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राफेल की ढलान पर मोदी की फिसलन

शेखर गुप्ता /  February 10, 2019

राफेल विमान सौदे को लेकर 'द हिंदू' समाचारपत्र में एन राम का खुलासा और उसके जवाब में सरकार की तरफ से किए गए दावों ने बहस को बढ़ाने का ही काम किया है। इस कवायद का सीधा असर यह हुआ है कि राफेल मामला असल में अहंकार और अज्ञानता के चलते खुद पर थोपा हुआ एक घोटाला बन चुका है। पहले जो बात धुंधली थी, अब वह और संदेहास्पद हो चुकी है।

अब इन बिंदुओं पर स्थिति साफ है। मनोहर पर्रिकर के रक्षा मंत्री रहते समय उनके मंत्रालय के अधिकारी इस पर असहज या असुरक्षित महसूस कर रहे थे कि राफेल से संबंधित विचार-विमर्श को किस तरह दबाया जा रहा है? ऐसे में उन्होंने अपनी आपत्तियों को बाकायदा दर्ज कराया। उनकी आपत्तियों को रक्षा मंत्री ने अनावश्यक प्रतिक्रिया बताते हुए नकार दिया। अधिकारियों को इस मामले में प्रधानमंत्री के 'पीएस' (संभवत: प्रमुख सचिव) के साथ परामर्श करने को कहा गया। इसका मतलब है कि शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने नौकरशाहों की आपत्तियों को खारिज कर दिया। नेतृत्व चाहता था कि यह सौदा जल्द संपन्न हो। सिद्धांत रूप में ऐसा होना ठीक भी है। संदेह जताना नौकरशाही का चरित्र है और एक निर्णायक राजनेता उनकी आपत्तियों को पलट सकता है और उस फैसले के लिए जिम्मेदारी भी लेता है।

यहां तक सब ठीक है लेकिन हम एक मुश्किल से भी रूबरू होते हैं। अगर इन चारों बिंदुओं में दर्ज बातें ही इस सौदे के मामले में सही हैं तो उसका यही मतलब है कि नौकरशाह नियमित अंदाज में खुद का रिकॉर्ड सही रखना चाह रहे थे और एक सख्त, राष्ट्रवादी एवं ईमानदार सरकार ने उनकी तरफ से खड़ी अड़चनों को हटा दिया। फिर वही साहसी सरकार इस बात को खुलकर कहने में इतनी हिचक क्यों दिखा रही है?

सरकार लगातार बहानों के पीछे क्यों छिपे? विमान सौदे की कीमत गोपनीयता का प्रावधान, ऐड-ऑन सुविधा और भारत-केंद्रित संवद्र्धन (आईएसई), खुलासे पर रोक की द्विपक्षीय प्रतिबद्धता, हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) अच्छा नहीं है, सुविधा पत्र बन जाने वाली सॉवरेन गारंटी, उच्चतम न्यायालय ने सौदे को हरी झंडी दे दी है, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट का इंतजार और इससे भी बदतर यह कि रक्षा खरीद के लिए निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक चर्चा हुई थी।

अगर सरकार ने पहले ही सच बता दिया होता तो वह आम चुनावों के पहले एक बड़े रक्षा घोटाले के आक्षेप से बच जाती। वह 'सच' कुछ ऐसा हो सकता था: राफेल को वर्ष 2012 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने न्यूनतम बोलीकर्ता के तौर पर 126 विमानों की खरीद के लिए चुना था। लेकिन सौदे की कीमत पर चर्चा करने वाली 14 सदस्यीय समिति के तीन सदस्यों ने हल्के दर्जे के एतराज जताए थे। तत्कालीन रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने आपत्तियों पर गौर करने के लिए एक समिति गठित की और फिर इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए तीन बाहरी 'प्रेक्षकों' का एक समूह भी बना दिया। उसके बाद हुई 14 सदस्यीय समिति की पूर्ण बैठक में कीमत संबंधी आपत्तियों को नकार दिया गया।

एक समिति के ऊपर एक और समिति बनाई गई थी और 126 विमानों की खरीद को मंजूरी दे दी गई थी। फिर क्या हुआ? एंटनी संशय में पड़ गए और फिर उन्होंने इस फैसले को पलट दिया और दोबारा बोली लगाने की भी बात कही। इस सौदे की शुरुआत वर्ष 2001 में वाजपेयी सरकार के समय हुई थी। ऐसे में एंटनी चाहते थे कि अंतिम फैसले को अगली सरकार के लिए टाल दिया जाए। उनकी सोच थी कि उनके कार्यकाल में कोई खरीद घोटाला न हो।  वह अपने मकसद में एक हद तक कामयाब हुए लेकिन उन पर अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले का दाग लग ही गया। 

लेकिन हमारी निर्णायक, समझौता न करने वाली मोदी सरकार ने क्या किया? भारतीय वायुसेना अब और इंतजार नहीं कर सकती थी। अगर सरकार ने थोड़ी प्रक्रिया का पालन नहीं किया तो क्या हुआ? ये तो महज कार्यकारी मानक हैं और संवैधानिक रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। लिहाजा इस मामले में मुख्य कार्यकारी प्रधानमंत्री व्यापक राष्ट्रीय हित में इन कदमों को टाल सकते हैं। 

मोदी सरकार ने इस घटनाक्रम का खुलासा क्यों नहीं किया? अगर ऐसा होता तो पिछले छह महीनों में हर नया खुलासा सुर्खियां नहीं बनता और अप्रासंगिक बन जाता। फिर रक्षा मंत्री को टीवी कैमरों के सामने और संसद के भीतर अपनी पीड़ा और गुस्से का इजहार करने की नौबत ही नहीं आती। भले ही उन्होंने इस सौदे के बचाव में तथ्यों और संदर्भों से भरी बेहतरीन दलीलें दीं लेकिन राहुल गांधी के बार-बार पूछे जा रहे सवाल का रक्षा मंत्री ने जवाब नहीं दिया। राहुल का सीधा सवाल था: रक्षा मंत्रालय ने इस सौदे पर आपत्तियां उठाई थीं या नहीं? अगर वह इसका सच्चाई से जवाब देतीं तो यही कहतीं- हां, ऐसा हुआ था जो कि सामान्य प्रक्रिया है लेकिन सरकार ने अपने विवेक से उसे पलट दिया। अगर यह जवाब मिला होता तो कहानी इतनी आगे नहीं बढ़ती। 

सरकारें अमूमन दो वजहों से खुद को पाक-साफ बताने जैसे साधारण काम नहीं करती हैं। पहली, उनकी अंतरात्मा साफ नहीं होती है क्योंकि वे बहुत कुछ छिपाती हैं और उन्हें लगता है कि  आलोचकों को पता नहीं चलेगा। दूसरी, वे खुद को सही मानते हुए अहंकारी हो जाती हैं और अपने विपक्षियों के प्रति ऐसा तिरस्कार भाव रखती हैं कि उनके सवालों के जवाब देना उन्हें अपनी शान के खिलाफ नजर आता है। मुझसे पूछने की हिम्मत कैसे हुई? क्या मैं भी तुम्हारी तरह भ्रष्ट हो सकता हूं? यह राफेल मामले से जुड़ी वह ढलान है जिस पर मोदी सरकार फिसलती जा रही है।

एक विश्लेषक एवं संपादकीय लेखक के तौर पर मैं अब भी इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए कुछ और साक्ष्य चाहूंगा कि इस सरकार का अंत:करण स्वच्छ नहीं है और वह रिश्वत जैसी कोई बड़ी गलती छिपाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष के पास धैर्य रखने का कोई कारण नहीं है। दूसरा निष्कर्ष बिना किसी संदेह के पूरी तरह साफ है।

पिछले तीन दशकों में हम इस तरह का नाटक दो बार देख चुके हैं लेकिन दोनों बार परिणाम अलग रहे हैं। पहला वाकया बोफोर्स का था। अगर राजीव गांधी की अंतरात्मा स्वच्छ थी तो वह गंभीर जांच का आदेश देकर घोटाले को पहले दिन ही दफन कर सकते थे। लेकिन वह गलतियां करते चले गए और आखिर में संयुक्त संसदीय समिति भी गठित की। लेकिन सब कुछ ऐसे संभाला गया कि स्विस खाते की जानकारियां सामने आने के पहले ही वह कपटी और दोषी नजर आने लगे। राजीव ने संसद के भीतर कहा था कि न तो वह और न ही उनके किसी परिजन ने इस सौदे में कोई रिश्वत ली है। इसका स्वाभाविक परिणाम स्पष्ट था: ठीक है, आप पाक-साफ हैं लेकिन अगर किसी और ने गलत काम किया है तो क्या आपका दायित्व नहीं है कि एक व्यवस्थित, निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों को पकड़ा जाए? कांग्रेस यह कह सकती है कि बोफोर्स मामले में 32 साल बाद भी कोई व्यक्ति पकड़ा नहीं जा सका है और न ही एक पैसे की बरामदगी हुई है। लेकिन कांग्रेस की छवि पर बोफोर्स का दाग अब भी कायम है।

दूसरा, सुखोई-30 विमानों की खरीद में बड़े पैमाने पर घपला होने के सारे लक्षण थे। पी वी नरसिंह राव सरकार ने 1996 चुनाव की घोषणा होने के बाद भी इस सौदे के लिए बड़ी धनराशि अग्रिम जारी की थी। इस सौदे में निर्धारित प्रक्रिया का नाममात्र ही पालन किया गया और वर्तमान मानकों के हिसाब से उसे राष्ट्र के प्रति अपराध माना जाता। लेकिन राव ने विपक्षी दल भाजपा के नेताओं को भरोसे में ले लिया। बाद में देवगौड़ा सरकार के रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव ने सौदे से जुड़ी सभी फाइलें प्रमुख विपक्षी नेताओं के सामने रख दीं और आरोपों से बच गए। उसके बाद से सुखोई सौदे को लेकर कभी भी कोई सवाल नहीं उठा है।

अगर मौजूदा सरकार यह सोच रही है कि नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा उसे उबार लेगी तो वह गलत साबित हो सकती है। भले ही यह सरकार गोपनीयता बरतने के मामले में खुद को बेहतरीन मानती हो, लेकिन राफेल सौदे से जुड़े दस्तावेज लुटियंस दिल्ली की फिजाओं में तैरने लगे हैं। वैसे सरकार अब भी राफेल सौदे पर श्वेतपत्र जारी कर और आलोचकों एवं पत्रकारों के सवालों के जवाब दे सकती है। अगर मोदी सरकार ऐसा नहीं करती है तो राफेल इतनी आसानी से उनका पीछा नहीं छोडऩे वाला है। 

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