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रोजगार के आंकड़े महज राजनीतिक हथियार

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  February 10, 2019

रोजगार पर राष्ट्रीय नमूना सïïर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के सर्वेक्षण को लेकर इस समाचार-पत्र के युवा पत्रकार सोमेश झा द्वारा सबसे पहले दी गई खबर को लेकर मुख्य रूप से दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक तरफ सरकार के समर्थक आंकड़ों को लेकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ विपक्षी लोगों के चेहरे खिल गए हैं। लेकिन ऐसी घटनाओं के समय अमूमन जैसा होता है, उसी तरह हर कोई एक महत्त्वपूर्ण चीज को नहीं समझ पाया और इसलिए अपनी निजी कहानी सुना रहा है। 

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अच्छी खबर, बुरी खबर

मैंने वर्ष 1996 में इस समाचार-पत्र में नौकरी छोडऩे और घर से काम करने का फैसला किया। मेरा यह फैसला ठीक उसके समान था, जो मैंने 1988 में इक्रियर के लिए एक शोध पत्र में लिखा था। मैंने इस शोध पत्र में लिखा था कि सेवा की डिलिवरी बिना शारीरिक मौजूदगी के होगी और उस सेवा के उत्पादक के लिए शारीरिक उपस्थिति की कोई जरूरत नहीं होगी। इसके अलावा जब मैं किसी समय टेलीविजन पर क्रिकेट देख सकता हूं और उसी समय लिख भी सकता हूं तो मुझे कार्यालय में बैठने का कोई तुक नजर नहीं आता है। 

इस तरह मैं वर्ष 1997 में सैद्धांतिक रूप से 'बेरोजगार' हो गया। हालांकि इसके बाद के कुछ वर्षों के दौरान मेरी आय में तेजी से बढ़ोतरी हुई क्योंकि अब मैं ज्यादा उत्पादक बन गया था। मैंने अपने समय को एक खरीदार को बेचने के बजाय अपना काम बहुत से खरीदारों को बेचना शुरू कर दिया था। मैं आयकर की शब्दावली में फॉर्म 16 से फॉर्म 16ए में पहुंच गया था। मैं अपने तत्कालीन साथी डॉ. अशोक देसाई के शब्दों में एक आदमी वाली कारोबारी इकाई बन गया था। या बरट्रेंड रसेल के शब्दों में मैं एक इकाई बन गया था, जिस पर मेरा स्वामित्व था। श्रोडिंगर की बिल्ली की तरह मैं भी एक साथ दो स्थितियों- कार्यशील लेकिन नियोजित नहीं था।  

गलत सवाल 

पिछले सप्ताह जब यह शोरगुल शुरू हुआ तो मैंने ट्विटर पर एक पोस्ट लिखा, जिसे लेकर मेरा मानना है कि यह भारतीय राजनेताओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सवाल है। क्या कोई व्यक्ति खुद को नियोजित कर सकता या सकती है? आयकर विभाग इसका जवाब हां में देता है। लेकिन एनएसएसओ क्या कहेगा? मेरा मतलब है कि अगर सर्वेयर मुझसे यह पूछता है कि कि क्या मैं रोजगाररत हूं तो मैं क्या कहूंगा। मैं कहूंगा नहीं। यह सही है। लेकिन अगर मेरे से यह पूछा जाएगा कि क्या मेरी आमदनी शून्य है क्योंकि मैं बेरोजगार हूं तो मैं क्या कहूंगा? मैं कहूंगा नहीं। ऐसे में एनएसएसओ के प्रश्न की अहमियत को लेकर सवाल खड़ा होता है। यह इस शताब्दी के लिए अप्रासंगिक है क्योंकि रोजगार न केवल 20वीं शताब्दी का विचार है बल्कि यह 20वीं शताब्दी की राजनीति का विचार भी है। 

कीन्स ने राजनेताओं की आर्थिक सोच में सरकार के हस्तक्षेप के विचार को पेश किया था। कीन्स ने 1945 के बाद अपने प्रसिद्ध समीकरण में रोजगार को निवेश का विकल्प बनाया। राजनेताओं ने ऐसा वोट हासिल करने के लिए किया। मैं इसे कुछ अलग ढंग से पेश करता हूं। अगर हम मुद्रा बाजार के लिए 'स्वाभाविक' ब्याज दर की अवधारणा बना सकते हैं तो हम श्रम बाजार के लिए ऐसी ही 'स्वाभाविक' अवधारणा क्यों नहीं बना सकते? 

ब्याज की स्वाभाविक दर का मतलब यह नहीं है कि ऐसी दर स्वाभाविक रूप से तय होती है। बल्कि यह एक ऐसी दर है, जो 'पूर्ण' रोजगार और सतत महंगाई के अनुकूल है। हालांकि कोई भी और सभी राजनेताओं में से बहुत कम यह जानते हैं कि पूर्ण रोजगार का क्या मतलब है। यही वजह है कि इसे लेकर हमेशा बहुत भ्रम होता है। 

अर्थशास्त्रियों ने पूर्ण रोजगार की बहुत सी परिभाषाएं दी हैं। राजनीतिक स्तर पर सबसे ज्यादा स्वीकार्य परिभाषा यह है कि पूर्ण रोजगार वह है जब रोजगार की चाह रखने वालों में से केवल 1-2 फीसदी को काम नहीं मिलता है। लेकिन मेरे जैसे लोगों के लिए क्या कहा जाएगा। बहुत से लोग नौकरी करने को तरजीह नहीं देते हैं और इसके बजाय काम करना पसंद करते हैं? ऑस्ट्रेलिया का श्रम बाजार इस स्थिति को बहुत ठीक ढंग से प्रदर्शित करता है।   

वेतन का विरोधाभास 

मेरा पुरजोर यह मानना है कि भारत में राजनेताओं द्वारा श्रम बाजार में हस्तक्षेप के कारण रोजगार और उत्पादकता का आपसी संबंध विपरीत है। इस राजनीतिक हस्तक्षेप का सबसे अच्छा उदाहरण केरल है। एक कर्मचारी जो कुछ कमाता है, उसका इस चीज से बहुत कम संबंध होता है कि वह कितना काम करता है। इसका उदाहरण सरकारी कर्मचारी हैं। 

एक बार जब सरकार आपको नियोजित कर लेती है तो वह लगातार आपको ज्यादा वेतन देने की जरूरत महसूस करती है, लेकिन आपसे ज्यादा काम लेने की जरूरत महसूस नहीं करती। वेतन अनिवार्य है, लेकिन काम ऐच्छिक है। मुझे इस बात में संदेह है कि भारत में केवल सरकारी नौकरी को ही अपनी स्थायी प्रकृति के कारण वास्तविक 'रोजगार' माना जाता है। 

अगर आप निजी क्षेत्र या खुद के लिए काम करते हैं तो आपको नियोजित नहीं माना जाता है और यही चीज सर्वेक्षण में दिखाई जाती है। लेकिन सच्चाई बताई जानी चाहिए। लोगों ने 'नौकरी' तलाशना बंद कर दिया है, इस तथ्य का यह मतलब नहीं है कि यह आर्थिक रूप से गलत है। यह कहना मूर्खता है कि वे कामगार आबादी से बाहर हो गए हैं। निस्संदेह यह राजनीतिक रूप से पूरी तरह अलग है। इससे विपक्ष को जरूर एक बड़ी लाठी मिल जाती है, जिससे वह सरकार की पिटाई कर सकता है। 

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