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सीपीटीपीपी के लिए तैयारी करे भारत

अमिता बत्रा /  February 11, 2019

हाल ही में एशिया महाद्वीप में क्षेत्रीय व्यापार में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है। इस बदलाव पर भारत में शायद किसी ने ध्यान नहीं दिया है। पिछले साल 30 दिसंबर को कॉम्प्रीहेन्सिव ऐंड प्रोग्रेसिव ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (सीपीटीपीपी) समझौता प्रभाव में आया था। इसके 11 सदस्यों में छह देशों ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जपान, मैक्सिको, न्यूजीलैंड और सिंगापुर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। सीपीटीपीपी पहले ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) के नाम से जाना जाता था और अमेरिका भी बतौर सदस्य इसमें शामिल था। अमेरिका के बाहर होने के बावजूद सीपीटीपीपी ने आगे कदम बढ़ाया है। इस समझौते पर मुहर लगने के बाद 14 जनवरी को सीपीटीपीपी के सातवें सदस्य देश वियतनाम ने भी इसका हिस्सा बनने की हामी भर दी। पहले चरण में शुल्कों में की जाने वाली कटौती तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएगी। चिली 95 प्रतिशत, कनाडा 94 प्रतिशत, जापान 86 प्रतिशत और मैक्सिको 77 प्रतिशत कटौती कर रहे हैं। जापान द्वारा शुल्कों में की जाने वाली कटौती इस साल 1 अप्रैल से प्रभावी होगी। वियतनाम ने शुल्कों में सबसे कम 66 प्रतिशत की कमी की है, लेकिन अगले तीन साल में यह आंकड़ा बढ़कर 87 प्रतिशत हो जाएगा। दूसरे सदस्य देशों की संबंधित सहमति प्रक्रियाओं के बाद ब्रुनेई, चिली, मलेशिया और पेरु के लिए यह संधि प्रभावी हो जाएगी। 

टीपीपी की तरह ही सीपीटीपीपी भी एक महत्त्वाकांक्षी बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) है। यह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तहत हुए समझौतों के अतिरिक्त दूसरे उपायों की भी पेशकश करता है, जो व्यापार और निवेश प्रोत्साहन के अलावा एशिया-प्रशांत अर्थव्यवस्थाओं में उच्च श्रम एवं पर्यावरण मानक बहाल करने पर भी जोर देते हैं। वास्तविक टीपीपी समझौते के लगभग सभी प्रावधान सीपीटीपीपी में समाहित किए गए हैं। हालांकि निवेश और बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़े 22 प्रावधान इसकी जद से बाहर रखे गए हैं। ये प्रावधान मोटे तौर पर अमेरिका के लिए अधिक मायने रखते थे। इनमें या तो संशोधन किए गए हैं या ये निलंबित रखे गए हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी खरीद प्रक्रिया, ई-वाणिज्य और राज्य नियंत्रित उद्यम आदि से जुड़े प्रावधान बरकरार रखे गए हैं। 

शुल्कों में कटौती के साथ सदस्य देशों के बीच व्यापार के गहराई से एकीकरण और नियामकीय माहौल के उच्च मानकों के साथ सीपीटीपीपी उत्पादन क्षमता अधिक से अधिक साझा करने पर जोर देने और आपसी सहयोग के क्षेत्र में संभावनाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। एफटीए की मदद से व्यापार सुगमता आने, व्यापार पर कम खर्च और तरजीही बाजार तक पहुंच से सदस्य देशों की सीमाओं से कच्चे माल के आवागमन में मदद मिलेगी। यह वैश्विक मूल्य शृंखला (वस्तु या सेवाओं में लगे लोग एवं गतिविधियां और इनकी वैश्विक स्तर पर आपूर्ति) साथ ही उपभोग मांगों के लिए तैयार वस्तुओं के परिवहन के लिए महत्त्वपूर्ण है। ये बातें ऐसे समय में और अधिक अहम हो जाती हैं जब दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे के साथ व्यापार से जुड़े मतभेदों में उलझी हुई हैं। 

अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद दुनिया में संरक्षणवाद के बढ़ते चलन से निवेशकों के उत्साह और निवेश पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक स्तर पर व्यापार का ताना-बाना निश्चित तौर पर प्रभावित होगा और इसका असर दिख भी रहा है। सीपीटीपीपी गहरे और उन्नतिशील व्यापार उदारीकरण का औजार है, जो व्यापार युद्ध और संरक्षणवाद की तोड़ निकालने में कारगर होगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पूर्व में वैश्विक स्तर पर वस्तु एवं सेवाओं के सृजन में भागीदार बनने से लाभान्वित हुई है। इससे उन्हें उत्पादकता बढ़ाने, कौशल युक्त रोजगार संभावनाएं सृजित करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा बनने में पिछले डेढ़ दशक में मदद मिली है। लिहाजा, मौजूदा समय में सीपीटीपीपी के जरिये सतत जारी रहने वाला मूल्य शृंखला आधारित गतिविधियां न केवल इस क्षेत्र के व्यापार और आर्थिक वृद्धि में सहायक हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार और वृद्धि के लिए भी संभवत: अहम है। ऐसा इसलिए भी होगा, क्योंकि कालांतर में व्यापार एवं वैश्विक स्तर पर वस्तु एवं सेवाओं के सृजन से पैदा होने वाली संभावनाएं सदस्य देशों के मुक्त व्यापार समझौते के रास्ते दूसरी अर्थव्यवस्थाओं तक भी पहुंचेगी। जापान और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार संबंध इसका एक उदाहरण है। 

वर्तमान संदर्भ में तीन बातें भारत के लिए उपयोगी हो सकती हैं। पहली बात तो यह कि हमें दूसरे सदस्य देशों से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा के डर से एफटीए में भाग लेने से नहीं कतराना चाहिए। व्यापार एवं निवेश के लिए अवसर मुहैया करने के अलावा एफटीए वैश्विक स्तर पर वस्तु एवं सेवाओं के सृजन में भागीदार बनने में मदद करता है। व्यापार उदारीकरण एवं सुधार को प्रोत्साहन देने के मामले में डब्ल्यूटीओ कमजोर पड़ता जा रहा है, जिसके मद्देनजर वैश्विक एवं क्षेत्रीय स्तर पर व्यापार शर्तें एवं नियम तय करने में एफटीए एकमात्र उपलब्ध साधन साबित हो सकता है। 

वियतनाम जैसा छोटा देश भी एफटीए को एक अवसर के रूप में देख रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वियतनाम का दृष्टिïकोण हाल की इसकी आर्थिक प्रक्रिया और कारोबारी माहौल की सकारात्मक समीक्षा का परिणाम है। 2018 में वियतनाम की आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रही थी और यह दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में एक है। 2018 के लिए विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में वियतनाम 14 पायदान उछलकर 190 देशों में 68वें स्थान पर रहा। यह 2019 में 190 देशों में 69वें स्थान पर रहा। दिलचस्प बात है कि इसी सूची में भारत का भी सकारात्मक प्रदर्शन रहा है। भारत 2019 में 23 स्थान उछलकर 77वें पायदान पर आ गया। भारत को इस प्रदर्शन से उत्साहित होना चाहिए और घरेलू सुधारों को जोर देने के लिए एफटीए को एक साधन के तौर पर देखना चाहिए और वैश्विक स्तर पर वस्तु एवं सेवाओं के सृजन में अपनी क्षमता का संपूर्ण लाभ उठाना चाहिए।

दूसरी अहम बात यह है कि सीपीटीपीपी हरेक दशों के संवेदनशील क्षेत्रों के लिए कुछ रियायतें भी देता है। उदाहरण के लिए कनाडा के सांस्कृतिक उद्योग और वियतनाम के श्रम सुरक्षा कानून को इससे लाभ मिल रहा है, साथ ही सदस्य देशों में विभिन्न स्तरों और अवधि के लिए शुल्कों में कमी आदि से भी मदद मिलती है। भारत को भी इन उदाहरणों से प्रेरित होकर अपने संवेदनशील क्षेत्रों के लिए रीजनल काम्प्रीहेंसिव ऐंड इकनॉमिक कोऑपरेशन (आरसीईपी) समझौते के तहत रियायत और सुरक्षा पाने की दिशा में आगे बढऩा चाहिए। आरसीईपी पर फिलहाल बातचीत जारी है। 

तीसरी अहम बात यह है कि आने वाले समय में सीपीटीपीपी के सदस्य देशों की संख्या में विस्तार होगा, जिससे क्षेत्रीय एवं वैश्विक व्यापार का दायरा और बढ़ेगा। 19 जनवरी को सीपीटीपीपी के वाणिज्य मंत्रियों की पहली बैठक हुई थी, जिसमें यह समझौता उन नए सदस्य देशों के लिए खुला रखने का निर्णय हुआ था, जो उच्च मानकों के पालन के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस वजह से जल्द ही आसियान के दूसरे देश जैसे थाईलैंड और इंडोनेशिया और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाएं जैसे दक्षिण कोरिया और ताइवान इस समझौते में शामिल हो सकते हैं। ये सभी देश सीपीटीपीपी का हिस्सा बनना चाहते हैं। दूसरी अर्थव्यवस्थाओं जैसे ब्रिटेन और कोलंबिया ने भी इस समझौते में शामिल होने की मंशा जताई है। सीपीटीपीपी से जल्द ही क्षेत्रीय एवं वैश्विक व्यापार व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होगा। अब समय आ गया है कि भारत इसका संज्ञान ले और आरसीईपी पर बातचीत जल्द से जल्द पूरा करने के लिए कदम उठाए। भविष्य में सीपीटीपीपी का सदस्य बनने की संभावनाओं के मद्देनजर उसे अपनी व्यापार एवं संबंधित नीतियों में सुधार करना चाहिए।  
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