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कबड्डी की कामयाबी दोहरा पाएगी वॉलीबॉल लीग?

ध्रुव मुंजाल /  February 08, 2019

कुछ साल पहले भारत में वॉलीबॉल की पेशेवर लीग शुरू होने की संभावना ऐसी थी कि जैसे निक कीरईऑस चेयर अंपायर से झगड़ा किए बिना पूरा मैच खेल जाएं। हमारी पूरी कोशिशों के बावजूद यह सपना पूरा होना दूर की कौड़ी लगता था। कभी कबड्डी को लेकर भी कमोबेश यही स्थिति थी। लेकिन केवल पांच साल में ही प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) ने इस खेल को गुमनामी के अंधेरों से निकालकर लोकप्रियता का शिखर पर पहुंचा दिया है। कबड्डी की तरह भारत भले ही अभी वॉलीबॉल की दुनिया में कोई ताकत नहीं बना है लेकिन इन दोनों खेलों में कुछ समानताएं हैं। दोनों खेलों में गजब की फुर्ती चाहिए और वे शुरू से अंत तक रोमांच से भरपूर हैं। इन खेलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जमीनी स्तर पर बड़ी संख्या में लोग इन्हें पसंद करते हैं और यही वजह है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ी ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक अपने कौशल को दिखाना चाहते हैं। हाल में शुरू हुए प्रो वॉलीबॉल लीग (पीवीएल) के मुख्य कार्याधिकारी जॉय भट्टाचार्य कहते हैं, 'वॉलीबॉल एक रोमांचक खेल है जिसके नियम बेहद आसान हैं। देश के लगभग हर स्कूल में एक वॉलीबॉल कोर्ट होता है और हरेक स्कूल की अपनी वॉलीबॉल टीम होती है।' इस लीग का मालिकाना हक भारतीय वॉलीबॉल महासंघ और खेल प्रबंधन कंपनी बेसलाइन वेंचर्स के पास है। 

 
अगर आप हालिया अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को देखने वाले दर्शकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि भट्टाचार्य किस बारे में बात कर रहे हैं। पिछले साल नवंबर में 'द इकनॉमिक टाइम्स' में प्रकाशित बार्क के आंकड़ों के मुताबिक 2018 के एशियाई खेलों के दौरान 2.24 करोड़ भारतीय दर्शकों ने वॉलीबॉल के मैच देखे। 2016 में रियो में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान यह संख्या 5.43 करोड़ थी। यह एक आश्चर्यजनक आंकड़ा है क्योंकि वॉलीबॉल को टेलीविजन दर्शक वाले खेल के रूप में नहीं देखा जाता है। भट्टाचार्य कहते हैं, 'इन आंकड़ों से हमें पता चला कि देश में सही मायनों में एक स्तरीय वॉलीबॉल टूर्नामेंट की जरूरत है।'
 
देश में वॉलीबॉल लोकप्रिय हो सकता है लेकिन लीग के आयोजकों का जोर फिलहाल इसे सीमित स्तर पर शुरू करने की है। पीवीएल में केवल छह टीमें हैं। इनमें कालीकट हीरोज, हैदराबाद ब्लैक हॉक्स, कोच्चि ब्लू स्पाइकर्स, चेन्नई स्पार्टंस, अहमदाबाद डिफेंडर्स और यू मुुंबा वॉली शामिल हैं। टूर्नामेंट के मैच केवल दो शहरों चेन्नई और कोच्चि में खेले जा रहे हैं। भट्टाचार्य का कहना है कि लीग में दक्षिण के राज्यों पर ज्यादा जोर देना एक सोची समझी रणनीति है। उन्होंने कहा, 'भारत में केरल और तमिलनाडु इस खेल के प्रमुख केंद्र हैं। यही वजह है कि हम लीग को यहां से शुरू करना चाहते थे। आगे के संस्करणों में हम उत्तर भारतीय टीमों की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं।'
 
पीकेएल में खेल रही टीमों का मालिकाना हक जानी मानी हस्तियों के पास है और यही वजह है कि इसमें चमक दमक भी खूब है। लेकिन इस टूर्नामेंट की सफलता का सबसे बड़ा राज इससे जुड़ा रोमांच है। हालांकि  इसके हालिया संस्करण में रेटिंग कुछ धीमी रही। दूसरी ओर पीवीएल से फिल्मी सितारे नहीं जुड़े हैं लेकिन फिर भी उसमें बहुत कुछ है। यू मुंबा वॉली का मालिकाना हक रखने वाली यू स्पोट्र्स के मुख्य कार्याधिकारी सुप्रतीक सेन कहते हैं, 'वालीबॉल बहुत तेज, दमखम, सस्ता और सबकी पहुंच वाला खेल है। इसमें भारत का अगला बड़ा खेल आयोजन बनने की सारी खूबियां हैं।' सेन ने फिल्म निर्माता रॉनी स्क्रूवाला के साथ यू स्पोट्र्स की स्थापना की थी। पीकेएल में यू मुंबा की सफलता के पीछे इसी जोड़ी का हाथ है। चीजों को दिलचस्प बनाने के लिए मैच पांच के बजाय तीन सेटों में खेले जा रहे हैं। साथ ही टीमों को हर मैच में 'ट्रंप पॉइंट' का भी मौका दिया जा रहा है जिसे जीतने पर उन्हें दो अंक दिए जा रहे हैं। सेन ने कहा, 'कबड्डी की तरह वॉलीबॉल का शॉर्ट फॉर्मेट उसकी खूबी है और यही बात इसे दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाएगी। साथ ही इसमें सभी राज्यों के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। यह राष्ट्रीय खेल बन सकता है।' उदाहरण के लिए यू मुंबा वॉली के कप्तान दीपेश कुमार सिन्हा का संबंध छत्तीसगढ़ से है। छह फुट छह इंच लंबे ब्लॉकर का बचपन नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में गुजरा और वॉलीबॉल ने उनकी जिंदगी बदल दी। सिन्हा राष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं और उन्होंने एशियाई खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया था। 
 
सिन्हा कहते हैं, 'मुझे याद है कि जब मैंने वॉलीबॉल खेलना शुरू किया था तो उसी समय इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की शुरुआत हुई थी। खिलाड़ी के तौर पर हम हमेशा किसी पेशेवर लीग का हिस्सा बनना चाहते थे। हम एक दशक से भी अधिक समय से यह सपना संजो रहे थे।' सिन्हा के असामान्य लंबे कद के कारण शुरुआत में लोग उन्हें क्रिकेट खेलने की सलाह देते थे। 'लोग कहते थे कि मुझे तेज गेंदबाज बनना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे टीवी पर क्रिकेट देखते थे। किसी ने भी वॉलीबॉल के बारे में नहीं सोचा क्योंकि उन्होंने कभी इसे नहीं देखा था। लेकिन पीवीएल इस मानसिकता को बदल देगा।'
 
खेल को पहचान दिलाना तो इसका एक हिस्सा है। पीवीएल का मकसद आंशिक रूप से ही सही, खिलाडिय़ों को वित्तीय फायदा पहुंचाना भी है। पहले इस खेल के खिलाडिय़ों को शायद ही कभी नाम और पैसा मिला है। अधिकांश खिलाडिय़ों को दो-दो काम करने पड़ते हैं क्योंकि केवल वॉलीबॉल खेलकर गुजारा नहीं होता है। दिसंबर में हुई खिलाडिय़ों की नीलामी आने वाले भविष्य का अच्छा संकेत थी। इस नीलामी में अहमदाबाद डिफेंडर्स ने रंजीत सिंह पर 13 लाख रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाई। आईपीएल की तुलना में यह राशि भले ही बहुत कम है लेकिन वॉलीबॉल जैसे खेल के लिए यह अच्छी बात है। सिन्हा को यू मुंबा वॉली ने नौ लाख रुपये में खरीदा है। सिन्हा ने कहा, 'आप किसी खेल को इसलिए नहीं खेल सकते क्योंकि आपको उससे प्यार है। आप पेशेवर तरीके से खेलना चाहते हैं तो पैसा अहम है।'
 
अमेरिका की दिग्गज जोड़ी डेविड ली और पॉल लॉटमैन के साथ खेलना भी किसी सम्मान से कम नहीं है। ये दोनों खिलाड़ी पीवीएल के पहले संस्करण में खेल रहे हैं। ली 2008 में पेइचिंग ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा थे। ली और लॉटमैन 2015 में विश्व कप विजेता टीम में शामिल थे। लॉटमैन कालीकट हीरोज की तरफ से खेल रहे हैं। इस टीम के मालिक सफीर पी टी ने कहा, 'अगर आप सभी खेल लीगों को देखें तो आप पाएंगे कि विदेशी खिलाडिय़ों की मौजूदगी से भारतीय खिलाडिय़ों के प्रदर्शन में सुधार आया है। यह हमारे खिलाडिय़ों के लिए स्वर्णिम अवसर है।' ली कोच्चि ब्लू स्पाइकर्स का हिस्सा हैं। कोच्चि में 9 फरवरी को होने वाले मैच के सारे टिकट पहले ही बिक चुके हैं। यह केरल में टूर्नामेंट का पहला मैच होगा। लीग में दर्शकों की दिलचस्पी से रूपे और सोनी पिक्चर्स नेटवर्क को फायदा होगा। रूपे टूर्नामेंट की प्रमुख प्रायोजक है जबकि सोनी आधिकारिक प्रसारक। सोनी को उम्मीद है कि पीवीएल उसके लिए वही काम करे जो पीकेएल ने स्टार इंडिया के लिए किया। 
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