बिजनेस स्टैंडर्ड - सोशल मीडिया का नियमन
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सोशल मीडिया का नियमन

संपादकीय /  February 13, 2019

गत वर्ष दिसंबर में सूचना प्रौद्योगिकी मध्यवर्ती संस्था दिशानिर्देश संशोधन नियम, 2018 का प्रारूप जारी किया गया था और 31 जनवरी 2019 तक उस पर जनता से राय मांगी थी। यह प्रारूप सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) एवं संबंधित सेवाएं देने वाले सभी प्लेटफॉर्म एवं कंटेंट एग्रीगेटर के नियमन के लिए तैयार किया गया है। इन आईटी मध्यवर्ती संस्थाओं में नेटवर्क सेवा प्रदाता, इंटरनेट सेवा प्रदाता, सर्च इंजन, ऑनलाइन भुगतान प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आते हैं। यह प्रारूप मूलत: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ाने के लिए बनाया गया है।

नए दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करते हैं कि सोशल मीडिया क्षेत्र की वैश्विक कंपनियां भी भारतीय कानूनों का पालन करें। भारत में 50 लाख से अधिक उपभोक्ताओं वाले प्लेटफॉर्म या सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी प्लेटफॉर्म को भारतीय कानून का अनुसरण करना होगा और उन्हें यहां अपना पंजीकृत कार्यालय भी रखना होगा। इन कंपनियों को प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय रखने और कानूनों के अनुपालन पर निगरानी रखने के लिए अपना एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा। इन कंपनियों का व्यवस्थित एवं प्रभावी नियमन होना ही चाहिए क्योंकि फर्जी खबरें एवं अफवाहें फैलाने में सोशल मीडिया का खूब दुरुपयोग हो रहा है। 

लेकिन इस मसौदे में कुछ बेचैन करने वाले पहलू भी हैं। यह निगरानी एवं सेंसरशिप के चक्र को सख्त करता है और निजी पक्ष भी इसकी जद में आ जाते हैं। ऐसा होने से सोशल मीडिया उपभोक्ताओं की निजता और उनकी अनामता खत्म हो जाती है। इसमें सोशल मीडिया से हटाए जाने लायक सामग्री की व्याख्या के लिए बेहद व्यापक एवं अपरिभाषित शर्तों का भी इस्तेमाल किया गया है। भारत में अब भी निजता का कानून नहीं है और न ही डिजिटल संभाषण एवं निजता को संरक्षण देने का कोई प्रावधान ही है।

इन दिशानिर्देशों के मुताबिक, अधिकारियों की तरफ से मांग आने पर 24 घंटे के भीतर संदिग्ध सामग्री अपलोड करने वालों की 'पहचान' करनी होगी। लेकिन कूटलेखन तोड़े बगैर ऐसा कर पाना तकनीकी रूप से मुश्किल है। लेकिन कूटलेखन भंग करने से सामग्री की निजता एवं अनामता दोनों पूरी तरह खत्म हो जाती है। दूसरा, इस संशोधन में मध्यवर्ती इकाइयों को तमाम तरह की सामग्रियों की त्वरित पहचान एवं उन्हें हटाने के लिए तकनीक का भी इस्तेमाल करने की जरूरत है। इससे निजी क्षेत्र पर सेंसरशिप लागू होने के साथ उस पर निगरानी भी बढ़ सकती है। ऐसी सामग्री को व्यक्तिनिष्ठ तरीके से 'नुकसानदायक' एवं 'अपमानजनक' शब्द के तौर पर परिभाषित किया गया है।

मध्यवर्ती संस्थाओं की भूमिका अधिकांश न्यायक्षेत्रों में विवादित रही है। निजी टिप्पणियां लिखने की अनुमति होने से इन प्लेटफॉर्म पर अनजान सामग्री आना लाजिमी है। जागरूक लोकतंत्रों में ऐसी सामग्री को दो व्यापक आयामों पर देखा जाता है। पहला आयाम 'सुरक्षित आश्रय' का है जिसमें किसी अनजान शख्स द्वारा गैरकानूनी या निंदापरक पोस्ट लिखे जाने पर उस मध्यवर्ती प्लेटफॉर्म को दोषी नहीं माना जाता है। लेकिन सक्षम अधिकारियों द्वारा संज्ञान में लाए जाने पर उस प्लेटफॉर्म को वह पोस्ट निश्चित समय के भीतर हटानी होती है। दूसरा, अनजान शख्स के लिखे शब्दों को ज्ञात स्रोतों द्वारा तैयार ऑनलाइन सामग्री के समान ही देखा जाता है। अगर यह सामग्री कानूनी दायरे में आती है तो किसी अनजान व्यक्ति की पोस्ट होने पर भी उसे हटाया नहीं जाना चाहिए। 

प्रस्तावित संशोधनों में सामान्य समझ वाले इन प्रावधानों का अभाव नजर आता है। आईटी मध्यवर्ती इकाइयों को सेंसरशिप एवं निगरानी के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। कोई भी कार्रवाई अदालती आदेश या संबंधित सरकारी विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश के आधार पर होनी चाहिए। इसके साथ ही ऐसी कार्रवाई के खिलाफ अपील का प्रावधान भी रखा जाना चाहिए।
Keyword: Social Media, IT, Platform, Regulation, Responsibility, Company, Censorship,
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