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ईवीएम मशीन की समीक्षा से ही बहाल हो पाएगा भरोसा

देवांग्शु दत्ता /  February 12, 2019

हर चुनाव से पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर चर्चा होने लगती है। भारत में बड़े पैमाने पर होने वाले चुनावों को देखते हुए ईवीएम अपरिहार्य हो चुकी हैं। लेकिन इनमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक अपारदर्शी होने से इसमें धांधली के आरोप लगते रहते हैं। चुनाव आयोग ने लगातार इन आरोपों को नकारते हुए कहा है कि ईवीएम को हैक करना तकनीकी रूप से नामुमकिन है। लेकिन यह दावा बेतुका है क्योंकि किसी भी इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर को हैक किया जा सकता है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) ईवीएम का निर्माण करते हैं। ईवीएम एक कंप्यूटर ही होता है जिसके मदरबोर्ड में एक खास चिप लगी होती है और डाले गए मतों को दर्ज करने के लिए एक मेमरी यूनिट भी होती है। ईवीएम एक ऐसी मशीन है जो किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ी होती है और उसे प्रोग्राम किया जा सकता है। इनका परिचालन नियंत्रित करने वाली चिप पर प्रोग्राम कोड अंकित होते हैं। इसमें गंभीर मसले खड़े होने की संभावनाएं निहित हैं।

उम्मीदवारों के नाम उनके चुनाव चिह्नों के साथ वर्णक्रम में दर्ज होते हैं। हरेक मशीन में करीब 3,800 मतों को स्टोर किया जा सकता है और उसमें 64 उम्मीदवारों को मिलने वाले मत दर्ज हो सकते हैं। हाल में डाले गए मत की पुष्टि करने के लिए वीवीपैट की व्यवस्था भी जोड़ी गई है। वीवीपैट वाली ईवीएम मशीनों में मतदान के बाद एक पर्ची निकलती है जिस पर मतदाता का नाम और उसके द्वारा डाले गए मत का ब्योरा होता है। मतदाता के पास यह जांचने के लिए 7 सेकंड का वक्त होता है कि उसका मत पसंदीदा उम्मीदवार को गया है या नहीं। यह समय बीतने के बाद वह पर्ची एक बंद बक्से में जमा कर दी जाती है। बाद में जरूरत महसूस होने पर ईवीएम में दर्ज मतों का वीवीपैट पर्चियों के साथ मिलान किया जा सकता है। अगर दोनों विवरणों में मेल नहीं बैठता है तो उसे मतदान अधिकारी को बताना चाहिए। फिर 'टेस्ट वोट' का प्रावधान रखा गया है। अगर उसमें भी गड़बड़ी पाई जाती है तो उस ईवीएम मशीन को हटाकर दूसरी मशीन लगा दी जाती है। लेकिन टेस्ट वोट में कोई गड़बड़ी न मिलने पर शिकायत खारिज कर दी जाती है। 

हरेक ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट और एक मतदान यूनिट होती है। वीवीपैट एक अलग मशीन होती है और ईवीएम से जोड़ी जाती है। ईवीएम की दो इकाइयां एक तार से जुड़ी होती हैं। मतदान यूनिट पर मतदान से संबंधित बटन लगे होते हैं जबकि कंट्रोल यूनिट में मतों का ब्योरा रखा जाता है और गिनती के समय मतों की संख्या के बारे में भी बताती है। मतदान यूनिट पर जब भी बटन दबाया जाता है तो एक मत दर्ज हो जाता है और वह मशीन लॉक हो जाती है। अगला मत दर्ज करने के लिए कंट्रोल यूनिट की मदद से उसे अनलॉक करना पड़ता है।

जनवरी में सैयद शुजा नाम के एक शख्स ने ईवीएम मशीनों को लेकर बेहद सनसनीखेज दावा किया था। शुजा ने वर्ष 2009-14 तक ईसीआईएल में काम करने का दावा करते हुए कहा कि वह ईवीएम मशीनों के डिजाइन और परीक्षण करने वाली टीम का हिस्सा रहा था। वर्ष 2014 के चुनाव में इन्हीं मशीनों का इस्तेमाल किया गया था। शुजा के मुताबिक उसे अमेरिका में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि रिलायंस जियो ने 2014 के चुनाव में ईवीएम मशीनों को कम-आवृत्ति वाले सिग्नलों के जरिये प्रभावित कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को फायदा पहुंचाया। (वैसे जियो की वाणिज्यिक सेवाएं सितंबर 2016 में शुरू हुई थीं।) हालांकि शुजा ने अपने बड़े दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं पेश किया।

जनवरी में ही आम आदमी पार्टी विधायक सौरभ भारद्वाज ने यह दिखाने की कोशिश की कि ईवीएम के हार्डवेयर को बदलना किस तरह संभव है। अन्य शोधकर्ताओं ने भी ईवीएम को हैक किए जाने की स्थिति दर्शायी है। उनके मुताबिक चिप या सर्किट बोर्ड को आसानी से बदलकर हैकिंग की जा सकती है। चिप के साथ बड़ी समस्या यह है कि उसका न तो परीक्षण हो सकता है और न ही उसकी पुष्टि की जा सकती है। ईसीआई के पास यह बताने का कोई तरीका नहीं है कि किसी ईवीएम में लगी चिप दूसरी चिप से बदली जा चुकी है।

सुरक्षा विशेषज्ञों ने बारंबार यह कहा है कि सोर्स कोड बताने से ईसीआई के इनकार से यह काफी असुरक्षित हो जाता है। किसी भी गोपनीय एवं बग वाले कोड को खंडित किया जा सकता है और पहचाने जाने का भी डर नहीं रहता है। यही वजह है कि तमाम बड़ी कंपनियां अपने प्रोग्राम के सोर्स कोड जारी करती हैं जिसके आधार पर स्वतंत्र सुरक्षा विशेषज्ञ उनमें मौजूद खामियों को पहचान कर उन्हें दूर करने के उपाय बता सकते हैं।

ईसीआई इस समय ईवीएम या वीवीपैट नहीं बदलने जा रहा है। एक मांग यह की गई है कि 50 फीसदी ईवीएम मशीनों का मिलान वीवीपैट पर्चियों से किया जाए और अधिक गलतियां पाए जाने पर वहां पुनर्मतदान कराया जाए। एक अन्य सुझाव यह है कि जीत का अंतर कम होने पर वीवीपैट पर्चियों की गिनती अनिवार्य की जाए।

ईवीएम और वीवीपैट मशीनों के औचक नमूने रखे जाने चाहिए ताकि मतदान प्रक्रिया में भरोसा बहाल हो सके। वीवीपैट से जुड़ी खामियों को भी दुरुस्त करने की जरूरत है। कोई भी चालाक हैकर लगातार कई मतों में छेडख़ानी नहीं करेगा। मसलन, हरेक तीसरे मत में छेड़छाड़ की जा सकती है और उसके बाद भी वीवीपैट का टेस्ट वोट यही बताएगा कि मशीन सही तरह काम कर रही है।

ईवीएम का मौलिक डिजाइन 1980 में तैयार किया गया था। ऐसी स्थिति में ईवीएम के हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर की समीक्षा का वक्त आ चुका है। इसका सोर्स कोड भी जारी किया जाना चाहिए ताकि खामियों को दूर कर मतदाताओं का भरोसा बहाल किया जा सके।

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