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उत्तर प्रदेश में प्रियंका पर टिकी कांग्रेस की रणनीति

अर्चिस मोहन /  02 11, 2019

राजनीति

बिजनेस स्टैंडर्ड उत्तर प्रदेश में प्रियंका पर टिकी कांग्रेस की रणनीतिउत्तर प्रदेश में कांग्रेस की रणनीति का एक पहलू इस पर केंद्रित है कि क्या 'बहन' प्रियंका गांधी वाड्रा सवर्ण जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को इस बात के लिए आश्वस्त कर सकती हैं कि उभरती कांग्रेस 'बहनजी' (बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती) के प्रभाव को कमजोर करने की क्षमता रखती है। 

कांग्रेस की महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका सोमवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर का हिस्सा बनीं और शाम तक ट्विटर पर उनके फॉलोअरों की संख्या बढ़कर करीब एक लाख हो गई। दिन में वह एक रोड शो के दौरान करीब पांच घंटे लखनऊ की गलियों से गुजरीं। मायावती ने बुधवार को इस सोशल मीडिया पर आने की आधिकारिक घोषणा की थी। सोमवार शाम तक ट्विटर पर उनके फॉलोअरों की संख्या करीब 76,400 थी। हालांकि प्रियंका ने शाम तक अपने हैंडल ञ्चप्रियंकागांधी से कोई ट्वीट नहीं किया था। मायावती की भी इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में पिछले छह दिनों के दौरान सक्रियता धीमी रही है। 

रोड शो के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी अपनी विचारधारा के लिए उत्तर प्रदेश में लड़ाई लड़ेगी। उन्होंने कम से कम सार्वजनिक रूप से तो यही संकेत दिया है कि पार्टी सपा और बसपा के सामने नहीं झुकेगी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश की 80 लोक सभा सीटों के लिए सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल के बीच बने गठबंधन का हिस्सा नहीं है।

पार्टी के सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस की रणनीति के दो पहलू हैं। पहला, ब्राह्मण और कुर्मी समर्थक आधार को मजबूत करना, विशेष रूप से अपनी चिह्नित 29 लोक सभा सीटों में। दूसरा जहां संभव हो, वहां बसपा को नुकसान पहुंचाना। इन 29 सीटों में से 21 सीटें वे हैं, जहां कांग्रेस 2009 के लोक सभा चुनावों में जीती थी। इस सूची में 13 सीट अवध क्षेत्र की हैं, जहां कांग्रेस को 2014 के लोक सभा चुनावों में भी 17.8 फीसदी मत मिले थे। इन सीटों में से कुछ अमेठी, राय बरेली, प्रतापगढ़, उन्नाव और बाराबंकी हैं। अवध क्षेत्र में कांग्रेस के पास प्रभावशाली नेता हैं। 

कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि कांग्रेस को अपने 80 फीसदी संसाधन इन 29 सीटों पर खर्च करने चाहिए। वहीं शेष 51 सीटों पर सवर्ण जाति के उम्मीदवार उतारने चाहिए ताकि अन्य को भाजपा को हराने में मदद मिल सके। कांग्रेस का मानना है कि उत्तर प्रदेश में तात्कालिक उभार सवर्ण जातियों और ओबीसी के वर्गों को इस बात के लिए आश्वस्त करने पर निर्भर करता है कि पार्टी मायावती को प्रधानमंत्री बनने में सहयोग नहीं देगी। वहीं लंबी अवधि के उभार के लिए कांग्रेस को बसपा के दलित और मुस्लिमों के समर्थन आधार में सेंध लगानी होगी। पार्टी ने चुनावों से पहले यह अभियान शुरू करने का फैसला किया है कि वह 'महागठबंधन' विशेष रूप से बसपा पर नरम रुख नहीं करेगी। 

कांग्रेस के रणनीतिकारों का कहना है कि कांग्रेस और बसपा के बीच भरोसे की कमी की कीमत पार्टी को केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी चुकानी पड़ेगी, जहां उसे हाल के विधानसभा चुनावों में फायदा मिला है। कांग्रेस का मानना है कि बसपा अपने पराभव की तरफ बढ़ रही है। बसपा को लगातार दूसरे चुनाव में राजस्थान और मध्य प्रदेश में अपनी मत हिस्सेदारी गंवानी पड़ी है। मध्य प्रदेश में बसपा का मत प्रतिशत 2008 में 8.97 फीसदी रहा था लेकिन 2018 के आखिर में हुए विधानसभा चुनाव में यह घटकर 5 फीसदी तक आ चुका है और उसकी सीटें भी 7 से घटकर 2 तक सिमट चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में भी बसपा की मत हिस्सेदारी कुछ इसी राह पर चली है। बसपा को 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में मिले मत 3.68 फीसदी कम हो गए थे। इसी तरह 2009 के आम चुनाव की तुलना में 2014 के चुनाव में उसका मत प्रतिशत 7.84 फीसदी तक खिसक गया। कांग्रेस के मुताबिक बसपा के मतों में आई इस गिरावट का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को हुआ है। लेकिन कांग्रेस झांसी, बाराबंकी, सहारनपुर, कानपुर, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, कुशीनगर, फैजाबाद, खीरी और धौरहरा की 'स्विंग' होने वाली सीटों पर बसपा के अरमान चकनाचूर कर सकती है। इसके अलावा प्रियंका गांधी के सियासी मैदान में खुलकर उतरने का भी कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। खासकर युवाओं और महिला मतदाताओं के बीच प्रियंका के जरिये कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ सकती है। वर्ष 2014 में भाजपा को पहली बार मतदान करने वाले 51 फीसदी युवाओं के मत मिले थे जबकि अन्य श्रेणियों में उसकी हिस्सेदारी 45 फीसदी से कम ही थी।

बहरहाल सर्वे एजेंसियों से मिले आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस का यही आकलन है कि 2007 से 2009 के बीच उसके समर्थन में हुई बढ़ोतरी की वजह तीन समुदायों- कुर्मी, ब्राह्मण और गैर-राजपूत अगड़ी जातियां (कायस्थ, खत्री और भूमिहार) रहीं। लेकिन 2014 के चुनाव में कांग्रेस इन समुदायों का समर्थन भाजपा के हाथों गंवा बैठी। कांग्रेस का यह मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ठाकुरों का दबदबा बढऩे से नाखुश ये तबके प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुआई वाले उसके खेमे में एक बार फिर लौट सकती हैं।

इन समुदायों में से खेतिहर जाति कुर्मी का समर्थन हासिल करना कांग्रेस के लिए सबसे अहम होगा। इसके लिए पार्टी कुर्मी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले दो नेताओं- आर पी एन सिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मोर्चे पर उतार सकती है। इसके साथ ही वह कृषि ऋण माफी का वादा भी कर सकती है। कांग्रेस ने जीत की संभावना वाली 29 सीटों को तीन श्रेणियों में बांटा है। उसकी नजर 2022 में होने वाली अगले विधानसभा चुनावों में अपना प्रदर्शन सुधारने पर भी है। इनमें से 16 सीटों पर जीत की उसे सर्वाधिक संभावना दिख रही है, 8 सीटों पर जीत की मध्यम संभावना है और बाकी 5 सीटों पर वह रणनीतिक गठजोड़ कर भाजपा को मात देने की कोशिश करेगी।

पार्टी ने पहली श्रेणी में रायबरेली, अमेठी, प्रतापगढ़, कुशीनगर, बाराबंकी, उन्नाव, फैजाबाद, कानपुर, खीरी, धौरहरा, झांसी, फर्रूखाबाद, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली और गाजियाबाद रखा है। उसे इन सीटों पर जीत की सबसे ज्यादा संभावना नजर आ रही है। वहीं कांग्रेस को लगता है कि पिछले चुनाव में उसे पांच सीटों पर हार का सामना अपने स्थापित नेताओं के पार्टी छोडऩे की वजह से हुआ था। इनमें जगदंबिका पाल, बेनी प्रसाद वर्मा और नंदगोपाल नंदी जैसे नाम शामिल थे। उसके पहले 2009 के चुनाव में कांग्रेस ने ये पांचों सीटें जीती थीं। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का सवाल है तो कांग्रेस वहां पर अधिक संभावना नहीं देख रही है। पार्टी सूत्रों को लगता है कि वाराणसी में बहुत अधिक जोर लगाने के बाद भी मोदी को डिगा पाना लगभग नामुमकिन होगा। 

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