बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया कानून में खामियों को दूर किया
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दिवालिया कानून में खामियों को दूर किया

एम जे एंटनी /  February 10, 2019

विभिन्न दिवालिया कार्यवाहियों में उभर रहे जटिल मुद्दों पर उच्चतम न्यायालय ने हाल के हफ्तों में कई फैसले सुनाए हैं। पिछले सप्ताह आए इसी तरह के एक फैसले में शीर्ष न्यायालय ने के. शशिधर बनाम इंडियन ओवरसीज बैंक वाद में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपील पंचाट (एनसीएलएटी) के आदेश को बरकरार रखा। पंचाट का कहना था कि संबंधित कर्जदार कंपनी की समाधान योजना को वित्तीय ऋणदाताओं को जरूरी मत प्रतिशत के साथ मंजूरी नहीं दी गई थी और 270 दिन की वैधानिक अवधि के दौरान कोई वैकल्पिक समाधान योजना पेश नहीं की गई थी। इसलिए धनशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की धारा 33 के तहत परिसमापन की प्रक्रिया शुरू करना अपरिहार्य बन गया है। 

विजय कुमार बनाम स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक वाद में एक अन्य फैसले में न्यायालय ने एनसीएलएटी के आदेश को खारिज कर दिया और व्यवस्था दी कि दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही किसी कंपनी के निलंबित बोर्ड निदेश और इसके परिचालन ऋणदाताओं को समाधान योजना के सभी दस्तावेज दिए जाने चाहिए ताकि वे ऋणदाताओं की समिति की बैठक में सार्थक भागीदारी कर सकें। ब्रिलिएंट एलॉय लिमिटेड बनाम एस राजगोपाल वाद में शीर्ष न्यायालय ने समाधान पेशेवर द्वारा समाधान आवेदकों द्वारा समाधान योजना पेश करने के लिए अभिरूचि पत्र आमंत्रित किए जाने के बावजूद कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) को वापस लेने की अनुमति दे दी। शशि प्रकाश बनाम एनईपीसी मिकोन वाद में न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जो मामले राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) के दायरे में आते हैं वहां दिवानी अदालत का क्षेत्राधिकार पूरी तरह वर्जित है।  

ईएसआई कानून के तहत आ सकते हैं निदेशक 

अगर किसी कंपनी के निदेशकों को अपना काम करने के लिए पारितोषिक मिलता है तो वे कर्मचारी राज्य बीमा कानून के तहत 'कर्मचारी' की परिभाषा के दायरे में आते हैं। उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह ईएसआई निगम बनाम वीनस एलॉय लिमिटेड वाद में यह व्यवस्था दी। न्यायालय ने निगम की अपील को स्वीकार करते हुए संकेत दिया कि किसी कंपनी का प्रबंध निदेशक भी इस कानून के दायरे में आ सकता है। यह उसके काम और पारितोषिक पर निर्भर करेगा। 

ईएसआई अदालत और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने निगम की इस मांग के खिलाफ फैसला सुनाया था कि कंपनी को निदेशकों के पारितोषिक पर योगदान देना चाहिए। उनका कहना था कि निदेशक कर्मचारी नहीं हैं। इस मामले में निदेशकों को अपना काम करने के लिए प्रति माह 3,000 रुपये दिए जा रहे थे। निगम की दलील थी कि निदेशकों को दिया जा रहा पारितोषिक ईएसआई कानून के तहत 'वेतन' की परिभाषा में आता है और शीर्ष न्यायालय ने इसे स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया।

दाखिल खारिज का मतलब मालिकाना हक नहीं  

राजस्व अभिलेख में किसी जमीन के दाखिल खारिज से उस जमीन के स्वामित्व का निर्माण नहीं होता है और न ही यह खत्म होता है। यह स्वामित्व पर अनुमानित मूल्य भी नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने श्रीमती भीमाबाई बनाम आर्थर इंपैक्स कंपनी वाद में अपने फैसले में साफ किया कि दाखिल खारिज से यह होता है कि जिसके पक्ष में यह किया जाता है उसे उस जमीन का भू राजस्व देने को कहा जाता है। बंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि विवादित जमीन के संबंध में दीवानी मामले अदालतों में लंबित हैं, इसलिए वह इस तथ्यात्मक जांच के सवाल में नहीं जाएगा कि क्या प्रविष्टिïयां उचित थीं या नहीं, या किसके आग्रह पर की गई थीं।  ये न तो किसी पक्ष का स्वामित्व तय करती हैं और न ही उसे खत्म करती हैं। 

वाहन के कलपुर्जों पर कर की समीक्षा 

उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों के पीठ ने पिछले सप्ताह इस सवाल को व्यापक पीठ के हवाले कर दिया कि वारंटी अवधि के दौरान वाहनों के त्रुटि वाले कलपुर्जों को मुफ्त में बदलने पर बिक्री कर देय होगा या नहीं। पहले अदालत ने कहा था कि यह कर देय है। इस मुद्दे पर पंचाटों और उच्च न्यायालयों की अलग-अलग राय है। अब उच्चतम न्यायालय को अपने पहले के फैसले की सटीकता पर संदेह है जिसके आधार पर निचली अदालतों ने आदेश पारित किए हैं। 

टाटा मोटर्स बनाम व्यावसायिक कर उपायुक्त वाद में बड़ी संख्या में विनिर्माताओं और डीलरों की अपीलों पर न्यायालय कानून को स्पष्टï करना चाहता था। न्यायालय ने कहा कि मुफ्त कलपुर्जों की आपूर्ति की वारंटी के मामले में अगर कलपुर्जे को बदल दिया गया है और खराब कलपुर्जे को विनिर्माता को वापस कर दिया गया है तो क्या कर क्रेडिट नोट के आधार पर कर देय होगा। इस क्रेडिट नोट को इस उद्देश्य के लिए जारी किया जा सकता है। वाहन की कीमत में सभी कलपुर्जों की लागत शामिल है जिनकी मुफ्त आपूर्ति की गई है। अगर इन बदले हुए कलपुर्जों के लिए कोई पैसा नहीं दिया गया है तो क्या इस पर बिक्री कर लगाया जा सकता है?

उत्खनन लाइसेंस रद्द करने का फैसला अवैध 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने खनन महानियंत्रक द्वारा अपतटीय क्षेत्र खनिज (विकास एवं नियमन) कानून के तहत कई खनन कंपनियों को दिए गए उत्खनन लाइसेंसों को रद्द करने के आदेश को पिछले सप्ताह खारिज कर दिया। खनन मंत्रालय ने इस आदेश को इस आधार पर सही ठहराया कि कुछ ब्लॉक तटवर्ती इलाकों का अतिक्रमण कर रहे थे जहां तटीय नियमन क्षेत्र (सीआरजेड) के नियमों के तहत इस तरह की गतिविधियों पर पाबंदी है। स्टैंडर्ड मेटालॉय्ज लिमिटेड बनाम भारत संघ की अगुआई में कई याचिकाओं में कंपनियों ने यह दलील दी थी कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया और सीआरजी का तर्क बहाना है। 

न्यायालय ने नियमों का अध्ययन करने के बाद सीआरजेड के अतिक्रमण की अधिकारियों की दलील  को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि कंपनियों को उत्खनन का लाइसेंस देते समय अधिकारी इस मुद्दे का अध्ययन कर चुके थे। न्यायालय ने कहा कि कुछ ब्लॉकों के अतिक्रमण की दलील बाद में जानबूझकर रची गई है और इसका मकसद लाइसेंसों को रद्द करना है ताकि इन्हें फिर से आवंटित किया जा सके। न्यायालय ने महानियंत्रक को एक महीने के भीतर कंपनियों के पक्ष में उत्खनन लाइसेंस की प्रक्रिया लागू करने का आदेश दिया। 

दार्जिलिंग की लड़ाई हारा भारतीय टी बोर्ड  

'दार्जिलिंग' शब्द को लेकर भारतीय टी बोर्ड को पिछले सप्ताह नौ साल पुराने विवाद में आईटीसी लिमिटेड के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। आईटीसी लिमिटेड के कोलकाता स्थित सोनार बांग्ला होटल में दार्जिलिंग लॉन्ज है। बोर्ड का दावा था कि यह ट्रेड मार्क कानून और वस्तु कानून के भौगोलिक संकेत का उल्लंघन है तथा इससे लोगों को भ्रम होता है। उसके पास इस बात की गारंटी है कि दार्जिलिंग चाय का शत प्रतिशत उत्पादन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में होता है। 

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने होटल पर इस शब्द के इस्तेमाल पर स्थायी प्रतिबंध लगाने की बोर्ड की दलील को खारिज कर दिया। न्यायालय ने इस बारे विचार के लिए 20 सवालों को सूचीबद्घ किया था और एक विस्तृत फैसले में बोर्ड के खिलाफ इस आधार पर फैसला दिया कि उसने अपने आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए। न्यायालय ने तुच्छ मुद्दा उठाने के लिए बोर्ड पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। आईटीसी ने अदालत से अनुरोध किया कि इस राशि को उच्च न्यायालय की कानूनी मदद समिति को दान कर दिया जाए।

Keyword: NCLT, NCLAT, Insolvency, Supreme Court, IBC,
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