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अच्छी खबर, बुरी खबर

संपादकीय /  February 11, 2019

भारत में रोजगार की स्थिति के बारे में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अनुमानों का इस समाचार-पत्र में छपी खबरों ने काफी ध्यान खींचा है। इनका सबसे अधिक चौंकाने वाला खुलासा यह है कि बेरोजगारी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। यह स्वाभाविक रूप से बहुत चिंताजनक है। हालांकि एनएसएसओ के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जानी चाहिए। ये रोजगार के रुझानों को लेकर अच्छी और बुरी दोनों खबरें बयां करते हैं। इन पहलुओं में आगे की सरकारी नीति के भी निहितार्थ हैं।

एक खुलासा यह है कि हालांकि 2011-12 और 2017-18 के बीच कुल श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) में भारी गिरावट आई है, लेकिन गिरावट मुख्य रूप से महिलाओं में रही है। वर्ष 2011-12 और 2017-18 एनएसएसओ के दो हालिया और प्रासंगिक सर्वेक्षण दौर हैं। श्रम बल भागीदारी दर 2017-18 में 49.8 फीसदी थी, जो 2011-12 में 55.9 फीसदी की तुलना में कम थी। यह 2004-05 में 63.7 फीसदी की तुलना में और ज्यादा कम थी। लेकिन हाल के वर्षों में 15 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में गिरावट दोगुनी रही। इसमें 2011-12 और 2017-18 के दौरान 8 फीसदी गिरावट आई है, जबकि पुरुषों में गिरावट 4 फीसदी रही। अब 2017-18 में वयस्क महिलाओं की कुल श्रम बल में भागीदारी (एलएफपीआर) 23.3 फीसदी के निम्न आंकड़े पर आ गई है। इसकी मुख्य वजह ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी में भारी गिरावट आना है। 

शहरों में महिला एलएफपीआर लगभग पहले के स्तर पर ही है, जबकि यह ग्रामीण क्षेत्रों में 11 फीसदी घटी है। यह अच्छी खबर नहीं है। कुछ ने तर्क दिया है कि यह मांग आधारित है यानी महिलाएं स्वेच्छा से कम काम कर रही हैं। लेकिन ऐसा होना भी वृहद आर्थिक स्तर पर कोई सकारात्मक रुझान नहीं है। ऐसा भी नहीं हो सकता कि शिक्षा में नामांकन बढऩे से इसमें कमी आई है। इसके बजाय यह संभव है कि महिलाओं के रोजगार को आय के निचले स्तरों पर एक जरूरत के रूप में देखा जाता हो और जब आय में बढ़ोतरी हो तो महिलाएं कार्यबल से बाहर हो जाती हों। या ऐसा भी हो सकता है कि पुरुष बेरोजगारी में बढ़ोतरी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में 'महिलाओं का काम' पुरुषों को दे दिया गया हो और इसलिए महिलाओं ने घर से बाहर काम करना बंद कर दिया हो। इनमें से वजह कुछ हो, लेकिन यह एक ढांचागत समस्या है, जिसका समाधान खोजा जाना चाहिए। जब तक भारत के आधे से अधिक कार्यबल का समुचित उपयोग नहीं होगा, तब तक भारत तरक्की और प्रगति नहीं कर सकता। रोजगार और कौशल नीति की डिजाइन में बदलाव किया जाना चाहिए और इसमें महिलाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

इसके अलावा भी कुछ अच्छी खबरें हैं। एनएसएसओ के 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक नियमित वेतन पाने वाले लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह शहरों में बढ़कर 47 फीसदी हो गई है, जो 2011-12 में 43.4 फीसदी थी। इसमें 2004-05 में 2011-12 के बीच भी इतनी ही वृद्धि हुई थी। वर्ष 2004-05 में यह 39.5 फीसदी थी। अगर करीब आधे शहरी कार्यबल को मासिक वेतन मिल रहा है तो यह अर्थव्यवस्था के औपचारिक बनने की संभावना का एक अहम सूचक है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि कार्यबल के इस वर्ग के लिए आय सुरक्षा बढ़ रही है। उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए और कदम उठाए जाने की जरूरत है। इन वेतनभोगी कामगारों में से आधों को सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहे हैं, लेकिन उनमें से 70 फीसदी के साथ औपचारिक अनुबंध नहीं हैं। साफ तौर पर औपचारिकता का काम पहले से चल रहा है, लेकिन अब पहले की तुलना में सफल औपचारिकता की ज्यादा संभावनाएं हैं। 

Keyword: NSSO, JOB, Empolyment, Data, Labor Force, PLFS, LFPR,
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