बिजनेस स्टैंडर्ड - साल की पहली छमाही में अर्थव्यवस्था की तस्वीर
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साल की पहली छमाही में अर्थव्यवस्था की तस्वीर

अजय शाह /  February 12, 2019

वर्ष 2019 की पहली छमाही में वैश्विक और स्थानीय हालात से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं? वर्ष 2012 से लेकर 2018 के अंत तक हमें धीमा और आंशिक सुधार देखने को मिला। अब एक बार फिर हालात प्रतिकूल हैं। ऋण बाजार में उत्पन्न दबाव और अनिश्चितता इसकी वजह हैं। ये समस्याएं जनवरी से मार्च और अप्रैल से जून तिमाही में उत्पादन पर असर डाल सकती हैं। इन बातों का असर वृहद नीति के स्वरूप पर भी होगा और अगली संसद और कैबिनेट की शुरुआती परिस्थितियों पर भी। 

आधिकारिक जीडीपी आंकड़ों में तो समस्या है ही, हम आर्थिक गतिविधियों की पुनर्रचना अन्य सीरीज के माध्यम से भी कर सकते हैं। 2012 से 2018 तक आंशिक सुधार देखने को मिला। जनवरी-जून 2019 की छमाही से क्या उम्मीद की जा सकती है?  देश की वृहद आर्थिक स्थिति में उतार-चढ़ाव की बड़ी वजह निजी निवेश है। सरकारी निवेश कहीं अधिक स्थिर है। निजी निवेश में तेजी से बदलाव होता है। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। वर्ष 2011 के बाद से निजी परियोजनाओं की घोषणा करीब आधी (समायोजित लिहाज से) रह गई हैं। इसने रोजगार और वृहद आर्थिक क्षेत्र में तनाव उत्पन्न किया है। 

हमें यकीनन यह सोचना होगा कि आखिर उच्च निवेश की परिस्थितियां किस प्रकार तैयार की जाएं? हम घरेलू निवेशकों को अपने वश में समझते हैं जोकि गलत है। उनके पास हमेशा यह विकल्प होता है कि वे चुप बैठे रहें। अगर हम चाहते हैं कि वे निवेश करें तो हमें अनुकूल माहौल बनाना होगा। हमें यह चिह्निïत करना चाहिए कि भारतीय किस हद तक अपनी गतिविधियों, परिसंपत्तियों और यहां तक कि लोगों को देश के बाहर स्थानांतरित करने में सक्षम हैं। हम घरेलू निवेश को हल्के में नहीं ले सकते, वैसे ही जैसे विदेशी निवेश को। 

तीन समस्याओं को चिह्निïत किया जा सकता है। पहली का संबंध वैश्विक और घरेलू वृद्घि से है। जब मांग का परिदृश्य अच्छा होता है तब निजी स्तर पर लोग निवेश के इच्छुक होते हैं। वहीं दूसरी ओर जब मांग कमजोर होती है तो पूरा जोर क्षमता के इस्तेमाल और उत्पादन योजनाओं के संरक्षण पर होता है। कई फर्म अपना मार्जिन कम करके भी उत्पादन की रक्षा करती हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में क्षमता वृद्घि नहीं चाहेंगी। 

दूसरी समस्या गैर वित्तीय कंपनियों और उनके कर्जदाताओं में ऋण के तनाव से संबंधित है। करीब एक तिहाई गैर वित्तीय कंपनियों की बैलेंस शीट दबाव में है। यही हालत दो तिहाई बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की है। जब एक संस्थान दिक्कत में आता है तो वह चुनिंदा लोगों को ऋण देना बंद कर देता है। अल्प अवधि में इससे इन कर्जदारों के लिए दबाव पैदा होता है। यह तब तक होता है जब तक कि ऐसे नए रिश्ते नहीं बन जाते। 

आईएलऐंडएफएस, एनबीएफसी, बॉन्ड बाजार और म्युचुअल फंड से जुड़ी कठिनाइयों का वास्तविक अर्थव्यवस्था पर तरंगीय प्रभाव पड़ा है। यह प्रभाव समस्या से परे जाकर भी असर दिखाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई कार कंपनी कम कारें बनाती है तो वह कम कलपुर्जे भी खरीदेगी। 

गैर वित्तीय क्षेत्र का ऋण का दबाव निजी क्षेत्र की निवेश की इच्छा और क्षमता दोनों को प्रभावित करता है। कुछ हद तक ऋण बाजार की कठिनाइयां आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित रकती हैं और कई कंपनियों की निवेश की इच्छा समाप्त हो जाती है। कुछ कंपनियों के लिए आकर्षक ब्याज दर पर उधार जुटा पाना मुश्किल होता है और यह बात निवेश को प्रभावित करती है। 

तीसरी समस्या अनिश्चितता की है। निजी क्षेत्र में कई लोग जांच एजेंसियों से निपटते हुए परेशान रहते हैं। निवेश के लिए आशावाद की आवश्यकता होती है और कई लोग तब तक विस्तार योजनाओं को रोक रखना चाहते हैं जब तक कि उनकी समस्याओं का निराकरण न हो जाए। नियामकों और कर अधिकारियों से निपटने में भी तमाम जोखिम हैं। बीते कुछ सप्ताह में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि आम चुनाव के नतीजों तक प्रतीक्षा कर ली जाए, उसके बाद विभिन्न संभावनाओं पर विचार किया जाएगा।

उपरोक्त तीनों कठिनाइयों की वजह से निवेश रुका हुआ है। जनवरी से जून 2019 तक की अवधि में यह समस्या बरकरार रहेगी। इसका असर जाहिर तौर पर मौद्रिक नीति पर भी पड़ेगा। मौद्रिक नीति समिति के सदस्यों को आधिकारिक जीडीपी आंकड़ों को देने वाली तवज्जो कम करनी होगी। एक बार ऐसा हो जाने के बाद हमें अर्थव्यवस्था में निरंतरता दिखेगी। आरबीआई पर भी यह दायित्व है कि वह अर्थव्यवस्था में खुदरा महंगाई सूचकांक को 4 फीसदी पहुंचाने में सहायता करे। इसके लिए दरों में कटौती करनी होगी। चूंकि मौद्रिक नीति पारेषण कमजोर है इसलिए अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के लिए काफी अधिक कटौती करनी होगी।

चुनाव नजदीक आने पर की गई कटौती को राजनीतिक कदम बताते हुए आलोचना की जा सकती है। मुद्रास्फीति के लक्ष्य की सबसे अच्छी बात यह है कि आरबीआई का लक्ष्य स्पष्ट है। हमें पता है कि खुदरा महंगाई निरंतर 4 फीसदी के तय लक्ष्य से नीचे रही है। ऐसे में दरों में कटौती के लिए ठोस दलील मौजूद है। अच्छी बात यह है कि अगर आरबीआई अभी कटौती करता है तो इस पर राजनीति प्रेरित होने का इल्जाम भी नहीं लगेगा।

चुनाव के बाद आर्थिक नीति संबंधी टीम को इन कठिनाइयों की मूल वजह तलाशनी होगी। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए निजी निवेश का माहौल तैयार करना होगा। इसमें आर्थिक नीति निर्माण में राज्य की बदलती भूमिका से लेकर नियामकों के कामकाज, कर नीति और कर प्रशासन तथा जांच एजेंसियों का काम आदि सभी शामिल होंगे। हालांकि निजी निवेश की पड़ताल के लिए घोषित और क्रियान्वयन के अधीन परियोजनाओं पर निगाह डाली जा सकती है।

अब राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र लिख रहे हैं। आर्थिक नीति डिजाइन की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि सरकार की भूमिका के साथ बाजार आधारित अर्थव्यवस्था तैयार की जाए। यह ऐसी जगह हो जहां सरकार की मामूली भूमिका के साथ व्यक्तियों तथा कंपनियों के हितों का संरक्षण किया जाए। ऐसी आर्थिक नीति विकसित करने की आवश्यकता है। अगर ऐसा होता है तो कारोबारी माहौल सुधरेगा और निजी निवेश के लिए भी बुनियाद तैयार होगी।
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: Financial year, Cabinet, Economy, Budget, Debt Market, GDP, IL&FS, Banking,
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