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निराशाजनक भविष्य की राह पर जेसॉप और डनलप

अभिषेक रक्षित / कोलकाता February 10, 2019

जेसॉप ऐंड कंपनी और डनलप इंडिया के अधिग्रहण के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा में लगातार दो विधेयक पारित होने के तीन साल बाद भी न तो अधिग्रहण हुआ है और न ही बैंकों व कामगारों के बकाए के निपटान के लिए इसका परिसमापन हुआ है। इस समस्या की जड़ में मालिकाना हक पर अस्पष्टता है। फरवरी 2016 में राज्य विधानसभा ने जेसॉप और डनलप के पूर्व मालिक रुइया समूह से नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए विधेयक पारित किया था, लेकिन इस पर केंद्र सरकार की मंजूरी अभी भी लंबित है।

रुइया समूह के चेयरमैन पवन रुइया यह मानने को तैयार नहीं है कि इन दोनों इकाइयों पर उनका नियंत्रण है, लेकिन राज्य सरकार का मानना है कि अधिग्रहण वाले विधेयक के अधिनियम बनने तक इस पर उसका अधिकार है। जेसॉप के मामले में केंद्र के पास कंपनी के चार फीसदी शेयर हैं और इसकी मंजूरी अनिवार्य है। लेकिन डनलप के मामले में अधिग्रहण विधेयक पारित होने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ईवी मथाई ऐंड कंपनी व ए के कुंडु ऐंड कंपनी के अलावा 15 लेनदारों की याचिका की सुनवाई (10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाए का भुगतान नहीं होने पर) के बाद कंपनी के समापन का आदेश दिया और फरवरी 2016 में परिसमापक नियुक्त कर दिया।

उच्च न्यायालय के आदेश के तीन साल बाद भी डनलप का परिसमापन नहीं हो पाया है। डनलप ट्रेड यूनियन के सूत्रों का दावा है, चूंकि यह अस्पष्ट है कि कौन कंपनी का वास्तविक मालिक है, ऐसे में परिसमापक को कानूनी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा डनलप में इंडियन नैशनल तृणमूल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नेता विद्युत राउत ने कहा कि इस मामले में केंद्र सरकार की मंजूरी अनिवार्य है। राउत ने कहा, इस पर स्पष्टता की दरकार है कि कौन वास्तव में डनलप की मालिक है। अगर मूल्यांकन सही तरीके से किया जाए तो कामगारों का बकाया (40-45 करोड़ रुपये) चुकाया जा सकता है। साथ ही वित्तीय लेनदारों को भी अपनी कुछ रकम वापस मिल जाएगी।

Keyword: jessop and company, dunlop india, West Bengal, Legislative Assembly,
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