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एक समान स्टांप शुल्क से बढ़ सकती है विलय एवं अधिग्रहण लागत

सचिन मामबटा और सुदीप्त दे /  February 10, 2019

अंतरिम बजट में वित्तीय बाजार की योजनाओं के लिए स्टांप शुल्क संग्रहण को सुगम बनाने के प्रस्ताव से कई तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं। इससे राज्यों, ब्रोकरों, सौदे करने वाली कंपनियों और डेट के जरिये पूंजी जुटाने की संभावना तलाशने वाले संस्थानों पर विपरीत प्रभाव देखा जा सकता है। 

डिबेंचर और विलय एवं अधिग्रहण सौदों के जरिये ऋण जुटाने की लागत पहले की तुलना में ज्यादा हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि शेयर बाजार गतिविधि आकर्षित करने की राज्यों की क्षमता भी सवालों के घेरे में आ सकती है। यह कदम तब उठाए गए हैं जब शेयर बाजार पिछले कुछ वर्षों के दौरान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा है। ज्यादा संख्या में निवेशकों ने इक्विटी की सवारी की है। 

राज्यों और केंद्र, दोनों को स्टांप शुल्क लगाने और इसकी दर तय करने का अधिकार है। स्टांप शुल्क संग्रहण राज्य सरकारों के हाथ में रहा है। केंद्र सरकार एक्सचेंज, चेक, ऋण पत्रों, बीमा पॉलिसी, लेडिंग और प्रोमिसरी नोट के बिलों के लिए स्टांप शुल्क पर निर्णय ले सकती है। वह शेयरों, डिबेंचर के साथ साथ प्रॉक्सी और रिसीट के स्थानांतरण से संबंधित शुल्कों के बारे में भी निर्णय ले सकती है।

विधि कंपनी लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन में पार्टनर एल बदरीनारायणन के अनुसार, इस बीच राज्य अन्य सभी योजनाओं के लिए दरें निर्धारित करते हैं। राज्य सरकारों ने अन्य योजनाओं के तहत बाजार लेनदेन के रिकॉर्ड को शामिल कर इसकी परिभाषा का दायरा व्यापक बनाया है। शेयर ब्रोकरों द्वारा बजट से पहले स्टांप शुल्क समाप्त किए जाने के लिए अनुरोध किया गया था। इससे उन्हें शेयर बाजार से कर राजस्व बढ़ाने की अनुमति मिली। कुछ राज्यों ने इसका इस्तेमाल कम दरों के जरिये शेयर बाजार गतिविधि आकर्षित करने के लिए भी किया।

चूंकि दरें हरेक राज्य के लिए अलग अलग हैं, इसलिए संबद्घ पक्षों ने कम दरों की वजह से राज्यों के जरिये लेनदेन का रास्ता अपनाया। अब संग्रहण को केंद्रीकृत किया जाएगा। दर भी एक समान है। कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने अपने बजट भाषण में कहा था, 'स्टांप शुल्क लेनदेन से संबंधित एक सौदे पर लगाया जाएगा और स्टॉक एक्सचेंज के जरिये इसे एक स्थान पर ही एकत्रित किया जाएगा। एकत्रित शुल्क को सभी राज्य सरकारों को साझा किया जाएगा। यह बंटवारा ग्राहक से संबंधित राज्य के आधार पर होगा।' इसे लेकर स्टांप शुल्क के संबंध में राज्य-केंद्र समीकरण में बड़ा बदलाव आया है। 

पीडब्ल्यूसी इंडिया में लीडर (वित्तीय सेवा कर) भविन शाह ने कहा, 'शेयर लेनदेन पर केंद्रीकृत स्टांप शुल्क दर के कदम से राज्यों की शेयर बाजार गतिविधि आकर्षित करने के प्रयास में कम स्टांप शुल्क लगाने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। एक समान स्टांप शुल्क दर से राज्यों के बीच असमानता दूर हो सकती है और यह जिम्मेदारी राज्य पर छोड़ी जा सकती है कि कौन सी ब्रोकरेज फर्म को कारोबार शुरू करने के लिए चुना जाए।' किसी तरह के बदलाव से पहले राज्यों को संशोधन करने पड़ सकते हैं, हालांकि फिलहाल इसकी संभावना नहीं है।

नारायणन ने कहा, 'यह संबंधित संशोधन उन राज्यों द्वारा किया जाएगा जिन्होंने इंडियन स्टांप ऐक्ट को नहीं अपनाया है, यानी जिन्होंने अपने स्वयं के स्टांप शुल्क कानून को लागू किया है। इसलिए, राज्यों को समानता लाने के लिए अपने संबद्घ कानून में भी संशोधन करने की जरूरत होगी। हालांकि केंद्र द्वारा राज्यों को पहले ही इस बारे में परामर्श दिए जाने की वजह से इसे लेकर ज्यादा समस्या नहीं आ सकती है।' 

ब्रोकर इस कदम को लेकर अपनी नाराजगी पहले ही जता चुके हैं। उनका कहना है कि इसे समाप्त किया जाना बेहतर होगा, क्योंकि केंद्र द्वारा पहले से ही वसूले जा रहे प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) के अलावा यह एसटीटी का दूसरा स्वरूप है। इस बीच, कंपनियों के लिए भी बदलाव किए गए हैं। मौजूदा समय में, पूंजी जुटाने के लिए कंपनियों को 25 लाख रुपये के अधिकतम स्टांप शुल्क का सामना करना पड़ता है। नई व्यवस्था में यह सीमा समाप्त की गई है और सरकार को ऊंचे भुगतान की संभावना पैदा हुई है। शाह के अनुसार इससे इस विकल्प के जरिये भी बड़ी ऋण पूंजी जुटाना ज्यादा महंगा हो सकता है।

 

नए मानकों का विलय एवं अधिग्रहण लेनदेन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। डेलॉयट इंडिया में पार्टनर अमरीश शाह का कहना है, 'विलय एवं अधिग्रहण के नजरिये से, भविष्य में होने वाले सभी सौदे स्टांप शुल्क की वजह से महंगे हो जाएंगे, भले ही प्रतिभूतियां सूचीबद्घ हों या नहीं।'  थॉमसन रॉयटर्स डील्स इंटेलीजेंस के अनुसार वर्ष 2018 भारत में विलय एवं अधिग्रहण के लिए सबसे बड़ा वर्ष रहा। 
Keyword: Interim Budget, Debenture, Merger, Stamp Duty, Capital, Deal, Aquisition, Equity,
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