बिजनेस स्टैंडर्ड - ड्रोन से बढ़ता खतरा
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ड्रोन से बढ़ता खतरा

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली 02 10, 2019

देश के आसमान में पांच लाख ड्रोन

भारत में हरेक विमान पर हैं 700 ड्रोन
चीन में बने हैं अधिकांश, नहीं है लाइसेंस
नियमों में ढील चाहता है उद्योग

बिजनेस स्टैंडर्ड ड्रोन से बढ़ता खतराअगर आपको लगता है कि ड्रोन दिखने के कारण उड़ानों में व्यवधान केवल ब्रिटेन के हीथ्रो और गैटविक या अमेरिका के न्यूअर्क की ही समस्या है तो आप मुगालते में हैं। अनुमानों के मुताबिक भारत के आसमान में पांच लाख व्यावसायिक ड्रोन सक्रिय हैं। यानी देश में प्रति विमान पर 700 ड्रोन हैं। ऐसे में भारत में विमानों पर ड्रोन का खतरा उतना ही गंभीर हो सकता है जितना कि विकसित देशों में। दुनियाभर में 2014-18 के दौरान बिके ड्रोन की संख्या के आधार पर बिज़नेस इनसाइडर इंटेलीजेंस ने अनुमान जताया है कि पूरी दुनिया में इस समय चार करोड़ से अधिक व्यावसायिक ड्रोन सक्रिय हैं। पूरी दुनिया में विमानों की संख्या केवल 50,000 है। यानी दुनिया में हर विमान पर औसतन 800 ड्रोन हैं। इस लिहाज से देखें तो भारत वैश्विक औसत के बेहद करीब है। पिछले साल एक पायलट ने स्वतंत्रता दिवस से ऐन पहले दिल्ली में एक ड्रोन देखा था। इसी तरह एक पायलट ने भुवनेश्वर में एक ड्रोन देखा था।

भारत में समस्या यह है कि अधिकांश ड्रोन अवैध हैं और निगरानी से बाहर हैं। पिछले साल सरकार ने एक व्यापक ड्रोन नीति घोषित की थी जिसमें 1 दिसंबर, 2018 से परमिट के साथ ड्रोन उड़ाने की अनुमति दी गई थी। अलबत्ता आसमान में पहले से उड़ रहे ड्रोन का नए नियमों के तहत पंजीकरण नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे अवैध हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार ने अक्टूबर 2014 में व्यावसायिक ड्रोन के इस्तेमाल पर एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया था।  

नए नियमों के मुताबिक अगर किसी ड्रोन को आयात किया जाता है तो इसके लिए विदेश व्यापार महानिदेशालय लाइसेंस लेने के साथ ही नागरिक उड्डïयन महानिदेशालय (डीजीसीए) से क्लीयरेंस लेनी होगी। देश में अभी जो ड्रोन मौजूद हैं उनमें से अधिकांश तस्करी के जरिये देश में लाए गए हैं या अलग श्रेणी के तहत आयात किए गए हैं। उनके पास ड्रोन लाइसेंस नहीं हैं। अधिकांश ड्रोन चीन में बनते हैं। ड्रोन बनाने वाली कंपनी या इसका आयात करने वाली कंपनी को मशीन बेचने से पहले दूरसंचार विभाग से मंजूरी लेनी होगी। जाहिर है कि अवैध ड्रोन बनाने वाली या आयात करने वाली किसी भी कंपनी ने ऐसी कोई मंजूरी नहीं ली होगी। 

इतना नहीं नहीं ड्रोन को नो परमिशन नो टेक ऑफ यानी एनपीएनटी का अनुपालन करना होगा। इसका मतलब है कि ड्रोन बनाने वाली कंपनी को इसमें ऐसा सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर डालना होगा जिससे डीजीसीए इस पर नजर रख सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई ड्रोन बिना अनुमति के उड़ान न भर सके। नई नीति के तहत किसी ऑपरेटर को अपने उड़ान पथ के बारे में सरकार को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये बताना होगा और यह अनुमति मिलने के बाद ही उड़ान भर सकता है। 

ड्रोन प्रौद्योगिकी का डिजाइन और विकास करने वाली कंपनी श्री साई एयरोटेक इनोवेशंस के साई पट्टाबिराम ने कहा, 'समस्या यह है कि हम इतनी बड़ी संख्या में ड्रोन को कैसे वैध बनाएंगे, यह पता कैसे लगाएंगे कि वे कहां हैं और उनका उड़ान पथ क्या है। जब तक नए नियमों को बदला नहीं जाता है, तब तक यह नहीं हो सकता।'

इस नतीजा यह है कि सरकार ने अभी तक किसी भी ड्रोन को उड़ान भरने की अनुमति नहीं दी है। देश में एनपीएनटी वाले ड्रोन उपलब्ध नहीं हैं जिससे बिना अनुमति वाले व्यावसायिक ड्रोन का इस्तेमाल हवाई फोटोग्राफी, फिल्मों, रियल एस्टेट, तेल एवं गैस क्षेत्र, कारखानों और निगरानी तथा सुरक्षा के लिए धड़ल्ले से हो रहा है। 

इस पर आगे की योजना के लिए उद्योग के साथ चर्चा चल रही है। नियामकों की मंजूरी के साथ पुराने ड्रोन पर निगरानी उपकरण या जीपीएस लगाने का प्रस्ताव विचाराधीन है। इसके तहत ये ड्रोन एनपीएनटी के अनुकूल बनाए जा सकते हैं। इस तरह पुराने ड्रोन पर लगाए गए उपकरण से सरकार ड्रोन की स्थिति और मालिक के नाम की जानकारी हासिल कर सकती है और इसके उड़ान पथ को नियंत्रित कर सकती है। ड्रोन नीति के क्रियान्वयन के संबंध में हुई बैठक का हिस्सा रहे एक कार्यकारी ने कहा, 'नागरिक उड्डïयन मंत्रालय ने सुझावों पर सकारात्मक रुख दिखाया है और हम इसे संभव बनाने के लिए एक विस्तृत योजना पर काम कर रहे हैं।'

विशेषज्ञों का कहना है कि यह सड़क मंत्रालय की उसी योजना की तरह है जो उसने सरकारी वाहनों के लिए शुरू की है। इसके तहत इन वाहनों को अप्रैल तक स्थिति की जानकारी देने वाला उपकरण लगाना होगा ताकि सरकार उनकी आवाजाही पर नजर रख सके। उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन के नए नियमों के कुछ पहलुओं में ढील दिए जाने की जरूरत है। इसमें आयात के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता भी शामिल है। 

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