बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई परिपत्र से बुनियादी ढांचा, बिजली को झटका
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, April 26, 2019 02:11 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम कंपनिया खबर

आरबीआई परिपत्र से बुनियादी ढांचा, बिजली को झटका

अनूप रॉय और देव चटर्जी / मुंबई 02 11, 2019

बकाये के भुगतान में देरी होने से कई कंपनियों ने की चूक

बिजनेस स्टैंडर्ड आरबीआई परिपत्र से बुनियादी ढांचा, बिजली को झटकापिछले साल 12 फरवरी को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से जारी परिपत्र से बुनियादी ढांचा एवं बिजली क्षेत्र की कंपनियों को तगड़ा झटका लगा है। उसी परिपत्र के तहत आरबीआई ने ऋण पुनर्गठन पर रोक लगाते हुए बैंकों को निर्देश दिया था कि यदि कोई कंपनी ऋण पुनर्भुगतान में एक दिन की भी देरी करे तो उसे गैर-निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की श्रेणी में डाल दिया जाए। हालांकि बैंकरों ने कहा कि उस परिपत्र से उन्हें भुगतान में चूक करने वाले प्रवर्तकों पर लगाम लगाने में मदद मिली। जबकि उद्योग के मुख्य कार्याधिकारियों को उस परिपत्र के खिलाफ दायर तमाम याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इंतजार है।

अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली दूरसंचार कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशंस सहित तमाम कंपनियों ने आरबीआई के 12 फरवरी के परिपत्र का हवाला देते हुए दिवालिया सुरक्षा के आवेदन किया है। परिपत्र में यह भी कहा गया है कि किसी भी ऋण पुनर्गठन के लिए कंपनी के 100 फीसदी लेनदारों की सहमति आवश्यक होगी। परिपत्र में कहा गया है कि बैंक यदि ऋण पुनर्गठन के लिए तैयार होते हैं तो उन्हें 100 फीसदी प्रावधान अवश्य करना होगा।

एक बड़ी कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी ने कहा, 'अधिकतर मामलों में ऋण पुनर्गठन के लिए बैंक लेनदारों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। ऐसे में कई कंपनियों को एनपीए श्रेणी में रख दिया गया। खासतौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र की कंपनियों को इससे तगड़ा झटका लगा क्योंकि उन्हें भारत सरकार से भुगतान प्राप्त होने में देरी हुई और इसलिए वे समय पर ऋण पुनर्भुगतान नहीं कर पाईं। आरबीआई के परिपत्र के तहत उन कंपनियों को दंडित करने की कोशिश की गई है जो सरकार से बकाये के भुगतान के इंतजार में हैं।'

इसी साल 1 फरवरी को आरकॉम ने कहा कि आरबीआई के 12 फरवरी 2018 के परिपत्र के अनुरूप सभी महत्त्वपूर्ण मुद्दों 100 फीसदी मंजूरी अथवा आम सहमति के अभाव में कंपनी ने अपने 45,000 करोड़ रुपये के ऋण के लिए दिवालिया समाधान के लिए आवेदन किया है। कंपनी का कहना है कि उसके 40 लेनदारों (देसी और विदेशी) के बीच 12 महीने के दौरान 45 बैठक होने के बावजूद प्रमुख मुद्दों पर कोई सहमति नहीं बन पाई। कंपनी ने जून 2017 से ही बैंकों के बकाये का भुगतान नहीं किया है।वास्तव में बिजली उत्पादक कंपनियों के संगठन ने आरबीआई के उस परिपत्र के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है जिसके तहत कई परियोजनाओं को गैर-निष्पादित आस्तियों की श्रेणी में रख दिया गया है। इनमें अधिकतर परियोजनाओं को बाहरी कारणों से झटका लगा था जैसे कोयले की उपलब्धता न होना, उपयुक्त बिजली खरीद समझौते का अभाव आदि।

दिलचस्प है कि पिछले साल अक्टूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात की बिजली कंपनियों- अदाणी पावर, टाटा पावर और एस्सार पावर- को उनके बिजली खरीद समझौतों पर नए सिरे से बातचीत करने की योजना को मंजूरी दी थी। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की ओर से दायर उस याचिका के बाद यह मंजूरी दी गई थी जिसमें कहा गया था कि इंडोनेशिया में कोयला निर्यात संबंधी नियमों के बदलने के कारण ये परियोजनाएं अब व्यावहारिक नहीं रह गई हैं।

पिछले दो वर्षों के दौरान 977 कंपनियों के खिलाफ ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत ऋण वसूली के लिए याचिका दायर करने वाले भारतीय लेनदारों ने सुनवाई के दौरान कहा कि गुजरात की तीन बिजली परियोजनाएं- मुंद्रा में कोस्टल गुजरात पावर, मुंद्रा में अदाणी पावर और एस्सार पावर- घाटे में चल रही हैं और सभी हितधारकों की कोशिश से इन परियोजनाओं को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।

एक बिजली कंपनी के सीएफओ ने कहा, 'आबीआई को वह परिपत्र अवश्य वापस लेना चाहिए क्योंकि वह भारतीय उद्योग जगत के खिलाफ है। रकम के अभाव में कंपनियों के बंद होने से हजारों लोगों की नौकरियां पहले ही जा चुकी हैं।' दूसरी ओर बैंकरों ने कहा कि 12 फरवरी के परिपत्र से ऋण लेनेवालों और ऋणदाताओं के बीच काफी अनुशासन आया है। देश के सबसे बड़े ऋणदाता भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार के अनुसार, ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया कानून 12 फरवरी के परिपत्र के साथ यह सुनिश्चित करता है कि पुनर्भुगतान में चूक करने वाले प्रवर्तक अब बातचीत के लिए सामने आएंगे अन्यथा उन्हें कंपनी पर अपना नियंत्रण खोना पड़ सकता है। कुमार इस परिपत्र पर अमल करने की व्यावहारिम कठिनाइयों के बारे में नहीं बताना चाहते थे क्योंकि यह मामला फिलहाल न्यायालय में है।

सरकार चाहती है कि आरबीआई उस परिपत्र में थोड़ी रियायत दे जो कम से कम बिजली कंपनियों के लिए हो। डूबते ऋण के आकार में वृद्धि की आशंका में कुछ बैंकों ने भी आरबीआई से उस परिपत्र के प्रावधानों में रियायत देने का आग्रह किया है।सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए मार्च 2018 के अंत तक बढ़कर 8.45 लाख करोड़ रुपये हो चुका था। सितंबर तक यह घटकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 8.26 लाख करोड़ रुपये और पूरी प्रणाली के लिए कुल अग्रिम का 10.8 फीसदी रह गई।

इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (आईबीए) के मुख्य कार्याधिकारी वीजी कन्नन ने कहा, 'यह बहुत बढिय़ा परिपत्र है और इसमें कोई खास बदलाव करने की जरूरत नहीं है। इसमें साफ तौर पर सीमा निर्धारित की गई है और बैंकों को पूरी आजादी दी गई है।' इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के निदेशक एवं प्रमुख (वित्तीय संस्थान) प्रकाश अग्रवाल ने कहा, 'इस परिपत्र के कारण ऋण को अब पूंजी बाजार के चरित्र के तौर पर देखा जा रहा है जिसके लिए भुगतान की अवधि का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इस अनुशासन से लंबी अवधि में बाजार को मदद मिलेगी जबकि सभी तकनीकी बाधाएं दूर हो जानी चाहिए।'
Keyword: india ratings, RBI, Reserve Bank of India, Infrastructure, Power, NPA, Promoter, Default, Plea, Reliance Communication,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मारुति के नतीजे वाहन उद्योग के लिए खतरे का संकेत हैं?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.