भारी गिरावट आई। डीएचएफएल की हालत सबसे अधिक खराब हुई और उसके शेयर की कीमत 700 रुपये प्रति शेयर से गिरकर 110 रुपये प्रति शेयर रह गई। इस प्रकार सितंबर 2018 से अब तक इसमें 85 फीसदी की गिरावट आई है। येस बैंक की शेयर कीमत आधी रह गई है। आईएलऐंडएफएस सूचीबद्ध कंपनी नहीं है लेकिन उसकी खस्ता हालत का असर समूचे वित्तीय क्षेत्र पर महसूस किया गया है, नकदी की कमी हो गई है, लोग जोखिम लेना नहीं चाह रहे।

ये घटनाएं एक के बाद एक घटित हुईं और इन्होंने एक बार पुन: यह दर्शाया कि किसी सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी के भीतर क्या कुछ चल रहा है, इसके बारे में शेयरधारकों को कितनी सीमित जानकारी होती है। यह बात जितनी खुदरा निवेशकों पर लागू होती है उतनी ही संस्थागत निवेशकों पर भी। क्या ऐसे हालात को टालने के लिए कुछ किया जा सकता है? एक हद तक तो यह कि जब भी ऐसी कोई दुर्घटना घटित होती है, कहीं न कहीं से नियमन और कड़े करने की मांग आने लगती है। दूसरा छोर यह है कि कुछ लोग कहना शुरू कर देते हैं कि कदाचार का नियमन करना संभव ही नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और नियमन इन्हें रोक नहीं सकता। क्या यह संभव है कि इन दोनों ध्रुवों के बीच कोई सार्थक दृष्टिकोण हासिल किया जा सके। अगर इसका उत्तर हां है तो क्या वाकई कॉर्पोरेट कदाचार की समस्या कोई प्रभावी हल वाकई तलाश किया जा सकता है?

गहराई से नजर डालकर हम ऐसे मामलों को कम अवश्य कर सकते हैं। कॉर्पोरेट कदाचार की दिक्कतों से निपटने में फिलहाल यही किया जा सकता है। आईएलऐंडएफएस, डीएचएफएल, आईसीआईसीआई बैंक, येस बैंक, ऐक्सिस बैंक आदि नामों पर ध्यान दीजिए, ये सभी वित्तीय संस्थान हैं। यह भी ध्यान रहे कि संगठित वित्तीय क्षेत्र, सरकारी बैंकों में मची भारी भरकम लूट ने देश की आर्थिक वृद्धि को बहुत गहराई से प्रभावित किया है। इस लूट के लिए नेता, बाबू, बैंकर और कारोबारी, सभी जवाबदेह हैं। इन सबके बीच सरकारी बैंकों और गड़बड़ वित्तीय कंपनियों ने छोटे जमाकर्ताओं को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। अगर कोई व्यवस्थागत संकट है, अगर खुदरा जमाकर्ताओं के पैसे को जोखिम है, तो आप शर्त लगा सकते हैं कि एक या एक से अधिक वित्तीय कंपनियां इसकी वजह होंगी। 

अमेरिका से उपजा वित्तीय संकट जो तेजी से भारत समेत पूरी दुनिया में फैल गया, उसके लिए शेयर ब्रोकरों और संस्थागत निवेशकों की मदद से लिया गया कर्ज जवाबदेह था। ऐसा नहीं है कि गैर वित्तीय कंपनियों को इन वित्तीय घपलों-घोटालों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, परंतु ऐसी घटनाएं बहुत कम हैं। बीतते वर्षों के दौरान प्रतिभूति बाजार में नियमन और खुलासों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि समझदार निवेशक ऐसी दुर्घटनाओं से बच सकें। वे खराब संचालन वाले प्रवर्तकों से दूरी बरत सकते हैं। वित्तीय कंपनियों की निगरानी एक अलग मसला है। वित्तीय कंपनियों को परिचालन के लिए कड़े नियमों की आवश्यकता है। अगर वे सूचीबद्ध हैं, तो उनकी निगरानी कम से कम दो नियामकों मसलन प्रतिभूति बाजार नियामक यानी सेबी और वित्तीय बाजार नियामक यानी रिजर्व बैंक द्वारा की जानी चाहिए। आवास वित्त कंपनियों की अतिरिक्त निगरानी राष्ट्रीय आवास बैंक करता है। अगर इस बारंबार संकट का कारण वित्तीय कंपनियां हैं तो क्या यह कहा जाए कि नियामक अपना काम ठीक से नहीं पूरा कर रहे हैं? इन सवालों  के जवाब तलाशने की कोशिश कीजिए:

सरकारी बैंकों को बीते 20 वर्षों में बार-बार जनता के पैसे से उबारना पड़ा है। इसके लिए कितने लोगों को जवाबदेह ठहराया गया?

एक स्कूली विद्यार्थी भी यह बात जानता है कि किसी भी तरह के ऋण के बदले कुछ जमानत होनी चाहिए। सरकारी बैंकों की 10 लाख करोड़ रुपये की जो राशि डूबी उसके लिए कौन उत्तरदायी है। वह पैसा इसलिए वापस नहीं आया क्योंकि उसकी ली सकने वाली जमानत कुछ थी ही नहीं।

वित्त मंत्रालय तीन दशकों से जनता का पैसा सरकारी बैंकों में क्यों डालता आ रहा है? जबकि इसके बजाय उसे कुछ ठोस बुनियादी कदम उठाने थे। 

 

अगर दीवान हाउसिंग फाइनैंस का पतन होता है तो क्या राष्ट्रीय आवास बैंक से सवाल किया जाएगा?

 

आईएलऐंडएफएस जिसकी निगरानी आरबीआई के पास रही है, उसे तीन दशक तक कुछ लोगों ने निजी कारोबार की तरह कैसे बरता? उसे करीब 350 कंपनियों का जाल कैसे बुनने दिया गया जिन्होंने मिलकर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण लिया।

 

आरबीआई का शीर्ष नेतृत्व आईएलऐंडएफएस के व्हिसल ब्लोअर्स के विभिन्न पत्रों पर पेशकदमी करने से चूक तो नहीं गया? अगर ऐसा हुआ तो क्या किसी को दंडित नहीं किया जाना चाहिए?

यह वित्तीय क्षेत्र की अनियमितताओं का एक छोटा सा उदाहरण भर है। इस क्षेत्र में कहीं अधिक कड़े नियमों की आवश्यकता है। ऐसे नियम जिन्हें व्यवहार में अमल में लाया जा सके और जो केवल कागजी बनकर न रह जाएं। इसके बजाय हमारे यहां ऐसे नियमनों को तोड़ मरोड़ लिया जाता है। इसके पीछे भी भ्रष्टाचार और अक्षम नियामक ही प्रमुख वजह हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यवस्थागत जोखिमों से बचने का एक प्रमुख तरीका यह है कि नियामकों, खासतौर पर सीधे वित्तीय फर्म के प्रभारी नियामकों को हर बड़ी गड़बड़ी के लिए प्रत्यक्ष तौर पर उत्तरदायी ठहराया जाए। प्रश्न यह है कि नियामकों की निगरानी कौन करेगा? 

यह काम तो वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के हवाले ही है क्योंकि प्रमुख कमान और नियंत्रण के केंद्र तो वही हैं। परंतु अधिकतम शासन के पांच वर्ष होने को हैं, लेकिन इन कार्यालयों ने वित्तीय नियामकों को जवाबदेह नहीं बनाया है।

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